Friday, December 16, 2016

Kahani 2


         फिल्म निर्माण की प्रक्रिया को समझने का एक नुकसान ये है कि कोई भी फिल्म देखते समय दिमाग के पिछवाड़े में कहीं ये सब चलता रहता है कि कैमरा एंगल क्या है? शॉट कैसा है? एक्टर के मन में अभी क्या चल रहा है? भाव सही हैं या नहीं? पार्श्व संगीत सही है या नहीं? वगैरह वगैरह...
 बचपन में जब फिल्में देखते थे तो खलनायक को पिटते देख कर अपनी भी मुट्ठियाँ भिंच जाती थीं कि दे एक और साले को मेरी तरफ से भी...लेकिन अब अगर फिल्म में कोई तकनीकी कमी भी है तो वो ध्यान खींच लेती है। दूसरा पहलू ये है कि ऐसे में किसी भी फिल्म के अच्छी या बुरी होने का निर्णय आसान हो जाता है और कहानी 2 की सफलता सिर्फ यही एक बात तय कर देती है कि फिल्म अपने आप में हमें डूबो लेती है, वो हमें ये सब सोचने ही नहीं देती कि कैमरा वगैरह क्या है? या फिर कैमरा कहीं है भी या ये सब वास्तव में घट रहा है? फिल्म की कहानी अपने साथ बहा ले जाती है...वहाँ, जहां आप उस दुनिया का एक हिस्सा हो जाते हैं जो फिल्म में दिखाई जा रही है।

कहानी 2 का कहानी 1 से कोई लेना-देना नहीं है बल्कि विद्या बालन का पूरा चरित्र ही अलग है। कहानी 1 में जहां वो एक मजबूत औरत थी यहाँ थोड़ी आम सी है, थोड़ी डरपोक, सहमी हुई सी लेकिन परिस्थिति आने पर कुछ भी कर गुजरने वाली। कहानी को मैं ज़्यादा नहीं खोल सकता वरना आपका मज़ा खराब हो जाएगा लेकिन फिल्म को जिस रोमांचक तरीके से बुना है शूजित सरकार ने वो कमाल है।
अपने आप को जमाने में ज़्यादा समय नहीं लेते हुए फिल्म आपको पहले 10 मिनट में ही जोरदार झटका दे देती है और फिर आप झूला झूलते रहते हैं...ऊपर, नीचे, दायें, बाएँ।
फिल्म में सब तरफ विद्या बालन हैं...कहने का मतलब है कि वो इतना छाई हुई हैं कि बाद में आपको सिर्फ और सिर्फ वही याद रहती हैं, बाकी सारे अभिनेता गौण हो जाते हैं। हालांकि अपने-अपने चरित्र को सभी ने बखूबी निभाया है। अर्जुन रामपाल बने ही ऐसे चरित्र के लिए हैं जहां स्क्रीन प्रेजेंस दमदार हो और चरित्र को ज़्यादा भाव प्रदर्शन न करना हो। भावहीन चेहरा एक सस्पेंस फिल्म के लिए ज़रूरी है। जुगल हंसराज मासूम के बाद से अब तक संघर्ष कर रहे हैं और बाल कलाकार से उनका सफर खलनायक तक पहुँच गया है, इस फिल्म में तो काम अच्छा ही किया है उन्होने।

कास्टिंग बहुत बढ़िया है, खास तौर पर बच्ची। अलग-अलग उम्र की दो एक जैसी बच्चियाँ ढूँढना जो अभिनय भी अच्छा कर लेती हों कमाल ही है। कुछ अगर कमजोर है फिल्म में तो अर्जुन रामपाल और उनकी पत्नी की कहानी जो जबर्दस्ती थोपी हुई लगती है। पत्नी का किरदार निभाने वाली अदाकारा को अभिनय बिलकुल नहीं आता, वो बस अपने संवाद मज़ेदार बनाने की कोशिश करती हुई लगती है और लेखक ने भी इस ट्रैक को मज़ेदार बनाने की कोशिश में इसे बरबाद कर दिया। दोनों के बीच की बातचीत बोर करती है पर सौभाग्य से वो ज़्यादा नहीं है इसलिए फिल्म का मज़ा खराब नहीं होता।

ऐसी फिल्मों में अमूमन गीतों की ज़रूरत नहीं होती और अगर हो भी तो आजकल गीत ऐसे बनते हैं कि उससे बेहतर है कि बात को संवाद के माध्यम से कह दिया जाये। फिल्म में एक ही गीत है जो बिलकुल पिछले कई सालों से बन रहे गीतों जैसा ही लगता है। कहना क्या चाहता है समझ नहीं आता। शायद आजकल गीत बनाने का तरीका ये है कि कोई एक उर्दू या अंग्रेज़ी शब्द तय कर लो फिर उस शब्द को चबाते रहो मतलब 5-7 बार एक साथ वो शब्द रिपीट होना चाहिए और बाकी कुछ भी लिख दो। धुन कोई भी नर्सरी राईम की चलेगी। यहाँ जिस शब्द की शामत आई है वो है मेहरमबरसों पहले अमिताभ बच्चन की फिल्म मि. नटवरलाल में एक गीत था मेरे पास आओ मेरे दोस्तों जिसमें वो गीत में कहानी सुनाते हैं, मेरे खयाल से वो भी इन गीतों से ज़्यादा संगीतमय था।

विद्या बालन जैसी बेहतरीन अभिनेत्री शौचालय में ज़ाया हो रही है, हमें और फिल्में चाहिए उनके काबिल

फिल्म वही है जो खत्म होने के बाद भी आपका पीछा न छोड़े और ये ऐसी ही फिल्म है। मेरी सलाह है कि देखने ज़रूर जाइए। आखिर साल में कुछ ही तो फिल्में आती हैं इस तरह की।

Tuesday, September 20, 2016

पूछो रावण से...


