पहले ही एपिसोड में जो सबसे पहली बात दिमाग में आई वो ये कि, आज के बड़े सितारे रोशन साहब के संगीत के कसीदे पढ़ रहे हैं, और उनमें से एक तो पोते ही हैं उनके, जब आपको संगीत की इतनी समझ है तो आपकी फिल्मों में इतना घटिया संगीत कैसे बन रहा है? एक ज़माना था जब राज कपूर, शम्मी कपूर जैसे सितारे अपनी फिल्म के संगीत को लेकर भी बहुत सजग रहते थे। अगर आपको अच्छे संगीत की समझ होती तो आप भी सजग रहते, खास तौर पर ऋतिक रोशन, क्योंकि रोशन साहब की विरासत है उनके पास।
ख़ैर, दूसरी बात जो आई वो ये थी कि क्या होता अगर सत्यजित रे, खुद अपने ऊपर डॉक्युमेंट्री बनाते? या श्याम बेनेगल? या अमिताभ बच्चन? या अगर मैंने ही बचे हुए जीवन में कुछ ढंग का काम कर लिया तो क्या मैं अपनी खुद की डॉक्युमेंट्री बनाऊँगा? अजीब ख़याल है, मैं खुद अपनी बातें करूँ बिलकुल नहीं जँचता। हाँ, मैं अपने पुरखों पर ज़रूर बना सकता हूँ, ये मेरी ज़िम्मेदारी भी होगी अगर उन्होंने ऐसे काम किए हैं जो बताने लायक हैं। इस मायने में इस सिरीज़ का पहला एपिसोड देखने लायक है। रोशन साहब निर्विवाद रूप से फिल्म उद्योग को मिले सबसे नायाब लोगों में से एक हैं, और ये भी सच है कि अपने खानदान के बाकी लोगों की अपेक्षा बहुत कम सफ़ल रहे हैं। बाकी लोगों के साथ इसका उल्टा है। रचनात्मक नज़रिये से देखें तो बाकी तीनों में से कोई भी अपने-अपने क्षेत्र में रोशन साहब की ऊँचाई को नहीं छूते। यही ज़िंदगी की सबसे बड़ी त्रासदी है, क्या कहें!
ये चार एपिसोड को सिरीज़ रोशन परिवार के चारों सितारों के बारे में है जिसमें हर एपिसोड एक को समर्पित है। पहला रोशन साहब को, दूसरा राजेश रोशन को, तीसरा राकेश रोशन को और चौथा ऋतिक रोशन को। मेरा ख़याल है आपने सिर्फ पहला एपिसोड देखकर आगे नहीं भी देखा तो चलेगा, दूसरा भी देखा जा सकता है लेकिन उसके आगे देखना बहुत भारी है। मैंने चौथा एपिसोड थोड़ा सा देखा और फिर बंद कर दिया। फिल्म उद्योग के लोगों को इकट्ठा करके जम कर तारीफ़ करवाई गई है, साथ ही इन्होंने खुद भी अपने कड़े संघर्षों को बयान किया है। अगर ये फोकस इनकी क्रीएटिविटि पर होता तो ज़्यादा अच्छा होता लेकिन ये भी तथ्य है कि बतौर निर्देशक राकेश रोशन की फ़िल्में क्रिएटिव नज़रिये से व्याख्या करने जैसी हैं ही नहीं। विशुद्ध मसाला फ़िल्में, और वो भी सिर्फ उसी दौर का मसाला, आज उन्हें नहीं देखा जा सकता। जबकि रोशन साहब के संगीत को आज भी वही स्थान मिलता है। राजेश रोशन ने भी कुछ काम अच्छा किया है। तो क्रीएटिविटि के लिहाज से राकेश रोशन परिवार में सबसे कमतर साबित होते हैं। इसकी बजाय अगर ये दो एपिसोड की पूरी डॉक्युमेंट्री अपने पिता पर ही बनाते और किसी अच्छे निर्देशक की सेवाएँ लेते तो एक यादगार डॉक्युमेंट्री बनती। ये तो आत्मश्लाघा का मुजस्सिमा तैयार हो गया है। और तो और मेलोड्रामा भी डाल दिया गया है। हर एपिसोड में जैसे ही किसी आई हुई मुश्किल की वे बात करते हैं, पीछे sad म्यूजिक बजने लगता है। जैसे ऋतिक रोशन जैसे ही कहना शुरू करते हैं कि मेरी पहली फिल्म में मेरे पापा ने मेरी बात नहीं मानी तो संगीत रोने लगता है, उनकी मम्मी कहती है कि वो एक दिन बहुत उदास था, मैंने उससे पूछा क्या हुआ तो बोला आज पापा ने एक सीन में मेरी बात नहीं मानी, इस पर संगीत ऐसा रोया कि मेरा भी मन किया रो दूँ, आखिर कितने लोगों को ऐसे जानलेवा दुख से गुजरना पड़ता है? ऋतिक का संघर्ष बहुत प्रेरणादायक है। फिर वो कहते हैं कि मेरी छः उँगलियाँ होने के कारण भी मुझे अपने आप पर भरोसा नहीं था कि मैं कुछ कर पाऊँगा।
मैं कहता हूँ जिन लोगों के अंदर अभिनय का कीड़ा और प्रतिभा भरकर प्रकृति ने भेजा होता है और जिनकी उँगलियाँ भी पाँच ही होती हैं, वे उम्र गुज़र जाने तक सड़कों पर रगड़ते रह जाते हैं क्योंकि उनके पिता फिल्म उद्योग में नहीं थे।
ख़ैर, पहले दो एपिसोड देख लीजिये और बाकी छोड़ दीजिये पर ध्यान रखना नेट्फ़्लिक्स पर है, इतने बड़े संघर्षों की कहानी छोटे-मोटे चैनल पर नहीं आती।
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