The Odyssey - नोलन का महाकाव्य

 

The Odyssey फ़िलहाल सबसे ज़्यादा चर्चा में है। क्रिस्टोफर नोलन ने फ़िल्म का प्रीमियर मुंबई में भी रखा था हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री के लिए। मुझे लगता है उसने मज़ाक उड़ाने के लिए ही रखा होगा, और तो कोई कारण नज़र नहीं आता। जिस इंडस्ट्री में धुरंधर को एपिक मानने वाले लोग हों, जो बड़ी फ़िल्म जवान, पठान को मानते हों उन्हें odyssey दिखाना आईना दिखाने के समान ही है, पर नोलन निराश ही होंगे, क्योंकि ये वो लोग हैं जो बाद में आपस में बातें करेंगे कि ऐसा #$%यापा नहीं करने का है अपन को। 


खैर, ये लोग तो वही नाले की गैस से चाय बनाते रहेंगे, फ़िलहाल बात करें नोलन के इस महाकाव्य की जो होमर की किताब पर आधारित है। ऑडिसस की कहानी के अलग-अलग वर्ज़न प्रचलित हैं। मैंने ट्रॉय देखी थी और मुझे लगता था कि अकीलीज़ हीरो है, मुझे ऑडिसस के बारे में कुछ भी पता नहीं था। और जिन्हें पता न हो वे ट्रॉय फ़िल्म देखकर ऑडिसस को एक साइड किक की तरह ही जानेंगे जो हीरो अकीलीज़ को युद्ध के लिए मनाने जाता है और अंत में अपने राजा का सबसे वफ़ादार साबित होता है जब ट्रोजन हॉर्स वाला आइडिया उसे आता है। फ़िल्म अकीलीज़ के मरने पर खत्म होती है। हालाँकि फ़िल्म देखकर अंत में मुझे न अकीलीज़ हीरो लगा, न ही ऑडिसस। क्योंकि हीरो वो होता है जो सच के साथ खड़ा हो, जो छल न करे। जबकि ये दोनों लोग एक बुरे शासक के साथ थे और एक अच्छे शासक को बर्बाद कर दिया था। और इसके लिए भी इन्हें छल का सहारा लेना पड़ा। हीरो तो हेक्टर था। 


पर फिर आती है नोलन की ओडिसी जो ऑडिसस को इतने बड़े परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करती है कि अकीलीज़ महज एक छोटा सा पात्र लगता है। कल देखी थी मैंने फ़िल्म पर फ़िल्म आज तक मुझसे चिपकी हुई है। मैं भूल नहीं पा रहा उसके दृश्य, उसकी घटनाएं, उनका मनोविज्ञान। यही तो होती फ़िल्म की कला। जब कविता भाव सम्प्रेषण का सर्वश्रेष्ठ माध्यम थी तब होमर ने इसे कविता के रूप में लिखा, आज जब फ़िल्म सम्प्रेषण का सर्वश्रेष्ठ माध्यम है तो नोलन ने इसे एक बार फिर से लिखा है। ऑडिसस की कहानी अलग अलग युगों में अलग नजरिए से देखी और लिखी गई है, उसी कड़ी में अब नोलन का नजरिया भी जुड़ गया है। जो असलियत के सबसे करीब है। नोलन ने इसे ईश्वरीय चमत्कारों की श्रंखला बनाकर दिखाने की बजाय उस तरह दिखाया है जैसी आम ज़िंदगी होती है। और ज़िंदगी ऐसी ही होती है, वो तो कविता में किसी पात्र की महिमा का बखान करने के लिए कवि अलौकिक रूपकों का सहारा लेता है। जैसे ऑडिसस की समुद्र यात्रा के दौरान देवता जिउस अपने हाथ से उसके जहाज पर बिजलियाँ फेंकता है, नोलन ने पहले विचार किया था कि भगवान को दिखाए और उसे अपने हाथ से बिजलियों से हमला करते दिखाए लेकिन फिर उन्होंने इसे रीअलिस्टिक ही रखना ठीक समझा। ये तो इंसान की कल्पना है कि आसमाँ में कोई है जो ऐसा कर रहा है। 


खैर, ये फ़िल्म ट्रॉय के युद्ध के बाद ऑडिसस की घर वापसी की लंबी और भयानक यात्रा की कहानी है। 10 साल के युद्ध के बाद ऑडिसस को फिर दस साल लग गए वापस घर पहुँचने में। वापसी में उसका काफिला राह भटक जाता है और एक के बाद एक मुसीबतों में फँसता जाता है। इसी बीच उसे एक बीच पर एक लड़की रख लेती है जो उसे रोज कमल खिलाती है। बाद में वो बताती है कि रोज कमल खाने से बुद्धि और याददाश्त खत्म हो जाती है। वहाँ ऑडिसस सात साल रहता है। हमें कमल खाते 12 साल हो गए हैं, बुद्धि निरंतर खत्म होती जा रही है, जाने वापस सामान्य हो पाएंगे या नहीं?


