12 कक्षा उत्तीर्ण करके हमने उच्च शिक्षा के लिए शहर का रुख़ किया। इंदौर का सबसे बड़ा आकर्षण मेरे लिए वहाँ के सिनेमा घर थे। उसके पहले जब भी गाँव से वहाँ जाना होता तो सड़कों पर रिक्शा में, टेम्पो में सफर करते मेरी निगाहें फिल्मों के पोस्टर्स पर ही जमी रहती थीं। जब इंदौर रहने लगा तो लगभग सारे ही सिनेमा घरों में फिल्में देखीं। 1994 में मैंने इंदौर पहुँच कर सबसे पहली फिल्म देखी थी “1942 अ लव स्टोरी”, फिर “हम आपके हैं कौन” और फिर “मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी”। नवम्बर में रिलीज़ हुई थी “अंदाज़ अपना अपना”। ज़्यादा कुछ पता नहीं था फिल्म के बारे में, एक मित्र के साथ देखने पहुंचे, और मुझे अब तक याद है कि हँस-हँस कर पेट में दर्द होने लगा था। ऐसा लग रहा था कि बस करो भाई, अब और हँसा नहीं जाता। और तब से अब तक मैंने गिनना भी छोड़ दिया है कि कितनी बार ये फिल्म मैंने देखी है। मुझे इसके सारे संवाद रटे हुए हैं। आज भी जब मौका मिले देख लेता हूँ। मुझे नहीं लगता कि इस तासीर की कोई और फिल्म भी है जो इतनी बार देखने के बाद भी, और इतने बरस बीत जाने पर भी पुरानी नहीं पड़ती। इसकी सबसे खास बात यही है कि ये हर पीढ़ी को पसंद आती है।
1990 या 91 की बात है। राजकुमार संतोषी अपनी पहली फिल्म घायल की सफलता का आनंद ले रहे थे। उन्हें बहुत से निर्माताओं के फोन आ रहे थे अगली फिल्म करने के लिए। ऐसे में एक दिन जब वे किसी रैस्टौरेंट में बैठे थे, विनय सिन्हा उनके पास आए। विनय सिन्हा के भाई आमिर खान के मैनेजर थे। उन्होने कहा मुझे आमिर को लेकर फिल्म बनानी है, मैं चाहता हूँ कि आप डाइरैक्ट करें। संतोषी ने कहा आमिर से बात करने की इच्छा ज़ाहिर की। आमिर से बात हुई, आमिर ने कहा कि ज़रूर करेंगे आप कहानी तय कीजिये। फिर विनय सिन्हा ने कहा कि सलीम साहब से भी मेरे काफी अच्छे संबंध हैं, और सलमान के साथ भी फिल्म करनी है तो संतोषी ने पूछा मतलब दो फिल्में करना चाहते हैं? सिन्हा ने कहा कि नहीं, अगर एक ही फिल्म में दोनों को ले सकें? सलमान को भी फोन लगाया गया, सलमान भी संतोषी के साथ फिल्म करना चाहते थे। तय हो गया कि ये दोनों हीरो होंगे, पर कहानी क्या होगी ये नहीं पता था। उस वक़्त दोनों नए ही थे। आमिर को तीन साल हुए थे और सलमान को दो।
संतोषी ने तय किया कि कॉमेडी बनाई जाये। ऐसा कहा जाता है कि टॉम अँड जेरी को ध्यान में रखते हुए इसे लिखा गया है लेकिन ये गलत है, संतोषी ख़ुद कहते हैं कि इसे आर्ची कॉमिक्स की तर्ज़ पर बनाया गया था। फ़िल्म का लुक भी कॉमिक बुक की तरह ही रखा गया है। चटख रंग हैं, उसी तरह के characters हैं। अब सवाल ये था कि आमिर और सलमान को लेकर इसमें इसमें नया क्या किया जाये? आमिर और सलमान की स्थापित छवि रोमांटिक हीरो की थी, जिनके पीछे लड़कियां भागती