मामन्नन - बेहतरीन फ़िल्म


 

मैनस्ट्रीम बॉलीवुड से आपने कब जातिगत भेदभाव पर आधारित फ़िल्म देखी थी, या किसी भी सामाजिक समस्या को केंद्र में रखकर बनाई हुई फ़िल्म देखी थी, सोचकर बताइये। 

मुझे तो जाति पर आधारित कहानी बहुत पीछे जाकर एक ही याद आती है – “जाग उठा इंसान” इसके अलावा जो बना है वो आर्ट फ़िल्मों की श्रेणी में चला जाता है जिनका दर्शक वर्ग बहुत ही सीमित था, जैसे सत्यजित रे की मुंशी प्रेमचंद की कहानी पर आधारित फ़िल्म "सद्गति"। दक्षिण से हाल ही में “जय भीम”, “कर्णन” और अब “मामन्नन” आई है। जाने क्यों हमारे तरफ़ के लोगों को अच्छी चीजों से एलर्जी है, ये भी साउथ की फ़िल्म है लेकिन साउथ के नाम पर कचरा ही खा रहे हैं, ये सर के ऊपर से चली जाएगी। ऐसा भी नहीं कि ये कोई आर्ट फ़िल्म है, कमर्शियल ही है लेकिन फाइट सींस में लोग उड़ नहीं रहे हैं, और भी जो मूर्खताएँ होती हैं वे सब नहीं हैं। 

फ़िल्म प्रतीकों से भरी पड़ी है, पेरियार, अंबेडकर, बुद्ध की छवियों से बिना कुछ कहे बहुत कुछ कहा गया है। फ़िल्म अपनी थीम भी सूअर और कुत्तों के बिंबों के जरिये कहती चलती है। पूरी फ़िल्म में इनका उपयोग शोषित और शोषक के लिए किया गया है। 

फ़िल्म की कहानी है मामन्नन की जो अपने इलाके का विधायक है। मामन्नन के बेटे ने उससे पिछले 15 सालों से बात नहीं की है जिसकी बैक स्टोरी का पहला ही दृश्य बहुत लोमहर्षक है जब निचली जाति के चार बच्चे मंदिर के कुएँ में नहा रहे होते हैं और उनकी पत्थर मार-मार कर हत्या कर दी जाती है, उन्हीं में एक मामन्नन का बेटा वीरा भी है जो बचकर निकल जाता है। मामान्नन जिसे लोग मन्नू कह कर बुलाते हैं, एक राजनीतिक दल का कार्यकर्ता है जिसका अपने एरिया पर इतना प्रभाव है कि उसके कहने से उसी दल को सारे वोट मिलते आए हैं। मन्नू अपने नेता से न्याय के लिए कहता है पर उन चार सवर्णों को बचाने के लिए उनकी पूरी बिरादरी सड़क पर आ जाती है। राजनीति का तक़ाज़ा है कि उन्हें नाराज़ नहीं किया जाये और मन्नू को समझा दिया जाता है। कालांतर में मन्नू विधायक बन चुका है लेकिन किंग मेकर रत्नवेलु है जिसके पिता के साथ मन्नू काम किया करता था। रत्नवेलु के घर में आज भी मन्नू कुर्सी पर नहीं बैठता है। रत्नवेलु सनकी और बहुत क्रूर इंसान है तिस पर जाति का घमंड करेला ऊपर नीम चढ़ा हो जाता है। घटनाएँ कुछ ऐसी घटनी हैं कि रत्नवेलु और मन्नू का बेटा वीरा आमने-सामने आ जाते हैं और ये लड़ाई व्यक्तिगत से सामाजिक और राजनीतिक हो जाती है। ये लड़ाई बाप-बेटे को फिर से एक साथ ले आती है और मन्नू आखिर मामन्नन बन जाता है जिसका अर्थ होता है “राजा”। 

