मार्को - गटर का सैलाब


 

फ़िलहाल सिनेमा के परदे पर प्रतिस्पर्धा चल रही है कि कौन कितना घिनौना हो सकता है और किस हद तक नीचता दिखा सकता है। गुजरात दंगों के समय की सबसे वीभत्स घटना थी एक गर्भवती महिला के पेट से भ्रूण को तलवार से निकाल लेना, हर किसी का दिल ये सुनकर दहल गया था (माफ़ कीजिये हर किसी का नहीं, हमारे बीच zombies भी रहते हैं, उन्हें छोडकर), पर फिर भी एक आम संवेदनशील व्यक्ति का (और तब हुआ करते थे संवेदनशील लोग) तो दहला ही होगा। आज हालत ये है कि इस तरह के दृश्यों का आनंद लिया जा रहा है। हो भी क्यों न? असल में उस कुकृत्य को करने वाले का फूलमालाओं से सम्मान भी तो इसी द्दौर का कलंक है। 

ख़ैर, तो ऐसी ही वीभत्स, घिनौनी फ़िल्म है “मार्को”। कहानी का तो ऐसा है भाई कि ऐसे अति-वीभत्स, घिनौने दृश्य सोचे गए और उन्हें एक लड़ी में पिरो दिया गया, चूँकि फ़िल्म बना रहे हैं तो उसे एक कहानी के रूप में दिखाना मजबूरी है। हालाँकि शुरुआत वाकई अच्छी थी इससे इंकार नहीं है। सीन तो हिंसक ही था पर हमें क्या मालूम था कि इसके आगे गटर का सैलाब है। शुरू में तो ऐसा लग रहा था कि अद्भुत कुछ देखने जा रहा हूँ, और मैं क्यों इसे देखने से परहेज कर रहा था अब तक?

कहानी ये है कि दो युवा लड़कों की हत्या हो जाती है और उनमें से एक जो अंधा था वो डॉन जॉर्ज का भाई था। जॉर्ज तो फिर भी नर्म दिल इंसान है पर उसका एक और गोद लिया भाई है “मार्को” जो दानव है, सभी लोगों के अनुसार। मार्को उन्हें नहीं छोड़ेगा, और हमें भी कहीं का नहीं छोड़ेगा ☹

अब आप ये देखिये कि हर कोई फिल्म में मार्को को दानव कह रहा है, और सबको मालूम है कि ये आदमी पागल है, इससे जीतना संभव नहीं है फिर भी 100-100 आदमी आते ही जाते हैं उसे मारने और दो-दो करके आक्रमण करते हैं ताकि मार्को भाई बहुत न घिर जाएँ। भारत देश में जितना लोहा है उसमें से आधे की तो कुल्हाड़ी, गंडासे, फरसे, हथौड़े बनवा लिए होंगे इन लोगों ने, पर बंदूक पर इन्वेस्ट करना ठीक नहीं समझा। कैसे करेंगे, साउथ वालों ने ही तो संस्कृति बचा कर रखी है। मैं तो वो सुनहरा युग देखना चाहता हूँ जब पत्थर के हथियार प्रयुक्त होने लगेंगे और लोग कच्चे जानवर खाने लगेंगे। अगर इन लोगों के पास बंदूकें होती तो आधे घंटे में फ़िल्म ख़त्म हो सकती थी। 

तो इस मार्को का पूरा कुनबा घर में जमा है। ढेर सारे बच्चे हैं, पर किसके हैं ये मुझे अब भी नहीं पता। ये बच्चे भी फ्री टाइम में मार्को की कहानियाँ सुनाते रहते हैं। बहरहाल, भाई के हत्यारे की खोज शुरू होती है और अंत में केरल की आधी जनसंख्या और अपने पूरे परिवार को शहीद करवा कर मार्को उसे ख़त्म कर देता है। 

