स्टोलन - बेहतरीन फ़िल्म

 


“स्टोलन”

किसी झुंपा की कहानी नहीं है, न रमन की, न उसके भाई गौतम की। ये कहानी है एक जाहिलों से लबालब भरे देश की। हालाँकि कहानी राजस्थान में घट रही है लेकिन इस देश में कहीं भी घटे, होना यही है। ये आईना है यहाँ के करोड़ों बाशिंदों के सामने, कि देख लो अपना वीभत्सा चेहरा। यहाँ समझ का कोई स्थान नहीं, विचार का कोई सम्मान नहीं, और तर्क...वो किस बला का नाम है?

सच्ची घटनाओं से प्रेरित इस फ़िल्म को देखा जाना निहायत ही ज़रूरी है लेकिन जिन लोगों की ये कहानी है वो इसे नहीं देखेंगे, देखेंगे भी तो हँसेंगे, गालियाँ देंगे, कि ये भी कोई फ़िल्म हुई? कोई नंगा नाच नहीं, कोई नंगा दृश्य नहीं। हुंह!

लेकिन वे चंद लोग इसे देखेंगे और सराहेंगे जिन्हें इस भीड़ के हाथों कभी न कभी जलील होना है, या बहुत संभव है, कभी मरना है। 

एक ही घटना से शुरू हुई कहानी, कैसे एक के बाद एक कई मोड़ लेती जाती है। ऐसा लगता है, कहीं कोई कट नहीं है, कोई फ़िल्म नहीं चल रही, ये असली घटनाएँ हमारी आँखों के सामने घट रही हैं। हम कुछ करना चाहते हैं, लेकिन बेबस हैं, उसी तरह जिस तरह रोज़ाना रहते हैं। गौतम अपने छोटे भाई को लेने रेल्वे स्टेशन आया है। प्लैटफ़ार्म पर झुंपा अपनी पाँच महीने की बच्ची के साथ सोई है। कोई औरत उसकी बच्ची को लेकर भाग जाती है। भागते हुए वो रमन से टकरा जाती है और बच्ची की टोपी उसके हाथ में रह जाती है। झुंपा की कुछ ही मिनटों में नींद खुलती है और बच्ची को न पा कर वो बदहवास सी उसे खोजने लगती है। शक़ रमन पर जाता है। वहाँ दो पुलिस वाले भी पहुँच गए हैं। स्टेशन पर बवाल होता है और लोग विडियो बनाने लगते हैं। कुछ देर में ये तो साफ़ हो जाता है कि बच्चा रमन ने नहीं चुराया है पर जो विडियो बन कर व्हात्सप्प university में दर्ज़ हो गया है उसका क्या? बस वही आगे की कहानी बनाता है। वैसे भी ये देश पिछले 11- 12 सालों से व्हाट्सएप से ही चल रहा है।

झुंपा की अपने बच्चे को लेकर जो बेचैनी है वो रमन को दुखी कर देती है और वो उसका साथ देने लगता है, अपने भाई गौतम के विरोध के बावजूद। 

विडियो इस बात के साथ फैल जाता है कि दो आदमी और एक औरत बच्चा चुराकर काले रंग की एसयूवी में भाग रहे हैं। भारत की महान भीड़ इस मामले को अपने हाथ में ले लेती है, क्योंकि पुलिस, अदालत, वगैरह तो सब फ़ालतू बातें हैं। तो भीड़ इनके पीछे लग जाती है, आगे की कहानी इसी चेज़ की है। 

फ़िल्म 2018 में आसाम में हुई एक सच्ची घटना पर आधारित है जिसमें दो युवकों को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला था। ये बच्चा चुराने वाली अफ़वाह पूरे देश में फ़ैली थी, हमारे गाँव में भी आई थी। उस केस में 28 लोगों को गिरफ़्तार किया गया था, पर आगे क्या हुआ पता नहीं। 

फ़िल्म देखते हुए मुझे “एनएच10” याद आ रही थी। वो भी इसी तरह की बेहतरीन थ्रिलर थी। “स्टोलन” निर्देशक करण तेजपाल की पहली ही फ़िल्म है, और उनका काम बेहतरीन है। कहानी बिलकुल आरिजिनल है। जहाँ एक तरफ़ 400 करोड़ रुपये बरबाद करके, अँग्रेजी फ़िल्म से कहानी चुराकर भी लोग “हाउसफुल” जैसा कूड़ा बना रहे हैं, वहीं कुछ लोग बहुत कम पैसों में असली कहानी, बहुत ही प्रभावी तरीके से कह रहे हैं। पर अफ़सोस की बात ये है कि इस देश में सारे संसाधन उन्हें बरबाद करने वालों के पास ही उपलब्ध हैं, और उनका सदुपयोग करने वाले ठोकरे ही खाते रहते हैं। यहाँ तक कि ये भीड़ भी उन्हीं के साथ है। 

अभिषेक बनर्जी धीरे-धीरे अभिनय की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए बहुत ऊपर पहुँच गए हैं। पताललोक का हथौड़ा त्यागी, स्त्री का जनार्दन, और अब गौतम। छोटे से समय में वे हर तरह के किरदार निभा चुके हैं और बहुत शिद्दत से निभा चुके। बस एक ही बात है, कि वे बहुत अमीर दिखते नहीं हैं। रमन के किरदार में शुभम वरधान ने भी बढ़िया काम किया है। मिया मीलज़ार बंगाली अभिनेत्री है जिन्होंने झुंपा का किरदार निभाया है और क्या कमाल निभाया है। वे एनएसडी से निकली हैं और छोटे ही समय में बहुत ख्याति प्राप्त की है। 

फ़िल्म कई अंतराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों से गुजरने, जिसमें वेनिस फ़िल्म फेस्टिवल भी शामिल है, और पुरस्कार प्राप्त करने के बाद अब प्राइम पर उपलब्ध है।

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