जब #दृश्यम हिन्दी में भी बन चुकी थी तब तक मैंने देखी नहीं थी पर सोच रखा था कि पहले असली वाली ही देखूंगा। अजय देवगन वाली देखने का कोई इरादा नहीं था।
मैंने सबसे पहले मलयालम देखी फिर कमल हसन की वजह से उसका तमिल रिमेक देखना शुरू किया पर पूरा नहीं देख पाया और उसके बाद हिन्दी देखी। जैसे होता है ना कि चाय की दुकान पर जब चाय बनती है तभी ठीक उसके बाद उसी पत्ती को बार-बार छान कर बेस्वाद कर दिया जाता है। तो बाकी दोनों रिमेक देख कर ज़ायका इतना बिगड़ गया कि मुझे एक बार फिर मलयालम वर्शन देखना पड़ा और एक बार फिर उतना ही मज़ा आया।
मोहनलाल का दर असल कोई मुक़ाबला ही नहीं है। कमल हासन के अभिनय में हर दृश्य में ये महसूस होता रहा कि इन्हें मालूम है कि ये कमल हासन हैं। दृश्यम कमल हासन या मोहनलाल या अजय देवगन की नहीं बल्कि जॉर्ज की कहानी है, इस बात को सिर्फ मोहनलाल ही समझे।
ख़ैर, अब आते हैं दृश्यम - 2 पर।
तो सीख लो सभी कि sequel क्या होता है और कैसे बनाया जाता है।
sequel बनाने में सबसे बड़ी समस्या, मेरे खयाल से, ये है कि लोग सफलता का sequel बनाते हैं जबकि बनाना चाहिए कहानी का। लोग sequel बनाते समय पहले भाग की सफलता को ही सिर्फ दिमाग में रखते हैं और उस सफलता को फिर से दोहराने के चक्कर में उसका बेड़ा गर्क कर देते हैं जबकि सोचना चाहिए कहानी को, कहानी खुद अपना रास्ता बताती है। अगर वो बिलकुल नए रास्ते जा रही है तो ले जाना पड़ेगा वरना sequel हमेशा दोयम दर्जे का होगा। दृश्यम -2 की कहानी ने अपने लिए बिलकुल नया रास्ता बनाया। पहली फिल्म देखकर वो मुकम्मल फिल्म लगती है पर इसे देखकर लगता है कि ये तो बहुत ज़रूरी था। पहला भाग अब अधूरा लगने लगा।
मैं कहानी के spoiler नहीं देना चाहता, हो सकता है बहुतों ने पहला भाग ही अब तक नहीं देखा हो।
दोनों भागों का केंद्रीय विचार एक ही है - कोई आदमी अपने परिवार की सुरक्षा के लिए किस हद तक जा सकता है?
पति-पत्नी और दो बेटियाँ। छोटा सा, एक सामान्य परिवार लेकिन हर कोई महत्वपूर्ण है। इसे देखते हुए एक बात और खयाल में आई। मेरी अपनी एक कहानी में महिला पात्र के लिए कई लोगों ने कहा कि आजकल women empowerment का ज़माना है, इस पात्र को कुछ अलग करते हुए दिखाओ। मेरे मन में सवाल ये है कि उस "दिखाओ" का क्या मतलब है? जबर्दस्ती दिखाओ? और क्या मतलब है empowerment का? महिला का सिगरैट, शराब पीना, गालियाँ बकना? और अलग से क्या मतलब है? दृश्यम की नायिका एक आम, घरेलू स्त्री है जो अपने परिवार का खयाल रखती है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ वही रखती है। हर सदस्य के लिए बाकी सब बहुत महत्वपूर्ण हैं। तो क्या वो स्त्री कमतर है? मेरी नज़र मे तो नहीं है। वो धुरी है सबके बीच की। आप जब पूरी फिल्म देख चुके होते हैं तो आपके अवचेतन में उसकी एक ठोस छवि आप महसूस करते हैं। उसे अलग दिखने के लिए अलग करने की ज़रूरत नहीं। मेरे खयाल में empowerment का मतलब है इस बात को समझा जाये कि वो सबसे महत्वपूर्ण है।
फिल्म की शुरुआत में आपको जो होने का डर होता है वो अंत के बहुत पहले हो ही जाता है और आप सोचने लगते हैं कि ये तो हो गया अब कुछ नहीं बचा पर आगे आपको और भी झटके लगते हैं जो आप आँखें और र्मुंह फाड़े देखते रहते हैं। निश्चित ही इस कहानी को लिखने में बहुत समय और मेहनत लगी होगी। फिल्म के लेखक और निर्देशक जीतू जोसफ को अपने काम में असाधारण ईमानदारी के लिए सलाम है।
फिल्म के सारे कलाकारों ने जबर्दस्त अभिनय किया है पर मोहनलाल अद्वितीय हैं। साथ में संलग्न पोस्टर देखिये, उसमें उनकी भाव-भंगिमा देखिये। फिल्म का पात्र इसे देखने से भी समझ आ सकता है।
जिसने दृश्यम 1 नहीं देखी वो पहले देखे और उसके बाद ही दूसरा भाग देखे पर देखना ज़रूरी है।
धन्यवाद।
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