युद्ध - नोस्टेल्जिक


युद्ध राजीव राय की पहली और जैकी श्राफ़ की तीसरी फ़िल्म थी।

राजीव राय हॉलीवुड से बहुत ज़्यादा प्रभावित रहे हैं और मेरे खयाल से ये इकलौती फ़िल्म है जिसमें उन्होंने हॉलीवुड की तरह कहानी का स्ट्रक्चर बनाने की कोशिश की है, और मेरे हिसाब से यही उनकी सबसे अच्छी फ़िल्म भी है। इसके बाद की सभी फिल्में अति नाटकीयता से भरी हैं, चाहे वो त्रिदेव हो, विश्वात्मा हो, या मोहरा हो। युद्ध में उनके पैर ज़मीन पर थे। हालाँकि कहानी वैसी ही है जैसी उस दौर में चल रही थीं। हर फ़िल्म में एक, दो, तीन, या चार हीरो होते थे जो एक विलन से लड़ते रहते थे जो कभी बच्चे उठा ले जाता है, कभी माँ उठा ले जाता है, कभी बहिन उठा ले जाता है। उसका एक अड्डा होना ज़रूरी है और उस अड्डे पर चौबीस घंटे उसके कुछ आदमी उसकी विशेष यूनिफ़ोर्म पहन कर खड़े होते हैं, और ये सदा खड़े ही होते थे, मैंने किसी भी विलन के गुर्गे को बैठा हुआ नहीं देखा। इतने अनुशासित लोग होते थे पहले, भले ही गुंडे हों। अगर विलन डैनी है तो उसके आदमी अक्सर सूट ही पहनते थे, अगर अमरीश पुरी है तो डिपेंड करता है कि पुरी साहब ने क्या भेस धर रखा है। 

हाँ, तो बात युद्ध की। कहानी एक विलन “गामा मातिंग” से झगड़े की ही है जो विक्रम यानि जग्गू दादा और अविनाश यानि अनिल कपूर की ज़िंदगी में चरस बोता रहता है। ये गामा मातिंग अब शहर का इज़्ज़तदार आदमी हो गया है “चिनोय सेठ” के नाम से। पता नहीं फिल्मों में चिनोय सेठ की इस बदनामी पर अलिशा चिनोय क्या सोचती होंगी?

ख़ैर, विक्रम की एक माँ है नूतन, जो अपने जीवन में चरस लेकर ही पैदा हुई है। नूतन निरुपा रॉय के बाद सबसे दुखियारी माता थी। अब एक चीज़ जो राजीव राय की मुझे बहुत अच्छी लगी इस फ़िल्म में, कि कहानी को नॉन लिनियर रखा है, जो उस समय चलन नहीं था। नॉन लिनियर होने की वजह से ही उसमें इंटरेस्ट बना रहता है, अगर लिनियर होती तो कहानी में कुछ भी नया नहीं था, वही मिलने-बिछड्ने की, जुर्म और कानून की कहानी है। फ़िल्म की शुरुआत में ही एक कार पैसों से भरी पेटी लेकर जा रही है, रास्ते में एक जगह एक आदमी उसके ड्राईवर को गोली मार देता है और पैसा लेकर भाग जाता है। इस जुर्म में पकड़ा मोइनुद्दीन (शत्रुघ्न सिन्हा) जाता है। अदालत में वकील अनिल कपूर को देखकर वो कहता है कि इसी ने ड्राईवर को मारा और पैसा लूटा था, पर कोई भी उसका यक़ीन नहीं करता और उसे उम्र क़ैद हो जाती है। उसकी बीवी नफ़ीसा (हेमा मालिनी), 15-20 डाइलॉग विक्रम और अविनाश के मुँह पर दे मारती है, पर उसको भी ये लोग seriously नहीं लेते। विक्रम को पता चलता है कि जहां जहां खून हुए हैं वहाँ वहाँ अविनाश मौजूद था उस दिन। ये गुत्थी उलझती जाती है, पर राजीव राय ख़ुद ही भगवान की तरह आधी ही फ़िल्म में इसे सुलझा देते हैं, ताकि आगे सिम्पल धिशुम धिशुम करवा सकें। अगर इस गुत्थी को और उलझाए रखते तो फ़िल्म और अच्छी बन सकती थी। फ़िल्म में अनिल अंबानी की पत्नी भी हैं, जो बड़ी मुश्किल से अभिनय करने की कोशिश करती हैं। जैकी दादा की ये शुरुआती फ़िल्म थी और इसलिए उनकी डाइलोग डेलीवेरी में झोल है। डैनी का स्क्रीन presence कमाल का होता है। प्राण साहब ने इस समय तक बुरे काम छोड़ दिये थे और वे अब भले कमिश्नर वगैरह के काम करने लगे थे। 