हम माहिर हैं
आताताइयों को सज़ा देने में
यक़ीन न हो तो पूछ लो रावण की रूह से
साल दर साल
हजारों सालों से जलता आ रहा है
पुतला
बख्शते नहीं हम किसी बुराई को
पुतले तैयार रखते हैं
या फिर
आक्रांताओं की जाति धर्म देख लेते हैं
और तुरंत निबटा देते हैं मामला
एक अज़हर अगर हमला करेगा
हम उजाड़ देंगे किसी अब्दुल
किसी कादिर का घर
माफी की उम्मीद न करना
बुराई, बुराई है
हम माफ नहीं करते
तुम फिर आओगे
हम फिर किसी का घर यहीं के यहीं उजाड़ देंगे
हमारा बदला हो जाएगा पूरा
तुम घूमते रहो गुमान में सारा जहाँ
लेकिन हम जानते हैं
हमने तुम्हें सज़ा दे दी
जैसे रावण को
आज तक दे रहे हैं

पूछ लो रावण की रूह से...

Sunday, May 29, 2016

चंपू की खुशी



चंपू बहुत ही खुश था। उसके परधान मंतरी के दो साल पूरे हो गए थे और भगवान इसका जश्न मना रहे थे। शायद उन्हें यक़ीन नहीं था कि पूरे हो जाएंगे। चंपू खूब नारे लगाया, जी-जान से लगाया। कार्यक्रम खत्म हुआ, चंपू खुस था कि 68 सालों बाद देश में कुछ हो रहा है वरना तो सुई भी नहीं बन रही थी। अपनी बाइक वो नो पार्किंग में लगा आया था। बाइक 2014 के पहले की खरीदी हुई थी, जो कपड़े पहने थे वो भी उसके पहले के थे। बाइक उठाते ही ठुल्ले ने दबोच लिया। बहुत मिन्नतें कीं, पी यम की दुहाई दी पर पट्ठा ना पिघला, 100 का नोट लेकर ही माना कि वहाँ नो पार्किंग नहीं थी। थोड़ी आगे चला तो गाड़ी बंद, पेट्रोल 50-50 रू का ही डलवाता है सो खत्म हो गया। बहुत दूर तक धक्का मारते ले गया। ठुल्ले को गालियाँ दीं, पेट्रोल पंप को दीं, माँ बहनों का बुरा हाल कर दिया। जैसे तैसे पेट्रोल पंप पर पहुँचा तो देखा पेट्रोल के दाम फिर बढ़ गए, बुरी तरह झुँझलाया। प्रेशर कुकर सी हालत हो गई, सरकार की बुराई नहीं कर सकता लेकिन इस बार -बार की बढ़ोतरी का जिम्मेदार किसे ठहराए? 100 रू पहले ही जा चुके थे फिर भी 50 का पेट्रोल डलवाया और फिर पी यम की जय बोलकर आगे बढ़ा। थोड़ी ही आगे चला होगा कि घर से फोन आ गया, चंपू मेहमान आए हैं 1 किलो दाल ले आना। वो जल-भुनकर खाक हो गया। इतनी महँगाई में भी मेहमानों को कोई शर्म नहीं। दुकान पर पहुँचा तो पता चला दाल 200 रू किलो हो गई। बेहोश होते-होते बचा और दुकानदार के गले पड़ गया कि परधान मंतरी इतना काम कर रहे और तुम कालाबाजारी करते हो? दुकानदार ने महँगाई का दुखड़ा रोया तो उसकी ऐसी तैसी कर दी उसे खान्ग्रेसी और कम्यूनिस्ट साबित किया क्योंकि अभी-अभी पी यम ने बताया था कि महँगाई उन्होंने समाप्त कर दी है फिर उसने एक की बजाय आधा किलो दाल ली, वो भी उधार। घर पहुंचा तो माँ ने बताया नाली चोक है कईं दिनों से सफाई करने वाला नहीं आया। वो माँ से भी उलझ लिया कि अभी पी यम बोले हैं भारत स्वच्छ हो गया, मेरी माँ भी खान्ग्रेसी हो गई?? माँ ने दो चनकट लगाए तब थोड़ी सुध आई।
घर से निकला और देखा कोई पी यम के कार्यक्रम की बुराई कर रहा था बस अब बर्दाश्त के बाहर हो गया, उस खान्ग्रेसी के खानदान में जितनी महिलाएं थीं उन्हें एक करके भारतीय संस्कृति की पुनर्स्थापना की, उसे दो चार लगाकर पाकिस्तान जाने की नसीहत भी दी और अच्छे दिन आ चुके हैं की घोषणा करते हुए नाली की शिकायत करने चल दिया इस डर के साथ कि दरोगा फिर सौ का नोट माँगेगा।
भारत माता की जय।

Wednesday, March 23, 2016

चिंटू की होली

 

           नफरती चिंटू लातूर में रहता था उसे दिन-रात भारत माता की जय बोलने की आदत थी और जो जवाब में नहीं बोलता था उसका वो मुँह तोड़ देता था। पढ़ाई-लिखाई को वो समय की बरबादी मानता था। ऐसे प्रतिभाशाली लोगों के लिए जो बिना पढे-लिखे विद्वान कहलाना और बिना करे-धरे देशभक्त बनना चाहते थे नागपुर में एक विश्वविद्यालय स्थापित हुआ जिसने ये घोषणा की कि सिर्फ चिंटू प्रजाति ही असली और सबसे महान प्रजाति है और दूसरे सभी प्रकार के इन्सानों के लिए एक से बढ़कर एक गलियों की रचना की। वहां से 1-1 लाइन का इतिहास जारी होता था और सभी नफरती चिंटू उसे पत्थर की लकीर मानते थे। मसलन भगत सिंह के बारे में वो इतना ही जानते थे कि उन्होने असेंबली में बम फोड़ा था...अब अगर इसके आगे कोई उन्हें ये कहने की कोशिश करे की बम उन्होने इस तरह से फेंका था कि किसी की जान न जाये तो वो उसी की जान ले सकते थे या फिर अगर भगत सिंह खुद भी आकार कहे कि अबे मूरखों, मैं वैसा नहीं था जैसा तुम समझते हो, या फिर ये कि "मेरा रंग दे बसंती चोला" से मेरा मतलब वो चोगा नहीं था जो तुम्हारे ढोंगी बाबा लोग पहनते हैं तो ये लोग उन्हें देशद्रोही साबित करके उनकी जान भी ले सकते हैं।
                           तो साहब इस तरह के जियाले के शहर में पानी की भारी किल्लत हो गई और वो भी होली के टाइम पे। अब वो तो हर होली पे उन लोगों को गालियां देता आया था जो कि फिक्रमंद थे कि साल दर साल बारिश कम होती जा रही है और पानी की कमी होती जा रही है...चिंटू का दर्शन था कि साल भर पानी बचाव और एक दिन जम के होली खेलो और ये लोग हिंदुओं के दुश्मन हैं ये बकरे काटने पर तो कुछ नहीं कहते वगैरह। अब पानी बचाने से बकरे काटने का क्या संबंध है ये आपक्कों जानना है तो आपको दूसरा जन्म लेना पड़ेगा और भगवान से ये मांगना पड़ेगा कि बुद्धि तो दियो ही मत। हालांकि ऐसा बिलकुल नहीं है कि साल भर वो पानी बचाने में ज़मीन आसमान एक कर देता हो...साल भर भी वो पानी सहित प्रकृति की दूसरी चीजों की ऐसी-तैसी करता है और होली पर पूरी तरह से पानी की। जो लोग पानी-पानी चिल्लाते हैं उनका कुछ समझ नहीं आता, अरे भाई परमात्मा ने बनाया पानी अब वही इंतजाम करेगा ना, हम क्या कर सकते हैं?