मामन्नन के किरदार में वेदिवेलु पहली बार कॉमेडी छोड़ गंभीर रोल में आए हैं और कमाल का अभिनय किया है। हम लोगों ने उन्हें अपने जमाने में “हमसे है मुक़ाबला” के गीत “पट्टी रैप” में देखा था, वो उनका पहला बड़ा रोल था। वीरा का किरदार उदयनिधि स्टालिन ने किया है जो तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन के बेटे हैं। ये उनकी आखरी फिल्म थी क्योंकि अब वे तमिलनाडु सरकार में मंत्री हैं और अपना पूरा ध्यान उसी पर देना चाहते हैं। show steeler हैं हमेशा की तरह “फ़हाद फाजिल” जिन्होने रत्नवेलु का किरदार निभाया है। उन्हें हीरो बना दें या विलन पर्दे पर बस कमाल देखने को मिलता है। देखा जाये तो बहुत ही सामान्य कद-काठी का है ये इंसान पर अपने कैरक्टर में इस तरह जान डाल देता है कि extra ordinary दिखने लगता है। फिल्म में उनकी आँखें, उनकी body language, एक-एक चीज़ से कमीनापन टपकता है। और गोबर पट्टी प्रभास जैसे नॉन एक्टर के पीछे भीड़ लगा देती है। गोबर पट्टी में ऐसे विचारोत्तेजक विषयों पर फ़िल्में न बनने का अब एक कारण व्हात्सप्प university भी है जिसने इन कम अक्लों को ये विश्वास दिला दिया है कि जातिगत भेदभाव हमारे देश में था ही नहीं। ये इतने जड़ बुद्धि हैं कि अपने स्वयं के घर में काम वालों के लिए रखे अलग चाय के कप देखकर भी इस पर भरोसा करते हैं। कीर्ति सुरेश बहुत सुंदर लगी हैं हालांकि करने को बहुत कुछ नहीं है फिल्म में उनके। 

Subtitle बनाने वाले को पता नहीं क्यों ऐसा लगा कि फोन पर अगर बात हो रही है तो सामने वाले के डाइलॉग लिखने की ज़रूरत नहीं है।

निर्देशक मारी सेल्वाराज की ये तीसरी फिल्म है और तीनों ही फ़िल्में उन्होने इसी थीम पर बनाई हैं। कहानी को कहते हुए कहीं भी उन्होने बोर नहीं किया। फिल्म में थ्रिल तो बना ही रहता है पर समय-समय पर भावनाओं का प्रदर्शन छू जाता है। सिनेमैटोग्राफी कमाल है, ड्रोन शॉट्स बहुत ही खूबसूरत लिए गए हैं। गाने ऐसे हैं कि हिन्दी में न होने के बावजूद आगे बढ़ाने का मन नहीं किया। रहमान के गीत और पार्श्व संगीत बेहतरीन है।

दक्षिण से बेहूदगी के अलावा बहुत कुछ है जो सीखने लायक है जैसे अपनी फिल्मों में सामाजिक मुद्दों को उठाना, बड़े स्टार्स का भी अलग तरह के किरदार करते रहना। ममूटी जैसा सुपर स्टार बहुत काम कर रहा है और बिलकुल ही अलग-अलग तरह के किरदार कर रहा है। हाल ही में भ्रमयुगम में बिलकुल ही अलग तरह का किरदार किया है। या मोहनलाल, या फ़हाद फाजिल को ही ले लीजिये, कितनी तरह के किरदार कर रहे हैं। इन्हें इस बात से भी गुरेज नहीं कि फिल्म में इनकी एंट्री इनटर्वल में हो रही है। रहमान भी वहाँ खुलकर अपनी तरह का संगीत बना सकते हैं, यहाँ एमबीए वाले किसी को काम नहीं करने देते। 

एंड क्रेडिट्स के समय रहमान को स्क्रीन पर एक बेहतरीन गीत गाते देखना बोनस रहा। अगर आपने नहीं देखी है तो ज़रूर देखें। 

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