जग्गू दादा और अनिल कपूर एकदम लड़के दिख रहे हैं इसमें। दोनों के बीच कलेश हुआ था इस बात को लेकर कि पहले किसका नाम आएगा क्रेडिट्स में? अनिल कपूर का मानना था कि वो सीनियर हैं तो उनका पहले आना चाहिए, जबकि जैकी उनसे ज़्यादा हिट थे क्योंकि उसी समय “हीरो” सुपर हिट हुई थी जिसमें जैकी सोलो हीरो थे जबकि अनिल की अब तक सोलो कोई फ़िल्म हिट नहीं हुई थी, ऊपर से मशाल फ्लॉप हो गई थी। इसी बात को लेकर सुभाष घई ने जैकी को अनिल से ज़्यादा पैसे भी दिलवाए थे, जिसकी वजह से घई और अनिल कपूर के बीच भी बहस हुई थी। फ़िल्म में मुख्य भूमिका जैकी की ही थी, अनिल कपूर की भूमिका सेकंडरी थी। इस फ़िल्म को बनने में पाँच साल लगे। 1980 में इसका मुहूरत संजय दत्त को लेकर हुआ था, और उनके साथ काफी शूट भी हो गया था पर उनके ड्रग एडिक्शन के चलते फ़िल्म डिले होती जा रही थी। सेट पर भी वे सामान्य नहीं रहते थे। गुलशन राय ने दत्त परिवार से सम्बन्धों के चलते इंतज़ार भी किया लेकिन उनके भी तो बेटे की पहली फ़िल्म थी, उन्हें वो भी देखना था। आखिर संजय दत्त की जगह जैकी श्रोफ को लिया गया। जब संजय थे तब एक और कलेश हुआ था। उनके और टीना मुनीम के बीच ब्रेक अप हो गया था, और राजीव राय को दोनों में से किसी एक को चुनने को कहा गया। उन्होने संजय को चुना, लेकिन जब संजय फ़िल्म से बाहर हो गए तो एक बार फिर टीना मुनीम को लिया गया, जबकि पहले इस रोल के लिए पूनम ढिल्लो को लिया जाना तय हुआ था। अनिल कपूर वाला रोल पहले राजकिरन को दिया गया था लेकिन उनकी फ़िल्में फ्लॉप हो रही थीं तो फिर उनकी जगह अनिल कपूर आ गए। इसी तरह विलन के लिए पहले अमरीश पुरी को लिया गया था पर बाद में उनकी जगह डैनी आ गए। शत्रुघ्न सिन्हा और हेमा मालिनी का इसमें कोई खास रोल नहीं था। पता नहीं शत्रुघ्न सिन्हा ने क्यों स्वीकार किया, हेमा मालिनी ने तो गुलशन राय के उस अहसान के लिए किया था जब “जॉनी मेरा नाम” के लिए उन्हें विजय आनंद ने रिजैक्ट कर दिया था पर गुलशन राय ने रखवाया था, वरना इस रोल के लिए अनीता राज को लिया गया था जिन्होंने बाद में फ़िल्म छोड़ दी थी। 

ख़ैर, जैसा कि उस समय रिवाज था, फिल्में तीन घंटे खीचना ज़रूरी था, अगर ये मजबूरी न होती तो ये फ़िल्म और भी अच्छी बन सकती थी। फिर भी मनोरंजक लगी, उस दौर की फिल्में अगर थोड़ी भी ठीक ठाक हो तो nostalgia के लिए देखी जा सकती है। हाँ, त्रिदेव मुझसे नहीं देखी गई थी। 

गुलशन राय की फ़िल्मों का संगीत हमेशा कल्याणजी-आनंदजी ही तैयार करते थे लेकिन अब तक कल्याणजी के पुत्र विजू शाह उनके लिए म्यूजिक अरेंजमेंट करने लगे थे और इसीलिए इस दशक में कल्याणजी आनंदजी के संगीत का साउंड बदल गया था। कल्याणजी-आनंदजी का म्यूजिक अरेंजमेंट विशुद्ध भारतीय होता था जबकि विजू शाह एलेक्ट्रोनिक साउंड का उपयोग बहुत करते थे, जैसा की आपने उनके संगीत को सुना है जब वे स्वतंत्र रूप से संगीतकार बने। इस फिल्म का एक गीत “क्या हुआ क्या नहीं” मुझे अच्छा लगता है जिसे अमित कुमार ने गाया था। 

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