 तो ऐसे महान चिंटुओं के शहर में दंगे हो गए पीने के पानी एक लिए, धारा 144 लगानी पड़ी...इधर धर्म का सवाल था होली तो मनानी ही थी। वो आदमी ही क्या कि पीने जैसे गैर ज़रूरी काम के लिए होली खेलने जैसा धार्मिक कार्य न करे। घर में बहुत मेहनत से जमा हुआ पानी उसने एक टंकी में भरा...बच्चों को प्यास लग रही थी पर उसने पानी छूने भी नहीं दिया। कम पड़ा तो उसने इधर-उधर से पानी लूट लिया...आखिर धरम का काम था। वैसे भी साल भर ये चंदा वो चंदा करके उठा-पटक किया ही करते थे और उसके जैसे महान लोग भरे पड़े थे जिन्होने होली खेलने की महिमा से व्हाट्स एप और फेसबुक पाट दिये थे। इन्हें ये क्रांति लग रही थी। तो साहब खूब जम के खेली सभी चिंटुओं ने होली...बच्चे प्यासे मर गए पर धर्म पर आंच नहीं आने दी। दूसरे दिन समझ आया कि अब तो न नहा सकते, न धो सकते, न पी सकते, न खा सकते तो इसी अवस्था में चिंटू ने प्राण त्यागे। दूसरे कुछ चिंटुओं ने उसकी प्रतिमा स्थापित करनी चाही पर मूर्ति बनाने में, उसे लगाने में, उदघाटन के कार्यक्रम में, पूजा-पाठ में सबमें पानी लगेगा...अब इतना पानी इसमें लगा दिया तो अगले साल फिर होली खेल कर धर्म कौन बचाएगा...सोच रहे हैं चिंटूस पर सोचने की आदत है नहीं दिमाग को सो बस खुजा ही पा रहे हैं। सहायता कीजिये कुछ इन दिवयांगों की और प्रण लीजिये कि पूरे देश में लातूर जैसी स्थिति ला देंगे, पानी के लिए भले ही सर फोड़ने की नौबत आ जाए पर होली ज़रूर खेलेंगे... आखिर होली हमारा त्योहार है इसे जान देकर भी मनाएंगे...होली है...सा रा रा रा...

Tuesday, March 08, 2016

स्त्री दिवस


लिख तो सकता हूँ मैं

बड़ी-बड़ी बातें औरों की तरह

कि मनुष्य को जन्म देती है वो

कि सबसे बड़ा दर्द सहती है वो

या और भी बहुत कुछ

पर खोखला ही होगा ना वो?

मैं कैसे जान सकता हूँ

वो प्रसव पीड़ा

जब जन्म देती हो तुम एक नए मनुष्य को

या वो अपमान वेदना

जब वो मनुष्य

पिता, पति या पुत्र होकर

तुम्हें कमजोर समझ कर देता है

नहीं,

ये भी नहीं जान सकता मैं कभी

कि अपना घर, अपने माँ-बाप छोडकर

किसी और घर में

किसी और घर के होने के एहसास

के साथ कैसे प्यार किया जा सकता है

मैं बस इतना ही कर सकता हूँ

अगर शुभकामना देना चाहूँ

कि पुरुष होने के उस दंभ का

जो समाज ने दिया है

अंत कर दूँ

और ये स्वीकार कर लूँ पूरे हृदय से

कि मैं हूँ अगर तुम हो...