हैं। तय किया गया कि इस फिल्म में इन्हें लड़कियों के पीछे भागते दिखाया जाये; और ये पीछे भागना प्यार-मोहब्बत की वजह से न हो बल्कि वजह कुछ और हो। बस यहीं से कहानी बनाना शुरू हुई। आमिर का पात्र बनाया जो ओवर कॉन्फिडेंट है और सलमान का पात्र बुद्धू है। हीरोइन के लिए पहले रवीना और मनीषा कोइराला को लेने का प्लान था लेकिन मनीषा की डेट्स की वजह से ये रोल करिश्मा कपूर को मिला। अपनी राय बताऊँ तो मुझे करिश्मा ही इस फिल्म की कमजोर कड़ी लगीं थीं, जब पहली बार फिल्म देखी थी। अब तो ख़ैर आदत पड़ गई है पर मनीषा वाकई में बहुत बेहतर होती। फिल्म के लिए बेहतरीन actors लिए गए, कुछ पुराने दिग्गजों को बरसों बाद वापस लाया गया जैसे महमूद, देवेन वर्मा, जगदीप। इनके अलावा, परेश रावल, टीकू तलसानिया, शक्ति कपूर, विजू खोटे और शहज़ाद ख़ान। अगर आपको मालूम न हो तो बता दें कि शहज़ाद खान, पुराने दौर के मशहूर खलनायक अजीत के बेटे हैं और इस फ़िल्म में उनसे संवाद अदायगी भी उनके पिता के अंदाज़ में करवाई गई है।
क्राइम मास्टर गोगो का किरदार पहले टीनू आनंद को दिया गया था लेकिन उनकी डेट्स नहीं मिलने की वजह से वो शक्ति कपूर की झोली में चला गया। एक और बात जो शायद बहुत कम लोगों को पता हो कि इसमें अमरीश पुरी भी थे और उनका बड़ा दिलचस्प किरदार था...वे बने थे मोगम्बो के भाई ज़ोरेंबों। फिल्म में शक्ति कपूर का डाइलॉग है – “मोगम्बो का भतीजा क्राइम मास्टर गोगो”। अमरीश पुरी का डाइलॉग था “ज़ोरेंबों ख़ुश नहीं हुआ”। ज़ोरेंबों के लिए कॉस्ट्यूम्स भी बन चुकी थीं। मोगम्बो काले कपड़े पहनता था, ज़ोरेंबों के लिए पूरे सफ़ेद कपड़े तय हुए। अमरीश पुरी इसे करने के लिए उत्साहित थे पर शूट के पहले उस किरदार को ही फिल्म से हटा दिया गया क्योंकि फिल्म बहुत लंबी हो रही थी। मैं तो कहता हूँ, रख ही लेते, हम तो पूरी फिल्म ही कई बार देख चुके, उस किरदार को और देखना कितना अद्भुत अनुभव होता।
फिल्म में जूही चावला ने एक छोटा सा रोल किया है जिसमें वे जूही चावला ही बनी हैं और गोविंदा भी हैं जो गोविंदा ही हैं फिल्म में भी। गोविंदा वाला रोल दर असल सनी देओल करने वाले थे पर जिस दिन शूटिंग थी उस दिन वे कहीं फँस गए थे। फिल्मिस्तान स्टुडियो में शूटिंग हो रही थी। संतोषी ने पूछा, अभी किसकी शूटिंग चल रही है यहाँ? पता चला गोविंदा शूट कर रहे हैं तो संतोषी ने उन्हें बुलाया और कहा ये छोटा सा काम है। गोविंदा खुशी-खुशी तैयार हो गए। जो होता है अच्छे के लिए ही होता है।
