पाताललोक सीजन 2: हाथीराम का कहर

 


मुझे यक़ीन हो गया है कि ये आदमी दर असल “हाथीराम चौधरी” ही है जो अपनी नौकरी से त्रस्त होकर उसे छोड़ आया है और “जयदीप अहलावत” के नाम से अभिनय करने लगा है, वरना कोई इतना असल नहीं हो सकता किसी किरदार में। कोई कह ही नहीं सकता कि ये हाथीराम नहीं है। किसी किरदार के कण-कण को अपने में उतार ले ऐसा तो नहीं देखा हमने। 

ख़ैर, पाताललोक 2 के बारे में लिखते हुए कई लोग कहते देखे कि पहले सीज़न जैसा नहीं है। कैसे होगी भाई? इसकी ज़मीन अलग है, इसका संसार अलग है और इस ज़मीन, इस संसार को भी उसी मेहनत और ईमानदारी से रचा गया है, इतना काफ़ी है। आम तौर पर दूसरा सीज़न पहले वाले की प्रसिद्धि को भुनाने के लिए ही बनाया जाता है और इसी कोशिश में उसका बंटा ढार हो जाता है। अगर दूसरे सीज़न को भी एक स्वतंत्र व्यक्तित्व की तरह ट्रीट किया जाये तो अच्छा बनने की उम्मीद होती है। पर पहले सीज़न की हिट चीजों को रिपीट करने के चक्कर में नया रचने से लोग घबराते हैं। शुक्र है पाताललोक टीम इस जाल में नहीं उलझी। एक नई कहानी, नए किरदार और नई परिस्थितियाँ रची गई हैं। कहानी की अपनी एक दुनिया होती है और वही कहानी सफल है जो दर्शक को अपनी उस दुनिया का हिस्सा बना ले। इस पैमाने पर ये सिरीज़ सौ प्रतिशत खरी उतरती है तो कोई फर्क नहीं पड़ता कौन क्या कहता है। ये एक पैमाना काफी है।

सीज़न वन से इस कहानी का सिर्फ इतना ही लेना-देना है कि किरदार सारे वही हैं, कहानी बिलकुल नई है। अंसारी अब एसीपी बन चुका है, हाथीराम अब भी वहीं है, हालांकि विर्क अब नरकोटिक्स में चला गया है। शुरुआत होती है होटल “नागालैंड सदन” में हुए एक क़त्ल से। ये क़त्ल नागालैंड की एक बहुत बड़ी हस्ती का हुआ है जो एक समिट के लिए दिल्ली आया हुआ था। हाइ प्रोफ़ाइल केस है, जो अंसारी को मिलता है। उधर हाथीराम के पास एक औरत अपने बच्चे के साथ आती है, जिसका पति लापता है। हाथीराम अपने नाज़ुक दिल से मजबूर है, तो उसके पति को ख़ुद खोजने लगता है। नागालैंड वाला केस और इस आदमी का केस आगे चलकर एक दूसरे में मिक्स हो जाते हैं, और एक बार फिर अंसारी और हाथीराम एक साथ आ जाते हैं। दोनों नागालैंड पहुँचते हैं और वहाँ इस जाल में उलझते चले जाते हैं। 

कहानी नागालैंड में चलती है तो ज़ाहिर है कि बाकी किरदार वहीं के चाहिए और इसीलिए वहाँ के कलाकारों को एक बेहतरीन अवसर मिला है इस सिरीज़ में बड़े किरदार निभाने का। पर हर एक चीज़ पर भारी है एक हाथीराम चौधरी। जयदीप अहलावत ने इस पूरी कहानी में कई ऐसे पल दिये हैं जो बार-बार देखने लायक हैं, जो दिल के अंदर उतर जाते हैं। उनके अलावा उनके क़ाबिल साथी रहे हैं अंसारी का किरदार निभाने वाले इश्वाक सिंह। अंसारी के किरदार की नर्म दिली, उसके चार्म को बख़ूबी उतारा है इश्वाक सिंह ने। इस बार सर्प्राइज़ एलिमंट थे “नागेश कुकनूर” जो अपनी निर्देशकीय पारी खेल चुके और अब उन्हें अभिनय करते रहना चाहिए। गुल पनाग पहले की ही तरह अपने आम ग्रहणी के किरदार में रमी हुई हैं, जिन्हें लगता है इसमें उनके करने के लिए कुछ नहीं था वे फर्जी फेमिनिस्म के मारे हैं। तिलोत्तमा शोम को एक बार फिर पुलिस ऑफिसर का किरदार मिला है और वे अपने उसी अंदाज़ में हैं, बहुत खास कुछ है नहीं उनके करने के लिए। अभिनय सभी का अच्छा ही रहा है, यहाँ तक कि उस छोटे बच्चे ने भी कमाल किया है जिसकी माँ उसकी आँखों के सामने मर जाती है। 