Thursday, January 28, 2016

Chintu



      सुबह-सुबह खबर मिली कि चिंटू नहीं रहा। उससे कोई खास दोस्ती जैसी तो नहीं थी लेकिन बचपन से जानता था उसे। मुझे तो उसका असली नाम भी याद नहीं, सब उसे चिंटू ही कहते थे। मन उद्वेलित हो गया। ध्यान बार-बार उसी तरफ जाने लगा। उसकी उम्र लगभग 40 साल रही होगी। इन 40 सालों में उसने ज़िंदगी को जिया नहीं बल्कि जैसे-तैसे काटा था। ऐसा भी नहीं कि बहुत ही गरीबी में पैदा हुआ हो। उसके पिता शिक्षक थे और गाँव में उनकी अच्छी साख थी। पैसा भी उनके पास पर्याप्त था लेकिन घर में बहुत सख्त मिजाज आदमी के रूप में ही रहते थे। वैसे ये कोई नई बात नहीं है, पिछली पीढ़ी के सारे पिता मुँह लटकाए और भौहें चढ़ाये रखने पर ही अपने आप को पिता मान पाते थे। जब तक एकाध बार अपनी औलादों की मरम्मत न कर दें उन्हें यकीन होना मुश्किल होता था। आज के पिताओं जैसे नहीं जो बच्चों को उठाए-उठाए घूमते हैं। तब तो बच्चे नाम से ही मूत दिया करते थे। चिंटू के पिताजी कुछ ऐसे ही थे और शायद इसी वजह से या अपने स्वभाव और इस माहौल के घाल-मेल के परिणामस्वरूप वो खिलंदड़ हो गया था। पिता से बहुत डरता था लेकिन बाहर जैसा उसका व्यवहार था वो समाज के अच्छे लड़के के पैमाने पर खरा नहीं उतरता था। तरह-तरह की शैतानियाँ और सारे उल्टे-सीधे काम। दोस्तों के बीच उसकी पहचान एक मसखरे के रूप में थी। पिता से वो हमेशा ही नाराज़ रहा करता था पर उनके सामने ज़बान को लकवा मार जाता था सो अपना गुस्सा निकालने का उसने एक नायाब तरीका खोजा। पिताजी का कुर्ता पाजामा लटका कर वो एक लट्ठ लेकर उन्हें खूब पीटता था। अब इसी एक हरकत से आप अंदाज़ लगा सकते हैं कि उसका दिमाग किस तरह काम करता था। स्कूल के जमाने में ही सिगरेट पीना शुरू कर दिया था और कॉलेज तक पहुँचते-पहुँचते शराब का शौक लग गया था। पिता से पैसे मिलते नहीं थे तो उसका जीवन के लिए संघर्ष तभी से शुरू हो गया था।
यूं देखने में बात सीधी सी लगती है कि एक लड़का है जो बिगड़ गया, उसे बुरी लतें लग गईं और अपनी लतें पूरी करने के लिए वो और-और गढ्ढे में गिरता चला गया लेकिन थोड़ा गहराई में जाएँ तो क्या ऐसा नहीं लगता कि उसके अंदर ऊर्जा थी जिसे दिशा चाहिए थी। एक साँचे में ढले बाप कभी सोच नहीं पाते थे कि हर बच्चे का स्वभाव अलग होता है इसलिए उन्हें अलग-अलग तरह से हैंडल किया जाना चाहिए। चिंटू के पिता अगर इतना समझते और उस पर पाबन्दियाँ लगाने कि बजाय उसे दिशा देने की कोशिश करते या कम से कम संवाद ही बनाए रखते तो शायद आज चिंटू कुछ और होता और शायद असमय ऐसी मौत मरता भी नहीं।
बहरहाल, चिंटू काफी ज़िंदादिल था। हमेशा हँसते-मुसकुराते रहना उसकी आदत थी। मैं जब स्कूल में था तब वो कॉलेज में पढ़ रहा था। पढ़ाई में कम लेकिन हंगामों में वो हमेशा नज़र आता था। कभी हड़ताल में कभी धरने पर, कभी प्रदर्शन में। कॉलेज का जीवन बहुत ही मस्तमौला होता है। उस समय ये बात कभी ज़ेहन में आती ही नहीं कि ये वक़्त ठहरेगा नहीं...गुज़र जाएगा और अपने साथ ये सारी मस्तियाँ भी ले जाएगा। तब तो यूं लगता है कि ज़िंदगी कितनी खूबसूरत है, सब कुछ अच्छा है, बहुत से दोस्त, घूमना-फिरना, गप-शप, सिगरेट का धुआँ और शराब की मदहोशी। लेकिन वक़्त गुज़र जाता है और एक दिन पता चलता है कि अचानक ज़िंदगी पूरी तरह से बदल गई है। चिंटू का भी वो वक़्त आखिर गुज़र गया जब वो पिता के खूंखार पंजों से भाग कर दोस्तों के बीच सुख ढूंढ लेता था। कॉलेज खत्म हुआ और ज़िंदगी नंगी होकर उसके सामने खड़ी हो गई। उसने कभी सोचा ही नहीं था कि ज़िंदगी अपने नंगे स्वरूप में ऐसी भी दिखाई दे सकती है। उसकी न कोई तैयारी थी और न उसके पास कोई सहारा था। वो बेचैन हो गया। उसकी ऊटपटाँग हरकतें हालांकि जारी रहीं। एक दिन पिताजी से झगड़ा हो गया, पैसों को लेकर। पिताजी ने पैसा देना बिलकुल बंद कर दिया था। चिंटू ने बूट पॉलिश की एक डिबिया और एक ब्रश खरीदा और चौराहे पर जाकर बैठ गया। भले ही उसके पिता बहुत पैसेवाले नहीं थे पर उनका सम्मान था गाँव में और शायद उसी को वो ठेस पहुँचाना चाहता था। उसे अपनी तो कोई फिक्र थी ही नहीं क्योंकि लोग क्या कहते हैं इसकी उसने कभी परवाह की ही नहीं थी। चौराहे पर वो लोगों के जूते पॉलिश करने लगा। यार-दोस्त अब भी थे और उसकी इन हरकतों पर अब भी हँसते थे, कॉलेज में बनी मसखरे की छवि से दोस्तों ने उसे गंभीरता से लेना बंद कर दिया। और ले भी लेते तो क्या कर लेते? कितनी ही ज़िंदगियाँ ऐसे खत्म हो गईं और आस-पास के लोग बस देखते रहे। कुछ दिनों तक ये काम चलता रहा फिर पता नहीं क्या हुआ, उसके पिता ने उसे समझाया या किसी और ने लेकिन फिर उसने वो काम बंद कर दिया।
खिलंदड़ स्वभाव भी ज़िंदगी की तल्खियों को रोक तो नहीं सकता। ज़िंदगी अब रोज़ आकर खड़ी हो जाती और पूछती कि अब आगे क्या