उधर घर पर रानी और राज्य को हथियाने के षड्यन्त्र चल रहे हैं, ऑडिसस के बेटा असहाय है। 


जो इसे ट्रॉय की तरह देखना चाहते हैं वे निराश होंगे। ये फ़िल्म एक युद्ध की कहानी नहीं है, ये युद्ध के बाद की कहानी है, जिसमें पश्चाताप है, निराशा है, डर है और संघर्ष है। इस फ़िल्म ने मेरे नजरिए को कुछ हद तक मान्यता दी है कि ऑडिसस उन अर्थों में नायक नहीं है। उसने कपट से ट्रॉय को नष्ट किया और जब ट्रॉय का विध्वंस चल रहा होता है, सैनिक उसे लूट खसोट रहे होते हैं तो ऑडिसस को इसका आभास भी होता है कि उसने गलत किया है। उसे अपनी गलतियों की सज़ा भी भोगनी पड़ती है। अपनी वापसी की यात्रा में वो लुटेरा बन जाता है लेकिन मानवीय नजरिए से देखें तो ये उसके लिए ज़िंदा रहने का एकमात्र उपाय था।


मैं अगर लिखता चला जाऊँ तो होमर जितना लंबा लिख दूँगा, इतनी खलबली है दिमाग में। पर फ़िल्म के लिहाज से ये एक मील का पत्थर है। फोटोग्राफी तो कमाल की है ही, पर जिस तरह से कहानी और उसके दर्शन को दिखाया है वो लाजवाब है। संवाद बेहतरीन हैं, इतने मानीखेज संवाद किसी हिन्दी फ़िल्म में कब सुने थे याद नहीं। अब तो हिन्दी में माँ बहन की गालियों के अलावा कुछ अलग आ नहीं रहा। गहरे संवाद नहीं लिखे जा रहे, ऐसे संवाद जो एक पंक्ति में पूरा दर्शन बयां कर दें। 


मैट डेमन ने ऑडीशीयस को जिया है, किरदार में उतर कर जिया है। पूरी फ़िल्म में वही छाए हुए हैं, बाकी सब तो सपोर्टिंग ही लगते हैं। हेलेन को ग्रीक mythology में सबसे खूबसूरत औरत माना जाता है। ट्रॉय में उसी अनुसार कास्टिंग की गई थी। इस फ़िल्म में हेलेन को ब्लैक दिखाया है जिसकी आलोचना भी हुई थी कि ये ब्लैक अपीज़मेंट है, और ये मुझे सही लगता है। हॉलीवूड में आजकल ये बहुत चल रहा है। इसी अपीज़मेंट के चक्कर में बहुत बर्बादी हुई है। कैप्टन अमेरिका भी बदल कर ब्लैक कर दिया था जिसे लोगों ने सिरे से नकार दिया। भेदभाव बहुत गलत है लेकिन अपीज़मेंट भी नहीं होना चाहिए। इस आलोचना का जो जवाब नोलन ने दिया वो भी नाकाफ़ी है, उनके अनुसार मेरे लिए चेहरा नहीं जो उस कैरिक्टर को अच्छी तरह निभा सके वो महत्वपूर्ण है, जबकि हेलेन के मुश्किल से चार दृश्य हैं, और उनमें भी करने को इतना कुछ खास भी नहीं है। ट्रॉय में मेलेनऔस मर जाता है जबकि इसमें उसे ज़िंदा दिखाया है और हेलेन वापस उसके साथ आ गई है। अलग-अलग मान्यताएं हैं, कुछ कहते हैं कि पेरिस मर गया था और हेलेन वापस आ गई थी, कुछ कहती हैं कि नहीं आई थी। 


खैर, आपने अगर फ़िल्म नहीं देखी है तो कुछ बहुत बेहतरीन मिस कर दिया है। 


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