द नाइट मैनेजर, इसी नाम से 2016 में आई ब्रिटिश टीवी सिरीज़ की रिमेक है। आज जब दर्शकों को दुनिया का सारा कंटैंट उपलब्ध है, ऐसे में इसे हिन्दी में बनाने का खयाल क्यों आया पता नहीं, ये बड़ा चैलेंज था और ये चैलेंज अगर कुछ हद तक क़ामयाब कहा जाएगा तो उसका कारण सिर्फ़ और सिर्फ़ “अनिल कपूर” हैं।
कहानी
का लब्बो-लुआब ये है कि शान भाई नौसेना से मुक्त होकर ढाका के एक आलीशान होटल में
नाइट मैनेजर का काम कर रहे हैं। एक रात एक मासूम सी 14 साल की लड़की वहाँ से भागने
में शान भाई से मदद मांगती है। लड़की फ्रेडी के चंगुल से आज़ाद होना चाहती है और शान
चूँकि एक भारतीय है और क़ाबिल आदमी है, उसे उसमें एक मददगार नज़र आता है। शान
पहले तो इंकार करता है पर लड़की किसी तरह उसे राज़ी कर ही लेती है पर इतना आसान नहीं
है ये काम। फ्रेडी शैलेंद्र रुंगटा उर्फ़ शैली (अनिल कपूर) के साथ अवैध हथियारों का
काम करता है, और बहुत ताकतवर लोग हैं। शान को लड़की ये इन्फॉर्मेशन
उसके फोन मे दे देती है और शान इंडियन इंटेलिजेंस को। दोनों भागने की कोशिश करते
हैं पर लड़की मारी जाती है। शान के दिल में ये बात शूल की तरह गड़ जाती है। वो नौकरी
छोड़ कर चला जाता है।
दो
साल बाद शिमला में एक रिज़ॉर्ट में उसकी मुलाक़ात शैली से होती है। एक बार फिर सब
ताज़ा हो जाता है। घटनाक्रम कुछ यूं चलता है कि उसे शैली के inner
circle में
पहुंचा दिया जाता है। वहीं से शैली को ख़त्म करने कि कोशिशें होती हैं।
सिरीज़
मैंने बस यूं ही पूरी देख ली, याने देखने की बहुत उत्कंठा भी नहीं हुई और बुरी भी
नहीं लगी। गुनगुनी-गुनगुनी सी लगी। मैंने इसकी original सिरीज़ भी देखी दो एपिसोड
पर ये कहना होगा कि अनिल कपूर ने मुझे इस रिमेक पर ही टिकाये रखा। अनिल कपूर को स्क्रीन
पर देखना बहुत अच्छा लगता है। यूं ही नहीं किसी ज़माने में अमिताभ बच्चन के लिए
ख़तरा बने थे। 80 के दशक के उत्तरार्द्ध में ख़ान तिकड़ी के आने से पहले अनिल कपूर
सुपर स्टार थे। मुझे याद है राम लखन, तेज़ाब, ईश्वर, रखवाला, ये चार फ़िल्में एक के बाद
एक सुपर हिट हुई थी और अखबारों, पत्रिकाओं में लिखा जाने लगा था कि अनिल कपूर अमिताभ को
रिप्लेस कर देंगे। वे स्टार तो हैं ही पर अच्छे अभिनेता भी हैं। शैली के किरदार
में उन्होंने बांधे रखा। वैसे इस सिरीज़ में परफॉर्मेंस सभी का बेहतरीन है पर अनिल
कपूर की वजह से इसे देखा जा सकता है।
मैंने
बतौर अभिनेता अदित्य रॉय कपूर को कभी गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन इस सिरीज़ में उनका
काम क़ाबिले-तारीफ़ है। शान का किरदार जिस subtle तरीक़े से उन्होंने निभाया
है, वो
इम्प्रैसिव है। जहाँ आँखों से चेहरे से काम लेना था, ,वहाँ उन्होंने लिया है।
तिलोत्तमा शोम बहुत अच्छी अभिनेत्री हैं पर इस किरदार में मुझे पसंद नहीं आई।
शोभिता धुलीपला को अभिनय नहीं आता और उस पर भी हिन्दी बोलना तो बिल्कुल नहीं आता।
सबसे कमजोर कड़ी वही है। उन्होंने शैली की गर्ल फ्रेंड का किरदार निभाया है। शास्वत
चटर्जी का फ़िल्म ‘कहानी’ में निभाया किरदार ‘बॉब बिस्वास’ से इतना प्रसिद्ध हो गया
था कि उस किरदार को लेकर ही एक पूरी फ़िल्म लिखी गई और जिस एक्टर ने उस कैरक्टर को