? उसे नज़रअंदाज़ करने के लिए उसने और ज़्यादा शराब पीना शुरू कर दिया। उसने फिसलन की राह पकड़ ली थी। ज़िंदगी के सवालों से बचने के लिए उसने ज़िंदगी को ही नज़रअंदाज़ कर दिया। इसी बीच उसकी शादी भी हो गई। जो आदमी खुद अपना बोझ नहीं उठा पा रहा था उसके सिर पर समाज और परिवार ने एक और बोझ लाद दिया। हमारे समाज में लोगों की बहुत ही वैज्ञानिक सोच है कि जो गलत राह पर चला गया है उसकी शादी कर दो, सुधर जाएगा। ये भी हमारे दोगलेपन की ही एक मिसाल है क्योंकि अपने घर के एक सदस्य को सुधारने के लिए ये एक प्रयोग होता है जिसमें एक जीती-जागती लड़की की बलि चढ़ जाती है लेकिन इस तरह से शायद ही कोई सोचता हो। वैसे भी हमारे समाज में औरत के बारे में इतना कोई नहीं सोचता। वो या तो घर का चौका-चूल्हा करने के लिए लाई जाती है या ऐसी ही किसी बिगड़ी औलाद को सुधारने की कोशिश में। और इस कोशिश में परिवार दोहरी गलती करता है। पहला व्यक्ति जिसका जीवन गलत राह पर जा चुका है उसका भी जिम्मेदार कहीं न कहीं परिवार और समाज होता है और फिर वो एक और ज़िंदगी खराब कर देता है। सिर्फ शादी से कोई सुधार न हो तो बेवकूफी की उस सीमा तक जाते हैं जहां उस नाकाम व्यक्ति के सिर पर सिर्फ पत्नी ही नहीं 2-3 बच्चों का बोझ भी लदवा दिया जाता है। ले भाई अब भुगत। वो पहले ही ज़िंदगी से घबराया हुआ था अब तो वो चारों ओर से घिर गया। शादी होने के बाद लड़के का अपना एक अलग परिवार मान लिया जाता है। तो उसके अंजाने ही अब उसका एक अलग परिवार था जिसकी पूरी ज़िम्मेदारी उसकी थी, बाकी लोग बिना अपराधबोध के अब उससे पल्ला झाड़ सकते थे। वो और भी बुरी अवस्था में पहुँच गया।
सिर्फ वो ही नहीं अब उसके इस नए परिवार का हर सदस्य ज़िंदगी की आंच में रोज़ तला जाने लगा। इस सब का खामियाजा बच्चों को बेवजह भुगतना पड़ता है। बच्चे न अपने लिए माँ-बाप चुनते हैं
, न परिवार और न समाज। ये पूरी तरह इन तीनों की ही ज़िम्मेदारी बनती है कि अगर ये किसी बच्चे को जीने लायक वातावरण देने में असमर्थ हैं तो उसे इस दुनिया में लाने की कोशिश ही न करें। जिससे खुद अपनी ज़िंदगी संभाली न गई हो वो अपने बच्चों को भी कैसे राह दिखाएगा? शायद इसी तरह हमारे देश में पीढ़ियों पर पीढ़ियाँ बर्बाद हुई हैं।
चिंटू दिन-रात नशे में डूबा रहने लगा। बीवी जैसे-तैसे घर चला रही थी। चिंटू के भाई और पिता मदद करते रहते थे। घर में झगड़े होने लगे। चिंटू अपनी बीवी की जली-कटी सुनने से बचने के लिए घर ही नहीं आता। शराब पीकर यहाँ-वहाँ पड़ा रहता। उसके पास पैसे नहीं होते तो आते-जाते लोगों से 5-10 रुपये मांग कर इकट्ठे कर लेता और फिर पी जाता। सब जानने लगे। लेकिन फिर भी कुछ लोग मिल ही जाते थे जो उसे 5-10 रुपये देकर जान छुड़ा लेते थे
, कुछ दोस्त भी पैसे देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते थे। सोचने वाली बात है। एक व्यक्ति इस समाज के सामने ही पैदा होता है, बचपन गुजारता है, उसके सामने शैतानियाँ करता है तब यही लोग हँसते-मुसकुराते हैं, जवानी में मसखरी करता है और यही लोग अपना मनोरंजन करते हैं, वो बूट पॉलिश करने लगता है एक शिक्षक का बेटा होने के बावजूद और समाज अपने बूट उससे मजे ले-लेकर पॉलिश करवा लेता है, फिर वो शराबी हो जाता है और ये समाज ये जानकारी दूसरों को देकर आगे बढ़ जाता है फिर वो नशेड़ी हो जाता है, फिर वो दर-दर की ठोकरें खाने लगता है, फिर वो लोगों से मांगने भी लगता है...और अंत में बेमौत मर जाता है...हमारा समाज सब कुछ साक्षी भाव से देखता है। वो सब देखकर किसी संत के भाव से आगे बढ़ जाता है।
चिंटू कईं सालों तक ऐसे ही पीता रहा और दयनीय अवस्था में जीता रहा और उसके पीछे जो उसके आश्रित थे वो और दूसरों पर आश्रित रहे और एक तरह से वो भी दयनीय जीवन जीते रहे। ऐसा नहीं कि किसी ने उसे राह पर लाने के लिए कुछ नहीं किया। उसके पिता और भाइयों ने उसे डराया, धमकाया, समझाया पर शायद अब देर हो चुकी थी। फिर अचानक एक दिन उसका जवान भाई मर गया। उसका लीवर खराब हो गया था। पता नहीं डर से या दुख से लेकिन चिंटू समझने के लिए तैयार हो गया। उसका इलाज करवाया गया और उसकी शराब की लत छुड़वाने की कोशिश की गई। उसने भी शायद मन ही मन संकल्प कर लिया था, जीवन में पहली बार, कि उसे शराब छोडनी है। हो सकता है अपनी इस ग़लीज़ सी ज़िंदगी से वो तंग आ गया हो। जो भी हो पर कोशिश कामयाब हुई और उसे लत से छुटकारा मिल गया। उसके दूसरे भाई ने कोशिश की और एक बैंक में उसे चपरासी की जगह रखवा दिया। हालांकि उस बैंक में पहले से एक चपरासी था लेकिन बैंक मैनेजर भला आदमी था, उसे सारी बातों की जानकारी थी सो, उसने किसी तरह उसके लिए जगह बना ली।
अब चिंटू बाकायदा एक दुनियादार आदमी हो गया था। वो मैनेजर का आभारी था। अब उसका घर कुछ सामान्य हो चला था। दिन भर बैंक में व्यस्त रहता था और शाम को घर में। ये सब होने के पहले ही उसके पिता चल बसे थे और मन में ये बहुत बड़ा दुख लेकर ही गए कि बेटा दर-दर की ठोकरें खा रहा है। आज वो होते तो शायद उनसे ज़्यादा खुश और कोई नही होता पर फिर भी वो इसे ज़ाहिर तो नहीं ही करते।
