अविनाश वाधवन - तक़दीर का फ़साना


90s के शुरुआती दौर का एक चॉकलेटी चेहरा जो उस वक़्त सबसे ज़्यादा डिमांड में था। एक एक्टर जो अपनी की हुई गलतियों पर शायद रोज़ अफ़सोस करता है। ज़िंदगी की बेरहमी के अच्छे उदाहरणों में से एक –

अविनाश वधावन

मुझे याद है मैंने मेरे पास फ़िल्म “आई मिलन की रात” की कैसेट थी, और उसके सारे गाने मुझे बहुत पसंद थे। गाने बहुत हिट भी थे । सावन का महीना आया है, देखें अपनी किस्मत में काँटा है या फूल है, मत रो मेरे दिल, कसम से कसम से, आनंद-मिलिंद भी उस समय अपने पीक पर थे। “मत रो मेरे दिल” आज भी कहीं सुनाई देता है तो मुझे बचपन की बारिश याद आती है जब मैं ये कैसेट सुना करता था। हीरो अच्छा ही लगा था, हालाँकि फ़ैन जैसा तो कुछ नहीं हुआ पर दिखने में अच्छा था, एक्टिंग भी बुरी नहीं थी। आई मिलन की रात हिट रही थी और अविनाश वाधवन इंडस्ट्री के चहेते हीरो हो गए थे। गुलशन कुमार खास तौर पर बहुत पसंद करते थे। सब जानते है कि बाद में उनका करियर ढला और वे जल्दी ही दौड़ से बाहर हो गए। उस समय फ़िल्मों के लिए मेरा जुनून देख कर मेरी बड़ी बहन मुझे अविनाश वाधवन का उदाहरण देकर कहती थी कि फ़िल्मों में कोई भरोसा नहीं, देख वो अविनाश वाधवन इंजीनियर था फिर हीरो बना और अब गायब हो गया। 

अविनाश वाधवन वाकई में इंजीनियर थे, पढ़ाई के दौरान ही modeling के ऑफर मिल गए और इंजीन्यरिंग के बाद एमबीए के दौरान इतने डिमांड में रहने लगे कि पढ़ाई ही छोड़ दी। modeling से फिल्मों का सफर कैसे तय हुआ इसके विस्तार में नहीं जाएँगे क्योंकि आज हमारा विषय है कि किस तरह समय इंसान के साथ आँख-मिचौली खेलता है। इंसान के हाथ में कुछ नहीं रहता, सिवाय अफ़सोस के। मेरी किताब में ऐसे एक किरदार के बारे में मैंने तफ़सील से लिखा है – गायक अनवर। किस तरह रफी साहब के जाने के बाद सबसे ज़्यादा मांग में रहने के बाद भी अपनी कुछ गलतियों ने उनका करियर डुबो दिया। हालाँकि उन्हें तो घमंड था लेकिन अविनाश वधावन की कहानी चान्स की कहानी है। जब दोस्तों ने हीरो बनने के लिए प्रेरित किया तो कोशिश करने लगे। 

सुभाष घई उस वक़्त फ़िल्म “सौदागर” की कास्टिंग कर रहे थे और उन्हें नए लड़के की तलाश थी। उन्हें अविनाश का काम पसंद भी आया था पर चूंकि अविनाश की कद-काठी अच्छी थी तो वे रोल में फिट नहीं बैठ रहे थे, उन्हें कोई सामान्य सा, दुबला-पतला सा लड़का चाहिए था। तो सौदागर हाथ आते-आते रह गई। फ़िर पहली फ़िल्म मिली “आवाज़ दे कहाँ है”, जिसका संगीत नौशाद ने दिया था। उसी दौरान निर्देशक के पप्पू नई फ़िल्म शुरू करने वाले थे, निर्माता थे गुलशन कुमार। के पप्पू ने अविनाश का काम देखा, उन्हें गुलशन कुमार से मिलवाया, दोनों को काम पसंद आया तो सीधे तीन फ़िल्मों के लिए साइन कर लिया। एक नए एक्टर के लिए तो इससे बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता। “आई मिलन की रात”, “मीरा का मोहन” और “घर आया मेरा परदेसी”। 

1991 में ही एक बंदे ने उन्हें कांटैक्ट किया और एक नई फ़िल्म का प्रोपोसल दिया। हीरोइन नई थी, डाइरेक्टर भी नया था। उसने एक औडियो कैसेट में उस फ़िल्म के सारे गाने भी उन्हें सुनाये लेकिन अविनाश को लगा कि इस समय मुझे बिलकुल नए लोगों के साथ काम करने की रिस्क नहीं लेनी चाहिए और उन्होंने फ़िल्म के लिए इन्कार कर दिया। फ़िल्म होते-होते अजय देवगन के पास पहुंची और उससे अजय देवगन का debut हुआ। आप समझ ही गए होंगे ये फ़िल्म थी – “फूल और कांटे”। फूल और कांटे blockbuster साबित हुई। 

