ख़ालिस सिनेमा!
ज़िंदगी से निकले किरदार, गहराइयों से निकले संवाद, और अभिनय? अभिनय है कहाँ? सब कुछ तो असल है?
मालेगाँव की पहली फ़िल्म “मालेगाँव के शोले” के लिए ऑडीशन चल रहे हैं, वीरू के किरदार के लिए कोई जंच नहीं रहा है, शफ़ीक़ की दिली इच्छा है अभिनय करने की लेकिन स्वभाव ऐसा है कि बोल नहीं पाता। जब कुछ लोग रिजैक्ट हो जाते हैं तो बड़ी मुश्किल से हिम्मत करके बोलता है – “मैं कोशिश करूँ?”
जैसे ही वो कैमरा के सामने तैयार होकर संवाद बोलने ही वाला होता है कि धड़ाक की आवाज़ से दरवाज़ा खुलता है और राजू वीरू के किरदार में ही अंदर आता है डाइलॉग बोलते हुए। सब लोग तालियाँ बजाने लगते हैं, और शफ़ीक़? उसका किसी को ध्यान ही नहीं रहता। उस वक़्त शफ़ीक़ के चेहरे पर जो भाव हैं, वो करोड़ों के हैं। वो कुछ न कहते हुए भी बहुत कह जाते हैं, सीधे दिल चीर कर अंदर उतर जाते हैं। ऐसे कितने ही पलों को अपने में समेटे चलती है ये अद्भुत फ़िल्म। ये वो सिनेमा है जो कभी-कभी बन जाता है। और ऐसा तब होता है जब संयोग से सब कुछ बेहतरीन मिल जाता है। कहानी, निर्देशक, सिनेमैटोग्राफर, और सारे ही लाजवाब एक्टर।
एक्सेल की फ़िल्मों में अक्सर सपनों की दुनिया के सपनों की कहानी होती है। रॉक ऑन, लक बाइ चान्स, गली बॉय्ज़, और अब सुपरबॉय्ज़ ऑफ मालेगाँव। इस फ़िल्म में एक डाइलॉग है कि, इन बंबई वाले प्रोड्यूसरों के लिए हम जैसे लोग मायने ही नहीं रखते, हम बाहर वाले हैं। मुझे नहीं पता के ख़ुद एक्सेल वालों का बाहर वालों के लिए क्या रवय्या है, वैसे तो ज़्यादातर एलीट क्लब के ही लोग नज़र आते हैं वहाँ।
ख़ैर, रीमा कागती एक क़ाबिल निर्देशक हैं इसमें कोई शक नहीं, उनकी अपने क्राफ़्ट पर पूरी पकड़ है, और एक निर्देशक की पकड़ सिर्फ कैमरा घुमाने पर ही नहीं बल्कि फ़िल्म के हर विभाग पर होती है, तभी वो क़ाबिल निर्देशक कहलाता है, चाहे वो अभिनेताओं से अभिनय करवाना हो, कैमरा हैंडल करवाना हो, संगीत हो, एडिटिंग हो, सब कुछ निर्देशक की नज़र से गुज़र कर ही पर्दे पर आता है, और अगर ये सभी चीज़ें बेहतरीन नज़र आ रही हैं, तो निर्देशक का काम अच्छा है। इस फ़िल्म का हर एक पहलू लाजवाब है, चाहे वो अभिनय हो, कैमरा हो, लाइट हो, कलर हो, फ़्रेमिंग हो, और बैक्ग्राउण्ड म्यूजिक का तो कहना ही क्या, एक अलग ही लेवल पर ले जाता है फ़िल्म को।
कहानी तो सबको पता ही है, कि मालेगाँव के कुछ लड़के मिलकर ख़ुद ही फ़िल्म बनाते हैं और वो फ़िल्म हिट हो जाती है। ये उन्हीं लड़कों की ज़िंदगी के उतार-चढ़ावों की कहानी है। ये सिर्फ इस एक घटना की कहानी नहीं है, उस घटना के पीछे भावनाओं की जो दुनिया है, उसकी कई कहानियों की कहानी है। ये दोस्ती की कहानी है, मोहब्बत की कहानी है, टूटने-बिखरने की कहानी है, टूट कर फिर खड़ा होने की, और ज़िंदगी की बेरहमियों से निगाहें मिलाने की कहानी है। कई जगह ये आपको हँसाती है, तो कई जगह आंसुओं को आँखों से बाहर निकलने पर मजबूर कर देती है, ख़ास तौर पर वो दृश्य जहाँ शफ़ीक़ पर्दे पर सुपरमैन बनकर उड़ रहा है, उसके दोस्त उसकी तरफ़ देख रहे हैं, उसकी आँखों से आँसू बह रहे हैं, वो नासिर को देखकर उसे सलाम करता है। आह! इस कारीगरी पर रीमा कागती को सलाम। ऐसे दृश्य यूँ ही नहीं बनते, जिगर का ख़ून लगता है इनमें।
आदर्श गौरव, विनीत सिंह, और शशांक अरोड़ा, कमाल के अभिनेता हैं। इसमें शशांक अरोड़ा का उल्लेख ख़ास तौर पर किया जाना चाहिए, इस फ़िल्म में उन्होने चुप रहकर जितना कहा है वो अद्वितीय है। न सिर्फ ये तीनों बल्कि एक-एक किरदार को निभाने वाला एक्टर अप्रतिम है। मुस्कान जाफ़री ने साबित किया कि अभिनेता जगदीप के ख़ानदान में अभिनय विरासत के रूप में पीढ़ियों को मिलता है।
मैंने इसे सिनेमा हॉल में ही देखा था, पर तब भावातिरेक में कुछ नहीं लिख पाया था, अब अमेज़न प्राइम पर आ गई है तो एक बार फिर देखी और फिर भावुक हुआ। अगर आपने नहीं देखी है तो सबसे पहले देखिये। ऐसी फ़िल्म को मिस करना, आपका अपना ही नुकसान है।
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