चिंटू की कहानी में अब शायद कहने लायक कुछ नहीं था। समाज की तरह कहानी भी किसी दुर्घटना की मांग करती रहती है जिससे वो आगे बढ़ती रहे। बताइये अगर कहानी के सभी पात्र रोज़ अच्छी तरह से खा रहे हैं, काम पर जा रहे हैं, प्रेम से रह रहे हैं तो कहने को क्या बचता है? कौन दिलचस्पी लेता है ऐसी कहानी या ऐसी किसी ज़िंदगी में?
पर कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी। बैंक मैनेजर बुजुर्ग थे, कब तक साथ देते, एक दिन वो रिटायर हो गए। चिंटू ने बहुत प्रेम से उनके विदाई कार्यक्रम की व्यवस्था की। उसके मन में उनके प्रति अगाध श्रद्धा थी। उसे क्या पता था कि इनका जाना उसके जीवन को फिर उलट-पुलट कर जाएगा। वो चले गए, उनकी जगह एक नौजवान मैनेजर आया। पुराने मैनेजर को चिंटू के परिवार उसके बारे में सब जानकारी थी और उससे सहानुभूति भी थी। लेकिन नए मैनेजर को इस सब से कोई सरोकार नहीं था। उसकी नज़र में वो एक अक्षम कर्मचारी था जो कि बड़बोला भी था। नए मैनेजर में साहब होने का एक रौब भी था। चिंटू का स्वभाव तो अब भी वैसा ही था, बेबाक। मैनेजर को शुरू से ही वो पसंद नहीं आया और एक दिन उसे गैर ज़रूरी समझ कर नौकरी से निकाल दिया गया। चिंटू ने बहुत हाथ-पैर मारे, जान-पहचान वालों से सिफ़ारिश करवाई, मैनेजर के हाथ-पैर भी जोड़े, पुराने मैनेजर से भी गुहार लगाई और गुस्से में नए मैनेजर को धमका भी दिया लेकिन सब बेकार साबित हुआ। उसे बहाल नहीं किया गया। ज़िंदगी फिर वहीं आकर खड़ी हो गई थी। उसने एक बार फिर ये सोचा ही नहीं था कि वक़्त गुज़र जाता है। अब वो उस उम्र में भी नहीं था जब वो हर फिक्र को धुएँ में उड़ा देता। दिन काटने मुश्किल हो गए। घर एक बार फिर खाली हो गया। गाँव में एक नई बैंक खुल रही थी, वो पहला मौका पाकर उसके मैनेजर से मिल लिया। उसने नौकरी के लिए विनती की और अपने पिछले अनुभव के बारे में भी बताया। नए मैनेजर ने उसके सामने एक शर्त रख दी कि उसे कुछ नए खाते खुलवाने पड़ेंगे तभी वो नौकरी देगा। शायद उसने सोचा होगा कि यहीं का निवासी होने के कारण वो लोगों को लाकर खाते खुलवा देगा लेकिन ये वही समाज था जिसने उसे बचपन से अब तक मजे ले-लेकर देखा था इसलिए कोई भी उसे गंभीरता से लेने को तैयार नहीं था। मुझे याद है वो उसी दौर में एक बार मुझे भी मिला था और उसने मुझसे कहा था कि एक बार मैनेजर से मिल लो, मैं खाता खुलवा दूंगा। लेकिन मुझे नए बैंक खाते की कोई ज़रूरत ही नहीं थी। फिर मैंने सोचा भी कि चलो उसकी मदद के लिए ही एक बार मैनेजर से जाकर मिल लेंगे लेकिन बैंक अब तक खुली नहीं थी सिर्फ उसकी बिल्डिंग ही बन रही थी। बात आई-गई हो गई, मैं भी अपने कामों में व्यस्त हो गया। फेसबुक पर उसके संदेश नज़र आते रहते थे जिसमें वो नए बैंक मैनेजर से कभी विनती किया करता था नौकरी पर रखने की और कभी उस पर अपना गुस्सा निकाला करता था।
ज़िंदगी पहले से कईं गुना भारी हो गई थी। उसके लिए इस नई परिस्थिति से मुक़ाबला करना मुश्किल हो रहा था। उसने उस दौर में जितनी शराब पी ली थी उसने उसे अंदर से बिलकुल खोखला कर दिया था। शरीर में तो कुछ था ही नहीं, अब मन भी बहुत कमजोर हो गया था। जवानी में भविष्य इतना ज़्यादा परेशान नहीं करता लेकिन एक उम्र के बाद बहुत डराता है। दुनिया में बहुत से लोगों के लिए ज़िंदा रहना ही सबसे मुश्किल काम होता है। दिन पर दिन बीत चले लेकिन ज़िंदगी के एक बार फिर बदलने के कोई आसार नज़र नहीं आ रहे थे। अब वो बूट पॉलिश भी नहीं कर सकता था, लोगों से 5-5, 10-10 रुपये भी नहीं मांग सकता था। शराब की वजह से उसका लीवर खराब हो चुका था लेकिन जब तक वो नौकरी में था उसे फिर पूरी तरह स्वस्थ हो जाने की पूरी उम्मीद थी, वो लोगों को अपने नाखून दिखा कर कहता “देखो, लाल हो रहे हैं ना?” लेकिन अब वो बिलकुल गुमसुम हो गया था, दिन भर अपने घर के बाहर चुपचाप बैठा रहता। पहले आते-जाते लोगों से दुआ-सलाम कर लेता था, हँस-बोल लेता था लेकिन अब किसी पर ध्यान नहीं देता था। ज़िंदगी का शिकंजा पहले से भी ज़्यादा कसा हुआ था। कब तक सहता? कमजोर शरीर एक बार चल सकता है लेकिन कमजोर मन कहाँ तक ज़िंदगी को खींच सकता है? शायद वो टूट गया...और उसने हाथ जोड़ लिए ज़िंदगी के कि अब मुझे माफ करो मैं और तुम्हें नहीं ढो सकता...और आखिर...
मेरी नज़र में वो बुरा आदमी कभी नहीं था। शराब पीता था लेकिन किसी का बुरा नहीं किया कभी, किया तो खुद अपना ही बुरा किया। मुझे समझ नहीं आता उसने अगर ऐसी ज़िंदगी जी तो उसके पीछे के कारण मैं क्या समझूँ? मुझे जो खल रहा है शायद इसी को श्मशान वैराग्य कहते हैं जो अपने आस-पास के किसी व्यक्ति की मृत्यु पर हर इंसान में पैदा होता है, या शायद मुझे सचमुच बहुत दुख है एक ऐसी ज़िंदगी के अपने नजदीक से गुज़र जाने का।

