पूजा मेरी जान - नाम पर न जाना

 


मैं तो हिन्दी फ़िल्में देखता/देखती ही नहीं हूँ.. अरे हिन्दी में कहाँ अच्छी फ़िल्में बनती हैं? 

ये सब डायलॉग होते हैं लोगों के लेकिन जब कोई अच्छी फ़िल्म आती है तो यही लोग उसे छोड़कर के जी एफ़ या पुष्पा देखने चले जाते हैं, अच्छी फ़िल्म अपनी मौत मर जाती है और फिर अच्छी फ़िल्में बनाने वाले दर-दर भटकते हैं क्योंकि कोई अच्छी फ़िल्म में पैसा लगाने को राज़ी ही नहीं होता। 

दर्शक का इतिहास देखिए तो ये हर युग में ग़ाफिल रहा है, कभी मनमोहन देसाई को सर पर उठा रखा था, फिर करण जौहर की गोद में बैठ गया, कभी आदित्य चोपड़ा और अब साउथ के कचरे के ढेर पर बैठा है, और शिकायत इसकी यही रही है कि हिन्दी में अच्छी फ़िल्में कहाँ बनती हैं? जो देखोगे वही बनेगा बाँगड़ू। तो जिस फ़िल्म की हम बात करने वाले हैं ये भी ऐसी ही एक फ़िल्म है जो चार सालों तक अटकी रही, कोई रिलीज ही नहीं कर रहा था क्योंकि एक तो इसमें कोई हीरो नहीं है, दूसरा एक सामाजिक मुद्दे पर आधारित है, कोई रोमांस, कोई फाइट, कुछ नहीं है लेकिन फ़िल्म वाकई देखने लायक है। 

फ़िल्म में एक आत्महत्या है जिसका केस चलता है और उस केस के ज़रिये समाज को बहुत से तमाचे जड़े गए हैं। महिलाओं का एक आंदोलन चल रहा है पुरुषों के खिलाफ़ जिसमें पुरुषों की रेपिस्ट मानसिकता पर चोट की गई है, लेकिन ये फ़िल्म उस मानसिकता की भी तह में पहुँच जाती है और ऐसा मनोवैज्ञानिक सच हमारे सामने रखती है जिससे इन्कार नहीं किया जा सकता और वो भी इस तरह से कि वो हार्ड हिट करे। ऐसिड अटैक, मर्डर, रैप, ये सब जहाँ से पैदा होता है वो बीमारी क्या है, उसकी जड़ क्या है उसकी बेहतरीन पड़ताल करती है ये फ़िल्म। मैं जान बूझकर कहानी का कोई सिरा नहीं खोल रहा हूँ, मैं चाहता हूँ कि जब आप देखें तो फ़िल्म की जो भी शॉक वैल्यू है वो बनी रहे। खास तौर पर पुरुषों के लिए इसे देखना अनिवार्य होना चाहिए। जो विषय इस फ़िल्म ने उठाया है अगर समाज उसे सचमुच समझ ले तो सब कितना आसान हो जाए। 

फ़िल्म ज़्यादातर हिस्से में एक कोर्ट रूम ड्रामा है, जो थ्रिलर के रूप में चलती है। एक छोटी सी घटना से शुरुआत होती है जो अमूमन रोज ही कहीं न कहीं घटित होती ही है। एक लड़का एक लड़की को प्रपोज करता है और लड़की इन्कार कर देती है। लड़का इस रीजेक्शन को सह नहीं पाता, अब इसके बाद क्या होगा इसकी कई संभावनाएं हैं, लड़का लड़की पर ऐसिड अटैक करेगा, वो उसका बलात्कार करेगा, वो उसका चरित्र हनन करेगा, या अपने आप को नुकसान पहुंचाएगा, पर वो सीधा नहीं बैठेगा। बस इसी मानसिकता पर सशक्त प्रहार है ये फ़िल्म। 

फ़िल्म में कोई स्टार नहीं है, स्टार इसका कथानक है। हुम कुरैशी इसकी एकमात्र स्टार वैल्यू है लेकिन हीरोइन के कंधों पर कब कोई फ़िल्म चली है? इसके अलावा हमेशा बेहतरीन विजय राज़ हैं। ये दोनों वकील बने हैं जो कोर्ट में आमने-सामने लड़ रहे हैं। मृणाल ठाकुर इसकी केन्द्रीय भूमिका में है जो ठीक ही है। 
फ़िल्म ज़ी5 पर उपलब्ध है। 

मडोक फिल्म्स आज के समय में सबसे बड़ा production हाउस है, ये उसी की फ़िल्म है और इसके बावजूद ये 4 सालों तक रिलीज़ नहीं हो पाई। क्यों? क्योंकि कोई खरीद ही नहीं रहा था, क्यों? क्योंकि स्टार नहीं है इसमें, गाने नहीं हैं इसमें, आइटम सॉन्ग नहीं है इसमें। बस हिन्दी फ़िल्म उद्योग इन्हीं बकमोदियों में बर्बाद है। जब दिनेश विजान जैसा निर्माता अपनी फ़िल्म रिलीज़ नहीं करवा पा रहा है तो छोटे-मोटे की तो हैसियत ही क्या? जब बड़े परदे पर नहीं आ सकी और बड़े ott भी वादा करके मुकर गए तो आखिर उन्होंने ज़ी5 पर रिलीज़ किया है। 
हाँ, फ़िल्म का नाम कुछ और होता तो बेहतर होता। ये नाम किसी c ग्रैड फ़िल्म का आभास दिलाता है। पहले तो मैं भी इसे नाम पढ़कर ही स्किप करके आगे बढ़ गया था पर एक दो रिव्यू देखे और फिर मेरी फैव्रट हुम कुरैशी भी है फ़िल्म में तो सोचा एक बार शुरू करके देखता हूँ। शुरू की तो फिर बंद नहीं कर पाया। विचार बिल्कुल नया और बेहतरीन है। अगर आप वाकई अच्छी फ़िल्में देखने के शौकीन हैं तो ज़रूर देखिए। 

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