के पप्पू के छोटे भाई राज कंवर भी निर्देशक बनना चाहते थे। उनकी अविनाश वधावन बहुत अच्छी दोस्ती भी थी। जब उन्हें अपनी पहली फ़िल्म करने का मौका मिला तो वे सीधे अविनाश के पास गए और उन्हें कहानी सुनाई। फ़िल्म में दो हीरो थे और ऋषि कपूर को साइन कर लिया गया था। दूसरे हीरो के लिए ही वे अविनाश के पास गए थे लेकिन समस्या ये थी कि इस कैरक्टर की पर्दे पर एंट्री इनटर्वल के बाद हो रही थी। एक तो ये बात खटकी और दूसरे उस समय वे एक साथ बहुत सी फ़िल्में कर रहे थे तो डेट्स की प्रोब्लेम थी, तो इस फ़िल्म को भी इन्कार कर दिया, फ़िल्म में हीरोइन थी दिव्या भारती। दिव्या ने राज कंवर को एक नए लड़के से मिलवाया जो उनके साथ हेमा मालिनी की फ़िल्म “दिल आशना है” कर रहा था। उस लड़के को फ़ाइनल कर लिया गया। अब आप समझ ही गए होंगे, लड़का था शाहरुख ख़ान और फ़िल्म थी “दीवाना”। दीवाना भी हिट हो गई। 

एक रात अविनाश एक होटल में अपनी जन्मदिन की पार्टी कर रहे थे, वहीं यश चोपड़ा अपने परिवार के साथ आए हुए थे। जाते-जाते वे अविनाश को कह गए कि मंडे को मेरे ऑफिस आना। अब पार्टी खत्म होने पर अविनाश को अपनी बहन की याद आई जो पुणे में रहती थी। वे आधी रात को वहाँ निकल गए और अगले दो-तीन दिन वहीं रहे। मंडे निकल गया, उन्हें बिल्कुल ध्यान नहीं रहा कि यश चोपड़ा के ऑफिस में जाना है। मंगलवार को जब बॉम्बे पहुंचे तब याद आया। अगले दिन जब वे वहाँ पहुंचे तो बताया गया कि सोमवार को यशजी इंतज़ार करते रहे और फ़िर किसी और को उस फ़िल्म के लिए फ़ाइनल कर लिया गया। वो फ़िल्म थी “ये दिल्लगी” जिसका गीत “ओले ओले” उस समय क्रेज़ बन गया था। उन्हें मिलने वाला किरदार “सैफ अली ख़ान” को मिल गया। ये फ़िल्म भी हिट रही। 

इसके अलावा उनके अपने मैनेजर ने उन्हें धोखा दिया, उनके लिए जिन फिल्मों के ऑफर आते थे उनमें एक दूसरे हीरो को फिट करवा देता था। महेश भट्ट उन दिनों फ़िल्म "सर" की कास्टिंग कर रहे थे। उनकी फ़िल्म जुनून में अविनाश ने काम किया ही था तो सर के लिए विक्रम भट्ट ने उन्हीं को prefer किया। बात हुई और अविनाश ने अपने मैनेजर से डेट्स के लिए बात करने को कह दिया। मैनेजर से मिलने जब विक्रम भट्ट पहुंचे तो पहले तो उन्हें 3 घंटे इंतज़ार करवाया मैनेजर ने और फिर कह दिया कि डेट्स नहीं हैं। विक्रम भट्ट चले गए। 2-3 महीने बाद जब उनकी अविनाश से मुलाक़ात हुई तो ये बात खुली जबकि भट्ट के लिए वो किसी की भी डेट्स एडजस्ट कर देते। तब तक फ़िल्म अतुल अग्निहोत्री को मिल चुकी थी। इस तरह एक और हिट फ़िल्म उनके हाथ आते-आते रह गई। 

उस शुरुआती दौर में बहुत सारे फ़िल्मकारों को उनमें भविष्य नज़र आता था और रोमांटिक हीरो के लिए उन्हें ही ध्यान में रखने लगे थे। इसी बीच उनकी बहुत सी फ़िल्में अटक गईं। हालाँकि उस समय काफी फ़िल्में अटकती थीं। फ़िर उनकी शादीशुदा ज़िंदगी में बहुत सी समस्याएँ आ गईं जिससे भागकर वे बाहर चले गए। एक बार इंडस्ट्री से कटे तो फ़िर वापसी नहीं कर पाये। उन्हें बाद में हीरो के अलावा दूसरे कैरक्टर मिले लेकिन वे सिर्फ हीरो ही करना चाहते थे इसलिए बात नहीं बनी। और जितनी जल्दी उनका सितारा उदय हुआ था, उतनी ही जल्दी अस्त हो गया। अगर उनके दृष्टिकोण से सोचें तो ये वाकई बहुत तकलीफ़ देने वाली बात है। उनके समय जो उनसे बहुत पीछे थे, जैसे अक्षय कुमार, सुनील शेट्टी, वे धीरे-धीरे बहुत आगे निकल गए, आज भी स्टार हैं लेकिन वे गुमनाम हो गए। टीस  तो देती है इस तरह की बातें चाहे कोई कितना भी दर्शन झाड ले। 

एक इंटरव्यू में उनसे पूछा भी गया कि आपकी कोई विश जो आप करना चाहते हों तो उन्होंने यही कहा कि मैं एक बार फ़िर उस 91-92 के समय में जाना चाहूँगा और इस बार वो गलतियाँ नहीं करूंगा जो मैंने उस वक़्त कीं। 

पर “गुज़रा हुआ ज़माना आता नहीं दोबारा”।

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