Monday, December 28, 2015

Bajirao Mastani



        हम देखते ही रहे और कब देश की सबसे महत्वपूर्ण चीज़ें कला और संस्कृति विचारशील लोगों के हाथों से निकल कर हुड़दंगियों के हाथ में चली गईं, पता ही नहीं चला। वो चाहे फिर बजरंगी भाईजान हो या दिलवाले हो या बाजीराव मस्तानी हो, इनका एक ही काम है विरोध और तोड़-फोड़, इनमें किसी कलाकृति को समझने जितनी थोड़ी सी भी बुद्धि होती तो इनका विरोध करने का तरीका भी और ही होता।
      खैर, बात मुझे करनी है “बाजीराव मस्तानी” के बारे में। मैं किसी भी फिल्म को उतनी अच्छी समझता हूँ जितने लंबे समय तक वो दर्शक के मन-मश्तिष्क में घूमती रहे और कतरा-कतरा उसका रस उसके ज़हन में रिसता रहे। इस पैमाने पर बाजीराव-मस्तानी पूरी उतरती है। देखते वक़्त तो फिल्म ने दिल को गहराई तक छुआ ही पर देर तक उसका असर छाया रहा। रामलीला के पहले तक संजय लीला भंसाली से मैं कुछ खास प्रभावित नहीं था। खामोशी के बाद कोई दिल को छूने वाली फिल्म उन्होने बनाई नहीं थी। हम दिल दे चुके सनम एक बार देखने लायक फिल्म थी, शरतचंद्र के देवदास की उन्होने बेतरह दुर्गति बनाई थी, “ब्लैक” में प्रचार के अलावा कुछ नहीं था। आर्ट के नाम पर एक बोरियत भरी फिल्म जिसमें महानायक अमिताभ बच्चन की ओवर एक्टिंग साफ नज़र आती है। साँवरिया एक सदमा ही थी, उसे क्यों बनाया गया था, क्या बनाया गया था आज तक स्पष्ट नहीं है। गुजारिश भी ठीक ही थी लेकिन फिर मैंने रामलीला देखी और जैसे जादू हो गया। एक फिल्म एक कलाकृति की तरह कैसे नज़र आ सकती है, ये मैंने रामलीला में देखा। और अब “बाजीराव मस्तानी”...
एक बात तो तय है, भंसाली से ज़्यादा कल्पनाशील निर्देशक आज के परिदृश्य में तो कोई नहीं है फिर चाहे वो विजुअल्स हो, संगीत हो, रंग हों, सेट हो या नृत्य हो। एक बार फिर मैं स्तब्ध था स्क्रीन पर चलती खूबसूरत तस्वीरें देखकर। और शायद उन्हें रणबीर सिंह और दीपिका पादुकोण के रूप में अब जाकर सही कलाकार मिले जो उनकी कल्पना को हू-ब-हू साकार करें। दो वज़नी चरित्र जो अपने तेज से आपको विस्मित किए रहते हैं। बाजीराव को मस्तानी से मुहब्बत होती है तो कुछ समय में आप खुद भी उसकी मोहब्बत में गिरफ्तार होते हुए महसूस करते हैं। यही तो है एक फ़िल्मकार की सबसे बड़ी सफलता। फिल्म में कैमरा एंगल क्या लगे हैं? कलर कैसे हैं? कपड़े कैसे हैं? आदि बातें उतनी महत्वपूर्ण नहीं है...सबसे महत्वपूर्ण चीज़ है भाव... जो भाव निर्देशक प्रेषित करना चाहता है क्या दर्शक उसे महसूस कर रहा है? अगर हाँ, तो निर्देशक सफल है। इस मायने में भंसाली रामलीला में भी सफल थे और एक बार फिर सफल हैं। आपको दुख, खुशी, गुस्सा, बेबसी...सब कुछ महसूस होता है भंसाली की इस 3 घंटे लंबी कहानी में जो कतई लंबी नहीं लगती बल्कि शायद इस भव्यता के लिए इतना समय शायद ज़रूरी था। भव्यता को रचने की कला भी शायद उनके ही पास है, इसे देखकर मुझे जोधा-अकबर की याद आई जो सारे सेट्स, कॉस्ट्यूम्स, संगीत के बावजूद बेजान थी।
विरोध करने वालों की मानसिक अपंगता पर तरस खाएं या नाराज़ हों? बाजीराव के बारे में शायद ही कोई बहुत ज़्यादा जानता हो और महाराष्ट्र के बाहर तो बिलकुल नहीं। वही बाजीराव इस फिल्म को देखने के बाद दर्शकों के मानस में एक सच्चे नायक के रूप में स्थापित होते हैं। इन सतही लोगों ने इतिहास के महान लोगों को भी सतही बना दिया है। इनके अनुसार महान वही है जिसने सिर्फ तलवारें चलाई हैं बल्कि महान इतिहास ने उसे ही माना है जिसने शक्तिशाली होने के बाद भी मनुष्य होने का परिचय दिया है। फिल्म में बाजीराव उस योद्धा और नायक के रूप में उभरते हैं जो खालिस मनुष्य है। वो चतुर है लेकिन संवेदनशील है। उसे प्रेम होता है तो दिल की गहराइयों से होता है जो एक ही संवाद से स्पष्ट हो जाता है “बाजीराव ने मोहब्बत की है, अय्याशी नहीं”। वो बेखौफ इंसान है जो न सत्ता से डरता है, न राजा से, न प्रजा से, न धर्म से, न रिश्तों से...वो वही करता है जो सही है और खुले-आम करता है।
