बर्लिन - एक अलग सी फ़िल्म


जिन्हें अच्छी फ़िल्मों की तलाश रहती है, उनकी नज़र अगर “बर्लिन” पर नहीं पड़ी है तो पड़वाने के लिए ही ये लिख रहा हूँ। बाकी जिन्हें मसाले का कीड़ा काटा हुआ है, वे न देखें, उन्हें बिलकुल पसंद नहीं आएगी।

“बर्लिन” के निर्देशक “अतुल सभरवाल” ने एक बात बहुत अच्छी कही थी कि “छोटी हो या बड़ी, हर फ़िल्म को थिएटर में दिखाया जाना चाहिए”। पर क्या करें, अब मेरा मुँह न खुलवाइए वरना बहुत सा सेंसर करने लायक मसाला निकलेगा। और सबसे ज़्यादा गालियाँ इस जनता को पड़ेगी जो रोते नहीं थकती कि बॉलीवुड अच्छी फ़िल्में नहीं बनाता और “पुष्पा” देखकर औंधी हो जाती है।

ख़ैर, बर्लिन एक पीरियड ड्रामा है। 1993 के समय की कहानी जब भारत की इंटेलिजेंस एजन्सि एक गूंगे-बहरे आदमी अशोक कुमार को जासूस होने के शक़ पर गिरफ़्तार करती है और उससे पूछ-ताछ करने के लिए एक मूक-बधिर स्कूल के टीचर पुश्किन को बुलाया जाता है। पूरी फ़िल्म इसी पूछ-ताछ के इर्द-गिर्द बुनी गई है। इसी बातचीत से हम उस समय के आसपास घटी घटनाएँ भी देखते हैं और इन दोनों किरदारों के जीवन में भी झाँकते चलते हैं। इनके साथ एक और किरदार है इंटेलिजेंस ऑफिसर सोंधी का। इस पूछताछ में पुश्किन इस जासूसी और राजनीति की झूठी और खतरनाक दुनिया में फँसता चला जाता है।

चूँकि फ़िल्म एक मूक-बधिर इंसान के नज़रिये से घटनाओं को बताती है, तो अधिकांश भाग चुपचाप ही चलता है, हमें उस इंसान की खामोश दुनिया को महसूस करवाते हुए। लोग बातें कर रहे हैं पर हमें नहीं सुनाई देता क्या बातें कर रहे हैं, क्योंकि ये उस बहरे आदमी का बयान है, और उस बयान में शब्द कैसे आ सकते हैं? मगर फिर भी फ़िल्म कहीं बोर नहीं करती। हालाँकि एक स्पाइ थ्रिलर होने के नाते थोड़ी और टाइट हो सकती थी पर फ़िल्म की गति को जान-बूझकर धीमा रखा गया है। ये धीमी गति भी मगर खलती नहीं है।

फ़िल्म की सबसे अच्छी बात जो आपको बांधने में कामयाब होती है वो है अभिनय। तीन मुख्य पात्र हैं, अशोक कुमार का सबसे महत्वपूर्ण किरदार निभाया है “इश्वाक सिंह” ने जिन्हें आप पाताललोक में अंसारी के किरदार में देख चुके हैं। ये अभिनेता चुपचाप बहुत आगे निकल चुका है। इस फ़िल्म में तो कमाल ही कर दिया है। कितनी मेहनत करते हैं आजकल अभिनेता। इश्वाक सिंह और अपारशक्ति खुराना ने इस फ़िल्म के लिए साइन लैड्ग्वेज सीखी है और इतना सहज रूप से उसे निभाया है कि क्या कहें। अपारशक्ति ने पुश्किन का किरदार किया है और कमाल किया है। वे अपने स्टार भाई से ज़्यादा प्रतिभाशाली हैं पर शक्ल सूरत में उनसे कमतर हैं इसलिए उन्होंने अपने लिए अलग रास्ता चुना, और इस रास्ते पर वे बहुत लंबे समय तक टिकेंगे। तीसरा किरदार है इंटेलिजेंस ऑफिसर सोंधी का जिसे “राहुल बोस” ने निभाया है। इस एक एक्टर के लिए मुझे हमेशा मलाल रहता है, बेहद प्रतिभाशाली एक्टर जिसे बहुत सीमित अवसर मिले। मैं सबसे पहले इनसे प्रभावित हुआ था फ़िल्म “तक्षक” में। छोटे कद के बावजूद उस मजबूत किरदार को ऐसे निभाया था कि देख कर हैरान रह गया था। उसके बाद जब-जब इन्हें देखा बड़ा अच्छा लगा। चाहे कॉमेडी करनी हो या आतंक पैदा करना हो, बड़ी ही कुशलता से वे अपने आप को ढाल लेते हैं। अनुप्रिया गोयनका ओटीटी का नियमित चेहरा हो गई हैं, और अच्छी लगती हैं।

दूसरी चीज़ जो बहुत प्रभावित करती है वो है कहानी के समय-काल का चित्रण। 90 के दशक को इस तरह दिखाया है कि आपको महसूस होता है कि आप उसी युग में हैं। खाली-खाली सड़कें, दिल्ली की city buses, उस ज़माने के फ्लैट, अपार्टमेंट। सब बहुत सावधानी से रचा गया है। पार्श्व संगीत “के” का है। अब ये ख़ब्त मेरी समझ से परे हैं, हालाँकि संगीत बहुत अच्छा है पर लोग नाम के मामले में ये क्या प्रयोग कर रहे समझ नहीं आता। अब "के" बाबू इतिहास में किस तरह याद रखा जाना चाहते हैं समझ नहीं आता।

फ़िल्म के लिए इश्वाक सिंह को “स्टार्स एशियन इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल, लॉस अंजलिस” में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला था। कई प्रतिष्ठित फ़िल्म महोत्सवों से गुज़र कर सितंबर 2024 में ये ज़ी5 पर रिलीज़ हुई।

जिन्हें अच्छी फ़िल्में देखने का शौक है, वे ज़रूर देखें।

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