पाताललोक की सबसे अच्छी बात इसका नाम है जो बहुत गहराई लिए है। ये पाताल लोक की कल्पना को सही अर्थों में प्रस्तुत करता है। पाताल लोक कहीं धरती के नीचे नहीं है, न ही स्वर्ग आसमानों में है। सब कुछ यहीं है, नीचे और ऊपर की कल्पना लोगों के स्तर के लिए उपयोग में लाई गई है। हम इसी पाताल लोक में रहते हैं। ये वो लोक है जहां अपराध अपने पूरे घिनौनेपन में घटते हैं और उनके घटने के लिए ये लोक उपयुक्त वातावरण मुहैया कराता है। सीज़न वन का हथौड़ा त्यागी एक नज़र देखने में दानव नज़र आता है, लेकिन उसके अतीत में झाँके तो समझ आएगा कि इस दानव का जन्म कैसे हुआ। पाताल लोक अपने किरदारों की चमड़ी में उतर कर उनकी बनावट का रेशा-रेशा खोल देती है। कोई भी इंसान कैसा बना है, ये इस पर निर्भर करता है कि उसे कैसी मिट्टी, पानी और धूप मिली है। कुछ लोग इनके बीच भी इस तरह बढ़ते हैं कि वे ही बाकियों को उम्मीद की एक किरण दिखाते हैं और इस उम्मीद को हमेशा ज़िंदा रखते हैं। ये वे लोग भी हो सकते हैं जिन्हें सब जानते हैं, या ये लोग हाथीराम की तरह भी हो सकते हैं, जिसे न कभी कोई तमगा मिलता है, न पहचान पर ये उसकी बनावट ही है कि वो अपना काम किए जाता है, तमाम अवरोधों के बावजूद। 

पहले सीज़न में बहुत सी लेयर्स थीं जो इस सीज़न में कम हैं पर फिर भी अपने आपमें ये सम्पूर्ण है। इस दुनिया में जो कुछ भी घटता है उसके पीछे क्या-क्या घाट चुका है ये हमें कभी पता ही नहीं चलता और अक्सर घटनाओं के बारे में हमारी जानकारी झूठ होती है। सच बस यही है कि हम जो कर रहे हैं, वो पूरी निष्ठा से करते रहें, हाथीराम की तरह क्योंकि सुखी तो बेईमान भी नहीं है पर उसे संतुष्टि भी नहीं मिल पाती।

ये देखना सुखद है कि आज फिल्म उद्योग में कई बेहतरीन अभिनेता सक्रिय हैं, जयदीप अहलावत फिलहाल बाकी सब से आगे निकल चुके हैं। जयदीप के कुछ दृश्य इतने खूबसूरत हैं कि बहुत कम दृश्य बने होंगे उनके मुक़ाबले। जब एयरपोर्ट पर अपने इतने करीबी की लाश देखता है तब उसके चेहरे के भाव, इतने नपे तुले जैसे तराजू से तौल कर दिये हों, या फिर वो दृश्य जहां अपने किए काम का श्रेय लेकर फोटो खिचवाती टीम के सामने ज़मीन पर बैठे बिस्किट खा रहे हैं, यहाँ दर्द को बोल कर नहीं अपनी आँखों और शरीर के जरिये दिखाना था, और मुझे नहीं लगता मैंने इससे बेहतर कभी देखा हो। ये देखना दिलचस्प होगा कि वे अपने अंदर के इस अभिनेता को जीवित रखते हैं या राजकुमार राव की तरह “विकी विद्या का वो वाला विडियो” जैसी वाहियात फिल्मों के चक्कर में पड़कर इसकी हत्या कर देते हैं। 

पाताल लोक सीजन 1 की समीक्षा यहां पढ़ें - 

https://aniruddha-sharma.blogspot.com/2023/04/blog-post.html

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टिप्पणियाँ

  1. देवेंद्र सिंह ठाकुर9:11 am

    भाई सच में एक बेहतरीन किरदार निभाया है अहलावत साहब ने, आप लेखनी के सिपाही हैं तो बेहतर शब्दों में व्यक्त कर सकते हैं बाकी एक बात कहना जरूरी हैं मेरी स्कूलिंग हरियाणा से ही है भाषा पर इनकी पकड़ होना लाजमी है जो सोने पर सुहागा प्रतीत होती है न कि बच्चन साहब की अवधी सुन कर हंसी भी नहीं आती है
    जय हो

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