हमारे समाज में पिता-पुत्र का अजीब रिश्ता होता है। अब तो ख़ैर सुधर गया है लेकिन पिछली पीढ़ी के समय बाप हमेशा बेटे से चिढ़ा हुआ ही रहता था, उसे हमेशा नालायक समझता था। हिन्दी में बहुत कम फ़िल्में हैं जो इस रिश्ते पर बनी हैं – शक्ति, गर्दिश, एनिमल और अब “द मेहता बॉय्ज़”.
मैं इस फ़िल्म से बहुत हद तक रिलेट करता हूँ, बल्कि इससे कहीं आगे निकल जाता हूँ, इसमें मुद्दे हल हो जाते हैं क्योंकि फ़िल्म है, असल में ऐसा नहीं होता। पूरी फ़िल्म रेशा-रेशा पिता-पुत्र की भावनाओं को उधेड़ती है बिना किसी मेलोड्रामा के, बिना उबाऊ हुए। ये इसलिए कहा कि कुछ मित्रों ने लट्ठ में तेल पिला रखा है “मिज़्गण” की बखिया उधेड़ने के बाद, वे कहेंगे कि वो भी ऐसी ही थी लेकिन मैं कहूँगा, ऐसी बिलकुल नहीं थी।
द मेहता बॉय्ज़ के बड़े मेहता हैं “बोमन ईरानी” और छोटे मेहता “अविनाश तिवारी”। ये अभिनेता ख़ामोशी से बेहतरीन काम करता जा रहा है, जो पीआर स्टार किड्स को मिलता है वो ऐसे अभिनेताओं को नहीं मिलता लेकिन ये अपने टैलंट से अपनी जगह बनाते हैं, इंडस्ट्री में भी और दर्शकों के दिलों में भी।
ये एक पारसी परिवार है, “अमय” की माँ का देहांत हो गया है और वो मुंबई से अपने घर नवसारी गया है। मुंबई में वो एक आर्किटेक्ट है। घर पर उसकी बहन अम्रीका से आई है। चूंकि अब पिता अकेले रह गए हैं इसलिए बहन उन्हें अपने साथ अमरीका ले जाने के लिए राज़ी कर लेती है। पिता-पुत्र में बमुश्किल संवाद होता है। जिस दिन फ्लाइट है, कुछ गड़बड़ हो जाती है और पिता की फ्लाइट दो दिन बाद की हो जाती है जिससे उन्हें अकेले मुंबई में रुकना है दो दिन के लिए। ज़ाहिर है बहन उन्हें अमय के सुपुर्द करके जाती है। इन दोनों के लिए एक साथ दो दिन रहना सज़ा से कम नहीं है। मैं अच्छी तरह जानता हूँ इस परिस्थिति को, मैं आज भी उस कमरे में नहीं रहता जहां वे बैठे हों। आगे की कहानी दोनों के एक दूसरे पर frustration निकालने और फिर धीरे-धीरे एक-दूसरे को समझने की है जो इतने प्यार से आकार लेती है कि आप उनके संसार में शामिल हो जाते हैं।
थोड़ा झोल भी है पर ओवर ऑल असर छोडती है। मुझे अमय के कैरक्टराइजेशन में दिक्कत लगी। ऑफिस में अपने काम को आगे नहीं बढ़ाना समझ आता है अगर व्यक्ति अंतर्मुखी है, पर अमय अंतर्मुखी नहीं है ऐसे में उसकी हिचक को चिढ़ पैदा होने की हद तक खींचा गया है। बाकी मुझे और कोई समस्या नहीं लगी फ़िल्म में।
बोमन ईरानी का अभिनय अपने आप में स्कूल है पूरा। इतना जोरदार अभिनय बहुत कम देखने को मिलता है। अविनाश तिवारी ने उन्हें अच्छी कंपनी दी है। वैसे तो फ़िल्म के अधिकांश हिस्से में ये दोनों ही हैं पर अमय की प्रेमिका के किरदार में श्रेया चौधरी हैं जिन्हें देखकर मुझे कुछ देर लगता रहा कि इसे कहीं देखा है मैंने और फिर तुरंत गूगल पर खोजा तो पता चला हाँ, बंदिश बन्दिट्स में थीं। आजकल हर अभिनेत्री का चेहरा एक सा लगता है।
बोमन ईरानी इस फ़िल्म के सब कुछ हैं, निर्माता भी, निर्देशक भी और सबसे बड़ा आकर्षण भी। उत्तेजक फ़िल्मों के दौर में विचारोत्तेजक फ़िल्म बनाना वाकई हिम्मत का काम है। फ़िल्म में प्रॉडक्शन, डाइरैक्शन, राइटिंग और एक्टिंग, सब कुछ top notch है। एक ज़माना था जब मानवीय भावनाओं और रिश्तों पर कहानियाँ कही जाती थीं, पर अब सबको जुगुप्सा पैदा करने में रस है। एक वाक़या सुनाता हूँ, मेरा परिचित एक युवा संघर्षरत एक्टर है, उसे कुछ न कुछ सूझता रहता है शूट करने को, और उस कुछ में हमेशा खून होता है, चाकू होता है, विक्षिप्तता होती है। मैंने उससे पूछा कि भाई इस जेनेरेशन को चाकू और खून के आगे कुछ सूझता ही नहीं है क्या? इसके पीछे थॉट क्या है? तो वो शून्य था, थॉट कुछ नहीं है, चौकाना उद्देश्य है। पता नहीं लोग चौंक-चौंक कर कब बोर होंगे।
बहरहाल, आप ये फ़िल्म ज़रूर देखिये। अच्छी कोशिश की हौसला-अफजाई भी ज़रूरी है। अमज़ोन prime पर उपलब्ध है।
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सच लिखा पिता पुत्र का रिश्ता अजीब होता है पर हमारी पीढ़ी में ज्यादा मुश्किल था। अच्छा लेख लिखा आपने हमेशा की तरह । फिल्म देखते हैं हम भी ☺️
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