जीवंत किया था उसे उसमें नहीं लिया गया, नतीज़ा, फ़िल्म डूब गई, साथ ही किरदार भी। बॉलीवुड
की यही बहुत बड़ी समस्या है, एक फ़िल्म सफल होती है तो उसके असल कारणों को छोड़ दूसरी ही
लकीर पीटने लगते हैं, जैसे “जॉली एलएलबी” अगर अपनी राइटिंग की वजह से अद्वितीय
थी तो अर्शद वारसी का अभिनय भी उसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा था, विषय को लाभकारी मान कर उसका sequel बनाया और उसमें नॉन एक्टर अक्षय
को ले लिया। ख़ैर, उन्हीं शास्वत ने शैली के खास दोस्त ब्रिज का किरदार
निभाया है, जो समलैंगिक है। कहने की ज़रूरत नहीं कि बहुत विश्वसनीय
तरीक़े से निभाया है। शैली के एक और दोस्त का नाम है “जयू”। सिरीज़ का पहला भाग
फरवरी में आया था जो मैंने तभी देखा था, दूसरा भाग अभी आया है, इसके भी दो एपिसोड देख
लेने के बाद तक मेरे दिमाग की बत्ती नहीं जली थी कि ये एक्टर कौन है, अचानक मैंने जयू को पहचान लिया। 90 के
दशक में एक गीत बहुत हिट हुआ था – “हम से तुम दोस्ती कर लो”। फ़िल्म थी “नरसिम्हा”
जिसके हीरो तो थे सनी देओल पर एक और हीरो भी इसी फिल्म से लॉंच हुआ था - रवि बहल।
रवि बहल बहुत अच्छे डांसर थे, पर बतौर हीरो उनका करियर उठ नहीं पाया और धीरे-धीरे वे
गायब हो गए। कुछ बरसों बाद डांस शो “बूगी-वूगी” में नज़र आए जिसे उनहोंने जावेद
जाफरी के साथ प्रस्तुत किया था। उसके बाद वे फिर गायब हो गए और सीधे इस सिरीज़ में प्रकट
हुए। उस वक़्त तो उनका काम उल्लेखनीय नहीं था पर इस सिरीज़ में बढ़िया काम किया है।
ऐसे ही एक और भूले-बिसरे अभिनेता के दर्शन हुए। उसका भी इतिहास आपको बताता चलूँ। 2001 में फ़िल्म आई थी “छल”। इसमें दो नए अभिनेता नज़र आए। कम से कम मैंने उन्हें पहली बार देखा था। फ़िल्म भी अच्छी थी और दोनों actors भी। दोनों का चेहरा-मोहरा हीरो की पारंपरिक अवधारणा पर फिट नहीं बैठता था। एक थे के के मेनन और दूसरे प्रशांत नारायण। उस फ़िल्म के बाद के के के बजाय प्रशांत नारायण की माँग ज़्यादा हो गई थी। उन्हें काफी काम मिलने लगा था लेकिन सफलता उनके सर चढ़ गई थी, अब वो कोई शाहरुख या सलमान तो थे नहीं, सो धीरे-धीरे लोग दूर होते गए, इसके उलट के के धीरे-धीरे ऊपर चढ़ते गए और आज एक अलग ही मक़ाम है उनका। यही प्रशांत नारायण सेकंड सीज़न के आखिरी एपिसोड में नज़र आए।
कुल
मिलाकर ठीक-ठाक सिरीज़ है, देखी जा सकती है।
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रवि बहल इस सीरीज के निर्माता टीम में भी हैं शायद।
जवाब देंहटाएंअरे वाह, ये पता नहीं था
हटाएंमैं कंटेंट ओर अभिनय की दृष्टी से फिल्म या सिरीज देखता हुं.ओर कमाल अभिनय के कारण ही मैने इसे देखा.वाकई सिरीज अच्छी बन पडी है.ओर आपने इसका सही मूल्यांकन किया हैं दोस्त.
जवाब देंहटाएंशुक्रिया
हटाएंमैंने देखी नहीं है अभी तक ये सिरीज़, आपने अच्छा लिखा है। फिल्म के एक्टर्स के बारे में काफी ज्ञानवर्धक और रोचक लिखा है आपने। वैसे आदित्य रॉय कपूर की वजह से इसे देखने का मन नहीं हुआ कभी लेकिन आपने तारीफ की है आदित्य के काम की तो देखना ही पड़ेगा।
जवाब देंहटाएंएक बार देखी जा सकती है।
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