अंधाधुन - इसे नहीं देखना गुनाह है


 

रात 11.30 बजे मन किया कि थोड़ी देर कोई फ़िल्म देखी जाए। "अंधाधुन" लगा ली, सोचा था थोड़ी देर में सो जाएँगे पर उसके बाद सोना अपने हाथ नहीं रहा, फ़िल्म ने गर्दन से पकड़ लिया और ख़त्म होने तक नहीं छोड़ा।

इसे कहते हैं फ़िल्म। 

एक-एक चीज़ जबरदस्त (गानों को छोड़कर)।

थ्रिलर की जहाँ बात हो तो बॉलीवुड में श्रीराम राघवन के आस-पास भी कोई नहीं फटकता। मैंने ये तभी महसूस किया था जब "एक हसीना थी" देखी थी। वो शायद उनकी पहली फ़िल्म थी। उसके बाद "जॉनी गद्दार", बदलापुर और अब अंधाधुन...थ्रिल उत्तरोत्तर बढ़ता ही गया। 

अंधाधुन सर्वश्रेष्ठ है। मैं अब तक उसके ख़ुमार से बाहर नहीं आया हूँ। आयुष्मान को टाइप कास्ट कर दिया गया था लेकिन इस फ़िल्म में किरदार अलग है और उन्होंने पूरी तरह जस्टिफाई किया है।

मुझे आश्चर्य होता है कि तब्बू आजकल दिखाई क्यों नहीं देती? महीन से महीन भाव वे प्रदर्शित कर सकती हैं। इंसान को कोई अपराध करने पर अंदर जो गिल्ट और डर होता है और उससे जैसे बॉडी लैंग्वेज बदल जाती है वो उन्होंने परफेक्टली निभाया है। 

दो चीजें ऐसी हैं जो निर्देशक को बेहद प्रिय हैं और मुझे भी हैं - एक पुराने गीत और दूसरी पुणे।

उनकी हर फिल्म में पुराने गीत एक किरदार की तरह उपयोग होते हैं, इस फ़िल्म में तो पुरानी फिल्मों के दृश्य भी उपयोग किये गए हैं। अनिल धवन को लेकर बहुत ही बढ़िया किरदार रचा है। लंबे अरसे के बाद उन्हें पर्दे पर देखा। 

पुणे- मैंने अपने जीवन का बेहतरीन समय वहाँ गुज़ारा है। फ़िल्म में जानी पहचानी गलियाँ और buildings देखकर नॉस्टैल्जिक फील होता है।

एक बात मुझे समझ नहीं आती, पुराने गीतों का इतना अच्छा टेस्ट होने के बाद भी श्रीराम राघवन अपनी फिल्मों के गीत ऐसे क्यों नहीं बनवा पाते जिन्हें याद रखा जाए? बदलापुर में 2 गीत अच्छे थे पर अमर नहीं थे।

राधिका आप्टे ने खाना-पीना शायद बन्द कर दिया है जिससे उनके दाँत और मुंह और बड़ा खुलने लगा है, इतनी अति भी अच्छी नहीं। मुझे वे बदलापुर में ज़्यादा अच्छी लगीं थीं।

कुल मिलाकर अंधाधुन ऐसी फिल्म है जिसे नहीं देखना afford नहीं किया जा सकता। 😊😊

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