ये शायद जॉन अब्राहम की इकलौती फिल्म होगी जो मैंने सिनेमा हॉल में देखी, वो भी इसलिए कि कुछ भरोसेमंद समीक्षकों ने इसे अच्छी फिल्म बताया था, और दूसरा कारण, मुझे इससे पहले आई फिल्म “वेदा” अच्छी लगी थी।
वेदा में जॉन के अच्छे लगने का कारण मैं लिख चुका हूं, जिस किरदार को भावहीन पत्थर जैसा चेहरा चाहिए उसमें वे सहज ही फिट हो जाते हैं, और वेदा में तो फाइट भी करनी थी। लिहाजा वेदा उनके लिए परफेक्ट थी।
“द डिप्लोमेट” में भी किरदार ऐसा था जिसे अंदर क्या चल रहा है, उसे चेहरे पर नहीं आने देना है, याने सपाट रखना है चेहरे को, कुछ लोगों को इसीलिए जॉन इस किरदार में भा गए, पर मेरी राय थोड़ी अलग है। इस किरदार का भावहीन चेहरा बनाया जाना था, उसके अलावा जो उसके व्यक्तिगत पल हैं वहां तो भाव ज़रूरी ही थे, बल्कि और भी ज़्यादा जरूरी थे जबकि बाकी समय उस किरदार को भाव प्रदर्शित न करना हो। लेकिन जॉन तो जॉन हैं, इतने लंबे करियर में ग़लती से भी उन्होंने कोई भाव चेहरे पर नहीं आने दिए हैं। शायद यही इस फिल्म की सबसे बड़ी कमज़ोरी है। चाहे भावहीन चेहरा दिखना हो, पर उसके लिए भी एक एक्टर चाहिए होता है।
बहरहाल, फ़िल्म 2017 की एक सच्ची घटना पर आधारित है जब पाकिस्तान में भारतीय दूतावास में एक दिन एक भारतीय मुस्लिम लड़की आ जाती है और रो रोकर ख़ुद को शरण देने की प्रार्थना करती है, उसे जान से मार दिए जाने का डर है। दूतावास में ही उसे ठहरा लिया जाता है और फिर कार्यवाही शुरू होती है उसे अपने देश वापस भेजने की, जो इतना आसान नहीं था। पाकिस्तान की राजनीति, ISI और फिर वो लोग जो इस लड़की को बंधक बनाए हुए थे, इन सबसे निबटते हुए एक महीने के अंदर ही उसे भेजना ज़रूरी था। इन्हीं सब घटनाक्रमों को लेकर चलती है फ़िल्म।
फ़िल्म का केंद्रीय किरदार निभाया है सादिया ख़तीब ने। जाने क्यों विधु विनोद चोपड़ा जैसे निर्देशक के साथ फ़िल्म “शिकारा” से शुरुआत करने और बेस्ट डेब्यू का फिल्मफेयर पाने के भी उन्हें इतने बरसों से और कोई फिल्म नहीं मिली, सिवा “रक्षा बंधन” के, जबकि वे बेहद खूबसूरत हैं, और अभिनय भी आजकल नज़र आने वाली अधिकांश अभिनेत्रियों से बेहतर है। सादिया ने अपना किरदार अच्छा निभाया है, हालांकि कहीं – कहीं कुछ कमी रही। शारिब हाशमी, और कुमुद मिश्रा भी छोटे किरदारों में नज़र आते हैं। अगर आपको परदे पर एक खुशनुमा ऊर्जा का संचार करना हो तो आप कुमुद जी को ज़रूर लें, उनके व्यक्तित्व में एक चार्म है जो आपको बहुत अच्छा महसूस करवाता है, असल जीवन में भी वे ऐसे ही हैं।
इसके अलावा “पाताललोक” का तोप सिंह आपको याद हो तो, वो भी महत्वपूर्ण किरदार में है और बहुत ही बढ़िया एक्टर है। सुषमा स्वराज का किरदार रेवती ने निभाया है और उनकी बॉडी language को अपने अंदर उतारने की उन्होंने कोशिश की है।
सबसे अच्छी बात है कि गाने नहीं है फिल्म में, क्योंकि होते भी तो सरदर्द होते, वैसे भी गानों का स्कोप है नहीं फिल्म में।
फिल्म के निर्देशक “शिवम् नायर” हैं जिन्होंने स्पेशल ऑप्स निर्देशित की थी। निर्माता ख़ुद जॉन हैं, और वे अभिनेता से बेहतर निर्माता हैं, ये उन्होंने हमेशा साबित किया है। वे हमेशा अच्छी कहानी लेते हैं।
मुझे फिल्म ख़राब नहीं लगी तो अच्छी भी नहीं लगी। फिल्म की गति और तेज़ हो सकती थी, थ्रिल में और intellect में कुछ कमी रह गई। संवाद भी उतने प्रभावी नहीं हैं। बस एक ही बात अच्छी है कि भारत पाकिस्तान का विषय होते हुए भी बेवजह की फूहड़ नारेबाज़ी नहीं है, कोई गला फाड़कर भारत माता के जय नहीं चिल्ला रहा, और पीछे कानफोडू संगीत नहीं बज रहा। देशभक्ति महसूस करवाई जाती है, ठूँसी नहीं जाती।
कुल मिलाकर ठीक ठाक सी ही फिल्म है, मैंने बीच में कई बार फोन निकाल कर नोटिफ़िकेशन भी चेक किए जिससे समझ आता है कि बाँधने में तो कामयाब नहीं रही, पर मैं आधी छोड़ कर निकला भी नहीं, जो कि मैं करता हूँ अगर फिल्म झेली न जाये, तो कह सकते हैं कि झेल लेने लायक है।
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