देवा - शाहिद कपूर का शाहकार

  


मसाला फ़िल्मों का अपना एक मज़ा है, अपनी एक दुनिया है बशर्ते कि उन्हें इज़्ज़त से बनाया जाए। आप ही इज़्ज़त से नहीं बनाएंगे तो हम क्या ख़ाक इज्जत देंगे। आप मसाला बोलकर बेवकूफी रच देते हो और फिर अपने खाली भेजे की दुहाई देकर कहते हो हम अपना दिमाग घर रख आएं। ये सरासर गलत बात है कि मसाला फिल्में याने मूर्खता, और मैं ये बात कई बार रेखांकित कर चुका हूं। मसाला फिल्में भी खूबसूरत लग सकती हैं, हीरो की लार्जर देन लाइफ इमेज अच्छी लगती है अगर आप दिमाग को भी साथ ही रहने दें और उसे काम भी करने दें।

मैंने कुछ दिनों पहले “वेदा” के बारे में लिखा था और आज उन्हीं अक्षरों को उल्टा कर बनी “देवा” की बात कर रहा हूं।

शाहिद कपूर के अंदर बहुत आग है पर अफ़सोस कि अपने पूरे करियर में कुछ ही फिल्में उन्हें सफ़ल मिली है। वे अपनी तरफ़ से कमाल करते हैं। मैं तो कहता हूं कि एक्शन रोल इतने विश्वसनीय तरीके से शाहरुख नहीं निभाते जितना शाहिद कर लेते हैं। इस फिल्म के देवा को देखकर यक़ीन नहीं होता कि ये वही “जब वी मेट” और “विवाह” वाला चॉकलेटी बॉय है। असल में शाहिद खुद ही अपने करियर ग्राफ की बदहाली का कारण हैं। उनके साथ काम करना आसान नहीं है, उनका व्यवहार ख़राब है, और ऐसे एक्टर से सब बचना ही पसंद करते हैं। अगर वे अपना ये व्यवहार सुधार लें तो बहुत ऊपर पहुंच सकते हैं।

ख़ैर, देवा के किरदार की अगर बात की जाए तो यूं समझिए कि कबीर सिंह की पुलिस में नौकरी लग गई है। एक बिगड़ैल पुलिस वाला जो किसी को भी तोड़ देता है। स्पॉयलर नहीं दूंगा, बस इतना कहूंगा कि कुछ ऐसा होता है कि देवा की दुनिया उलट – पलट जाती है और उलझी हुई गुत्थी को किस तरह वो सुलझाता है यही कहानी है। दर्शक अब इतना अनुभवी हो चुका है कि छोटा मोटा सस्पेंस तो ऐसे ही समझ जाता है और इसीलिए लेखक को भी उससे एक कदम आगे चलकर कुछ शॉकिंग रचना पड़ता है। तू डाल डाल तो मैं पात पात। और इसमें ऐसा ही कुछ किया गया है।

हां, हीरो गुंडों को पीटता है पर वो अच्छा लगता है, माइंड लेस नहीं लगता। अति नहीं की गई है कि पैर रखने पर पत्ते उड़ रहे हैं, गंदे से गुंडे हंसिया कुल्हाड़ी लेकर दौड़ रहे हैं और हीरो सबको एक साथ हवा में उड़ा रहा है। पूरी फिल्म में शाहिद छाए हुए हैं।

गाने इरिटेट करते हैं, उनकी कोई ज़रूरत नहीं थी। फिल्म जो मूड सेट करती है उसे पकड़ कर रखती है। सहयोगी अभिनेता भी अच्छे हैं।

एक और निवेदन ये है कि अगर संभव हो तो फिल्में सिनेमा हॉल में ही देखा करिए, क्योंकि फिल्म का असली मज़ा वहीं है। यूं समझिए कि असली शाही पनीर में काजू वगैरह की ग्रेवी और मुलायम पनीर होता है, वो सिनेमा हॉल का अनुभव है, टीवी पर देखना याने मूंगफली की ग्रेवी और पनीर की जगह टोफू, और मोबाइल फोन पर देखना याने पानी बघार कर उसमें सोया chunks को सफेद रंग कर डाल दिया है। मैंने भी सिनेमा हॉल में देखी और देखने लायक है पर अफ़सोस कि इसे बहुत खराब ओपनिंग मिली। जाने क्यों इस फिल्म की पब्लिसिटी भी नहीं की गई।

फिल्म के निर्देशक रोशन एंड्रयूज़ दक्षिण से ही हैं और देवा उन्हीं की 2013 में आई फिल्म “मुंबई पुलिस” का रीमेक है, पर कहानी में बदलाव किए गए हैं।

इस पीढ़ी के अधिकांश दर्शक अमिताभ बच्चन की फ़िल्मों की खुराक़ पर बड़े हुए हैं और ये नॉस्टेलजिया उनकी फिल्मों में देखने को मिल जाता है। इसमें भी एक दीवार पर दीवार वाले अमिताभ की पेटिंग बार बार दिखाई गई है। ऐसा एंटी हीरो जो गरीबी से ऊपर उठा है।

कुल मिलाकर देखने लायक फ़िल्म है, हर डिपार्टमेंट का काम अच्छा है, चाहे वो कैमरा हो, आर्ट हो या बैकग्राउंड म्यूजिक।

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टिप्पणियाँ

  1. बेनामी11:53 am

    मेरा मानना है फिल्में समाज पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं इसलिए कभी भी ऐसे क़िरदार पैदा नहीं करने चाहिए जो कभी वास्तव में पैदा हो जाएं तो समाज को दिक्कत हो। कल्पना भी सच के दायरे में ही हो तो बेहतर लगता है।
    आखिर में आपका सुझाव अच्छा हैबकी फिल्म थिएटर में ही देखनी चाहिए ।

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