अफसोस की बात ये है कि भारत में इतिहास से कुछ नहीं सीखने की प्रवृत्ति है और इसी के चलते हम गुजरे ज़मानों के बाजीरावों को तो महान होने का दर्जा दे देते हैं लेकिन हम लोग चीमाजी बने रहते हैं। जिस तरह बाजीराव की ताक़त का उपयोग ही उस वक़्त के चीमाओं और भट्टों का स्वार्थ था, बाजीराव को महानता का तमगा देना आज के चीमाओं और भट्टों का स्वार्थ है। बाजीराव अपनी तमाम अच्छाइयों और सफलताओं के बाद भी अपने परिवार से नहीं जीत सके। ये वही परिवार और समाज है जो बेवजह के मुद्दों में अपने आप को और देश को उलझाए रखता है और उसे हमेशा दरिद्र बनाए रहता है। बाजीराव तमाम तरह के पाखंडों से दूर है...उसे दिखाई देता है कि उसके अपनों को म्लेच्छ का धन स्वीकार है लेकिन बेटी नहीं, ये वो गए-गुजरे लोग हैं जिन्हें रंगों में भी धर्म दिखाई दे जाता है। ये समाज कोई आज का बीमार नहीं है, ये बीमारी बहुत गहरी और बहुत पुरानी है।
चलिये फिर से फिल्म पर आ जाते हैं वरना बात निकलेगी तो दूर तलाक जाएगी। जब पर्दे पर गीत “दीवानी मस्तानी” शुरू हुआ तो लगा जैसे दिल बाहर ही आ जाएगा। बेहद खूबसूरत गीत, बेहद खूबसूरत रंग संयोजन और उतना ही खूबसूरत नृत्य। भंसाली ने प्यार किया तो डरना क्या को दोहराने की कोशिश की थी शायद पर उतना नहीं हो पाया। मेरी राय में भंसाली इस वक़्त इंडस्ट्री के सबसे अच्छे संगीतकार हैं। उनके स्तर का संगीत बना पाने की क्षमता शायद किसी में नहीं और शायद इसीलिए उन्होने खुद ही ये बीड़ा उठा लिया है। इस मामले में उनकी तुलना राज कपूर से करने का मन करता है जिनका संगीत का बोध बेहतरीन था। मेरे लिए तो फिल्म का पैसा इस एक गीत ने ही वसूल करवा दिया था।
फिल्म विश्वसनीय है लेकिन 3 चीज़ें हैं जो जबर्दस्ती डाली गई हैं, पहली – काशीबाई की बचपन की सहेली आकार उसे श्राप जैसा कुछ दे देती है कि जैसे मैं तड़प रही हूँ वैसे तू भी तड़पेगी। उस एक दृश्य के बाद उस सहेली का और कोई काम नहीं है। क्यों? आखिर क्यों?
दूसरा – मल्हारी गीत जिसमें बाजीराव अपने सिपाहियों के साथ बहुत ही बढ़िया नृत्य करते हुए नज़र आते हैं। उस मौके पर गीत की कोई आवश्यकता नहीं थी, बल्कि गीत ने जीत को हल्का कर दिया और बाजीराव का जो चरित्र फिल्म ने बनाया था उसे भी हल्का कर दिया। मैं ये नहीं कह रहा कि ऐसा योद्धा हमेशा मुह लटकाए गंभीर ही रहता होगा लेकिन फिल्म में वो अनावश्यक था।
तीसरा – काशी और मस्तानी का मिलन। शायद दोनों के एक साथ नृत्य करने का लालच भंसाली रोक नहीं पाए। हालांकि इसे इस बात की एक कोशिश की तरह भी लिया जा सकता है कि काशीबाई के संवेदनशील स्त्री होने के नाते अगर वो ऐसा करती तो उनका कद और बढ़ जाता और इसी कोशिश में भंसाली थोड़ी-बहुत छेड़-छाड़ करते हैं।
रनबीर सिंह निर्विवाद रूप से आज की पीढ़ी के सर्वश्रेष्ठ हीरो (मुख्यधारा सिनेमा के नायक) हैं। उनमें जो ऊर्जा है वो और किसी में दिखाई नहीं देती। ऐसी ऊर्जा किसी जमाने में शाहरुख खान में थी जो उन्होने फूहड़ फिल्मों में ज़ाया कर दी। रामलीला में गुजराती और यहाँ मराठी लहजा उन्होने पूरी तरह से अपनाया और उच्चारण में कहीं भी गलती नहीं हुई। इतनी बारीकी समर्पण से ही आती है। दीपिका पादुकोण ने बहुत मेहनत की है अपने आपको नायिका से अभिनेत्री बनाने में, एक समय था जब उनसे अभिनय की कोई उम्मीद नहीं की जाती थी और आज वो इस तरह की भव्य फिल्म को सफलतापूर्वक निबाह ले जाती हैं।
अंत में अफसोस ये है कि इतिहास से सीख कर हमें समाज को वो दिशा देनी चाहिए कि एक नहीं कई बाजीराव समाज में मौजूद हों लेकिन अब तो वो एक भी नज़र नहीं आता, चारों तरफ चीमाजी और भट्ट जैसे ठेकेदार ही हैं जो नायकों का उपयोग तो कर लेते हैं लेकिन उनकी महानता को किताबों की पवित्रता में दफन कर देते हैं। युग बदल गए पर हम कभी नहीं बदले...
बहरहाल फिल्म बहुत ही अच्छी है, और मुझे समय मिला तो मैं दोबारा देखूंगा। आप भी देखिये।