पाँच रुपैया बारा आना


 "पाँच रुपैया बारा आना"

फ़िल्म "चलती का नाम गाड़ी" का ये गाना सबने सुना होगा पर कभी इस पर ध्यान नहीं दिया होगा। ये गीत नहीं दर्शन है। 

इस गीत की सिचुएशन ये है कि नायिका ने नायक से अपनी गाड़ी ठीक करवाई थी और उसका पाँच रुपया बारह आना उस पर बाकी है। नायक, नायिका की खूबसूरती से अभिभूत है लेकिन उसे अपने बड़े भाई का डर भी सता रहा है। डर अपनी जगह है, पर उसे भी लग रहा होगा मन ही मन कि पैसा कैसे छोड़ दूँ?

भारतीय दर्शन "पैसा भगवान तो नहीं पर भगवान से कम भी नहीं" के अनुरूप उसने तय किया है कि प्यार-मोहब्बत अपनी जगह है, चाहे सामने मधुबाला ही क्यों न हो, जिसकी एक मुस्कुराहट पर लाखों लोग जान देने को तैयार हों, वो सब अलग बात है और पाँच रुपैया बारह आना अलग। मुस्कुराहट पे मैं भी मर मिटूँगा पर पैसा नहीं छोडूंगा। 

उधर नायिका भी टक्कर की ही है। उसने भी तय किया है कि इसको मुस्कुराहट में, अपने हुस्न में उलझा कर पाँच रुपैया बारह आना भुला दूँ। अब देखिये ये बड़ी ही विकट परिस्थिति है, जिसे सुनने वाले हँसी में उड़ा देते हैं। एक तरफ नायक को अपने अंदर के आदमी को दबाते हुए नायिका से बेशर्म होकर पैसा मांगना है, और दूसरी तरफ नायिका की मुश्किल ये है कि ये लाखों में एक ही मिला है, जो इतना बेशरम होकर पैसे के ही पीछे पड़ गया है जबकि इतिहास गवाह है कि लोगों ने ज़मीन-जायदाद लुटा दी है एक मुस्कुराहट पर। 

नायिका पहला ही वार कड़ा करती है -

"मैं सितारों का तराना, मैं बहारों का फसाना 

लेके इक अंगड़ाई मुझपे डाल नज़र बन जा दीवाना"

यहाँ वो पैसों का ज़िक्र न करके अपने हुस्न से बात शुरू कर रही है ताकि वो पैसों की बात छेड़ ही न पाये। 

लेकिन नायक भी अपनी तरह का एक ही मजबूत मर्द है, वो ये सब स्वीकार करके भी सीधे मुद्दे पर आ जाता है -

"रूप का तुम हो खज़ाना, तुम हो मेरी जाँ ये माना

लेकिन पहले दे दो मेरा, पांच रुपैया बारा आना"

इसके बाद वो दो बार और रक़म बताता है ताकि कुछ कम न हो जाएँ। इसके साथ ही भैया का डर भी बेझिझक बता देता है कि "मारेगा भैया ना ना ना"

अंतरे में नायिका थोड़ा सीधे-सीधे कहती है "माल, ज़र भूलकर, दिल जिगर हमसे निशानी मांगो ना"

इस बात पर कई मर्द शर्मिंदा होकर पैसा छोड़ देंगे तो कई फ़िदा होकर लेकिन हमारा नायक आसानी से छोडने वाला नहीं है, वो कहता है - "तेरे लिए मजनू बन सकता हूँ, लैला लैला कर सकता हूँ" यानि उसकी मोहब्बत भी हाथ से न जाये पर.....

पाँच रूपपैया बारा आना इंपोर्टेंट है। 

नायिका को पता चलता है कि बंदा कलाकार है, वो उसकी इसी कमज़ोर नब्ज़ को पकड़ने की कोशिश करती है - "ग़म भुला, साज़ उठा, राग मेरे रूप के तू गाये जा" नायक इस दाँव को भी झेल जाता है - "गीत सुना सकता हूँ दादरा गिनकर पूरे बारा मात्रा"।  इस पर नायिका एक आखरी कोशिश करती है कला के नाम पर - "तू कला का है दीवाना कम है क्या तुझको बहाना", उसे लगता है कि कलाकार तो हुस्न पर फ़िदा हो ही जाता है लेकिन नायक इस बार सीधे झटक देता है - "हाँ ये अच्छा है बहाना, मैं कला का हूँ दीवाना लेकिन पहले...."

उफ़्फ़! किसी तरह हाथ ही नहीं रखने दे रहा कमबख़्त। दो अंतरे हो गए पर मान ही नहीं रहा, एक और अंतरा गाना पड़ेगा। 

नायिका फ़िर कोशिश करती है - "बेखबर, प्यार कर, धन की दुनिया क्या है ढलती छाया है"। इस बार लाज-शरम सब छोड़ सीधे प्यार पर आ गई लड़की, अब तो इसे मान ही जाना चाहिए...नायक ख़ुश तो है पर....

"हाय हाय हाय दिलरुबा, सच कहा साँच तेरा प्यार बाकी माया है"

पर दे दे रे "पाँच रुपैया...."

नायिका अब मायूस हो चली है, वो आखरी दाँव चलती है जिस पर 100 में से 99 पुरुष आत्मसमर्पण कर दें - "ओ हो हो मैं हूँ तेरी जान-ए-जाना आ मुझी से लौ लगाना

लेके इक अंगड़ाई मुझ पे, डाल नज़र बन जा दीवाना"

पर हमारा नायक उन 99 के बाद जो एक बचता है, वही है - 

"जै गुरू मैने ये माना तू है मेरि जान-ए-जाना

लेकिन पहले दे दो मेरा - यक दुइ तीन चार पांच

पाँच रुपैया बारा आना ..."

इस बार नायिका हार मान लेती है और गाना बंद कर देती है। उसे समझ आ जाता है कि ये चतुर बनिया है। 

गीतों में कितनी गहरी फ़िलॉसफ़ि छुपी होती है पर कौन सुनता है इतने ध्यान से? 

जय किशोर दा, जय आशा ताई।

और जय जय मजरूह साहब। 

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