खून इतना है कि बीच में कई बार मुझे भी अपना चेहरा पोंछना पड़ा। सबको लाल पानी में dip करके ही रखा है। नकली खून साफ़ नज़र आ रहा है, वीएफ़एक्स से भी बनाया गया खून नकली नज़र आ रहा था। ख़ैर, जिस तबके के लिए ये फ़िल्म है उनके आईक्यू को ध्यान में रखते हुए इस पर ज़्यादा दिमाग न खपाना सही भी है बनाने वालों के नज़रिये से। जैसा कि मैंने कहा, फ़िल्म अति-हिंसक दृश्यों को सोचकर उनके ही आसपास बुनी गई है। बच्चे के सर को गॅस सिलिंडर से कुचल देना, बच्ची को फाँसी पर लटकना, दूसरी बच्ची को ऊपर से फेंक कर उसका हाल पूरे फोकस के साथ दिखाना फ़िल्मकार और लेखक की मानसिक विक्षिप्तता को भी उजागर करती है, इन लोगों को मेडिकल हेल्प की ज़रूरत है। मार्को इतनी सिगरैट, सिगार पीता है कि आधे घंटे और चलती पिक्चर तो मुझे कैंसर हो जाता। 

कई जगह तो बेशर्मी से लॉजिकल flaw रहने दिये गए हैं। जैसे एक दृश्य में मार्को को मारने के लिए ले जाया गया है एक सुनसान जगह। उसके साथी अनवर का एक हाथ आरी से काट दिया जाता है। मुँह में चाकू लेकर लड़ने का सीन यहीं आता है। मार्को बंधे हाथों से ही सबको मार डालता है, मुँह में चाकू पकड़ कर। मुख्य विलन को भी पीट कर पटक देता है, अचानक बारिश होने लगती है। मार्को अनवर को उठाकर कार में बैठाता है और फिर पागलों की तरह पूछता है कि तुझे दर्द तो नहीं हो रहा? तुझे दर्द तो नहीं हो रहा? अबे हाथ कट गया है उसका, दर्द नहीं होगा तो क्या एंजॉय करेगा वो? अचानक बारिश बंद हो जाती है और मार्को कार से उतर कर नीचे पड़े लोगों को आरी से काटता जाता है, और दैवीय चमत्कार देखिये, इतनी तेज़ बारिश हुई थी अभी, पर घास का एक तिनका भी भीगा हुआ नहीं है। प्रभु की लीला नहीं तो और क्या है? और तो और मुख्य विलन इतनी देर जहां पड़ा था वहीं पड़ा रहा, जबकि भाग सकता था और उसका एक बाल भी नहीं भीगा है अभी अभी हुई बारिश में। हरे कृष्णा।

एक तरफ तो मलयालम में बेहतरीन कंटैंट बन रहा है, इस लिहाज से मलयालम सिनेमा ने आज सबसे ऊंचा मक़ाम पाया है, तो क्या अब वो भी इस कूड़े की तरफ़ चल पड़ा है? हालात ये हैं कि ऐतिहासिक पात्र संभाजी के जीवन पर बनी फिल्म को भी इतना हिंसक बनाया गया है कि बच्चे उसे देख रोने लगे।  

कौन लोग हैं जो इन फिल्मों को करोड़ों कमा कर दे रहे हैं। क्या इस पृथ्वी का अंत निकट है? 

फ़िल्म ख़त्म होने पर भगवान का धन्यवाद देने का मन करता है और फ़िल्म में चले हथौड़े हमारे सर में चलने लगते हैं। ये लुगदी युग है। 

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टिप्पणियाँ

  1. बेनामी5:53 pm

    Kill ke upar jaane ki koshish ki hai...bina kisi story ke...aur bahut saara khoon dikha ke

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  2. क्यों इतनी जल्दी सब बदल रहा है मैं कभी कभी समझ नहीं पाती हूं। किस दिशा में जा रहे हैं हम लोग। यह सच है हमारे बीच में ही कुछ जोम्बी भी रहते हैं

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    1. कुछ नहीं, अब ज्यादातर ज़ोंबी ही हैं।

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