फिल्म को बनने में तीन साल लग गए। इस बीच राजकुमार संतोषी की “दामिनी” भी रिलीज़ हो गई। आमिर और सलमान की भी और फिल्में आ गईं थीं। फ़िल्म का प्रीव्यू ही कई बार रखा गया, क्योंकि जो भी देखता उसे मज़ा आ जाता, वो और भी प्रीव्यू रखवाता। प्रीव्यू देखकर महमूद खड़े होकर देर तक ताली बजाते रहे और सरोज खान तो हँसते-हँसते सोफा से ही नीचे गिर गई थीं। इतना सब होने पर भी सबसे बड़ी विडम्बना ये थी, कि फ़िल्म जब रिलीज़ हुई तो कोई हलचल नहीं हुई। जबकि डाइरेक्टर और actors मार्केट में छाए हुए थे फिर भी जैसी उम्मीद थी वैसी नहीं चली फ़िल्म। फ्लॉप नहीं हुई पर हिट भी नहीं हुई। मुझे उस समय बड़ा दुख हुआ था कि इतनी अच्छी फ़िल्म देखो चली नहीं। इसको तो ब्लॉक बस्टर होना चाहिए था।
संतोषी ने तय किया कि संगीत vintage फ़ील लिए होना चाहिए इसीलिए फ़िल्म का संगीत ओ पी नैयर स्टाइल का था। तुषार भाटिया संगीतकार थे। गीत अच्छे थे लेकिन चले नहीं, अपने पुराने अंदाज़ के कारण। मुझे भी उस वक़्त कुछ समझ नहीं आया कि आख़िर ऐसे गीत क्यों बनाए हैं। तुषार भाटिया को भी उसके बाद कोई काम नहीं मिला लेकिन अब सुनकर लगता है कि अपना काम उन्होने बख़ूबी अंजाम दिया था। “ये रात और ये दूरी” फिल्म का सबसे अच्छा गीत था।
फिल्म में अभिनय के लिहाज से सभी ने अच्छा काम किया था, कुछ एक्सट्रा कलाकारों को छोड़ कर जिन्हें लापरवाही से कास्ट किया गया है। इसमें तो सलमान ने भी अभिनय किया है। फिल्म की शूटिंग के दौरान ऐसी ख़बरें भी थीं कि संतोषी और सलमान के बीच झगड़ा हो गया है। झगड़ा कुछ बड़ा नहीं था, हुआ यूं था कि आमिर जब तक सब कुछ पर्फेक्ट न हो जाये तब तक संतुष्ट नहीं होते सो वे अपने हर दृश्य की रिहर्सल करते थे, कई-कई बार करते थे। इसके विपरीत सलमान बिना किसी रिहर्सल के ही शॉट देते हैं। जब आमिर रिहर्सल कर रहे होते तो संतोषी सलमान को भी कहते कि तुम भी शामिल हो जाओ कुछ अच्छा ही होगा। इस पर कई बार वे सलमान पर नाराज़ हो जाते थे। तीन सालों में सभी के अहंकार कभी न कभी आपस में टकराए।
ख़ैर, जो भी हुआ हो पर एक बेहतरीन फिल्म हमें देखने को मिली। फिल्म के न चलने की वजह पब्लिसिटी न होना तो था ही इसके अलावा ये भी था कि जो distributer इसे रिलीज़ कर रहा था, वो भी नया था।
फिल्म की तारीफ़ में इतना ही कहना काफी है कि ये लेख लिखते-लिखते मेरा फिर से मन किया और मैंने एक बार और देख डाली।
उस समय भले बहुत न चली हो लेकिन समय के साथ ये अपने आप में एक मिसाल बन गई जिसे अङ्ग्रेज़ी में कल्ट क्लैसिक कहते हैं। ये सभी माध्यमों को मिलाकर सबसे ज़्यादा देखी जाने वाली फिल्म है। इसके अगले भाग की ख़बरें तभी से आ रही हैं लेकिन अब तक बन नहीं पाई। जैसा कि हमारे यहाँ होता है, अगला भाग बरबाद कर दिया जाता है। अगर इस फिल्म का अगला भाग बनाना है तो सबको उसी मासूमियत के साथ काम करना होगा तभी ये रिज़ल्ट मिल सकता है।
इस फिल्म के निर्माता विनय सिन्हा ने इसके बाद एक ही फिल्म और बनाई “नसीब” जिसमें गोविंदा, राहुल रॉय और ममता कुलकर्णी थे। ये फिल्म फ्लॉप रही थी।
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