चीज़ें जब शुरू होती हैं तब सरल होती हैं। धीरे-धीरे लोग उस सरलता से ऊबने लगते हैं तो उसे कठिन बनाया जाने लगता है, और ये प्रक्रिया चलते-चलते वे एक दम जटिल हो जाती हैं। फिर एक अवस्था वो आती है कि इस जटिलता से भी ऊब होने लगती है और इंसान फ़िर एक बार सरलता की ओर चल पड़ता है।
तो, मैंने कल देखी “मुनीमजी” और उसी को देखकर ये दर्शन पैदा हुआ।
वो ज़माना था जब फिल्मकार कहानी और उसके execution को लेकर बहुत ज़्यादा माथा पच्ची नहीं करता था। पर्दे पर चलते चित्र अपने आप में मंत्र मुग्ध कर देने वाली चीज़ थी, उस पर एक कहानी भी मिले और साथ में मधुर गीत-संगीत तो कोई इतना दिमाग खर्चने को तैयार नहीं होता था कि ये पूछे कि बंधु अभी तो तुम पानी में गिर गए थे और अभी तुम्हारे कपड़े सूखे कैसे हैं? या कि शेर पास में ही है और तुम हीरोइन के साथ वाद-विवाद प्रतियोगिता में कैसे लगे हो? नहीं, एक खूबसूरत हीरो, एक खूबसूरत हीरोइन, 8-10 बढ़िया गाने और एक कमीना विलन। और क्या चाहिए? तो मैंने अपने वर्तमान वाले दिमाग को ब्रेक लगाया, उसे टाइम मशीन में बैठा कर 50 के दशक में पहुंचाया और फिल्म देखी, और सच कहूँ तो मज़ा भी आया, हालाँकि कहीं-कहीं दिमाग जाग जाता है और फाऊल-फाऊल चिल्लाने लगता है पर ठीक है।
कहानी है एक कमीनी प्लस दुखियारी माँ की और ये माँ है निरुपाराय। मुझे देखकर घोर आश्चर्य हुआ कि ये बचपन से माँ हैं? अमिताभ तो अमिताभ ये देव आनंद की भी माँ बन चुकी हैं। इस माँ ने जो पाप इस फिल्म में किए उसी के फलस्वरूप इसके बच्चे अगले कई सालों तक खोते रहे और ये कभी अंधी, तो कभी गूंगी होती रही। ऐसे कर्म करेगी तो और क्या होगा? असल में ये एक अमीर आदमी के बच्चे की माँ बन जाती है जो उसे अपनाने से इंकार कर देता है, उस आदमी का घर में भी एक बच्चा है जिसकी उतनी ही उम्र है। निरुपराय रात में बच्चों की अदला बदली कर देती है, आदमी गुस्सा होता है और जब अपना बच्चा वापस लेने जाता है तो उसे सांप काट लेता है। कोई उसे पहले ही चेता देता कि इसके चक्कर में मत पर, इसका पति और बच्चे ऐसे ही मारे-मारे घूमते हैं। और उसके बाद ज़िंदगी भर जो बच्चा ये पाल रही है उसे दूसरे बच्चे से पिटवाती रहती है, और खुद भी उससे जलील होती रहती है, क्योंकि वो इसका अपना बेटा है और ये दूसरे का।
होता यूँ है कि निरुपराय का बेटा है देव आनंद और वो काम करती है प्राण के घर में जो इसका असली बेटा है। एक हैं कप्तान साहब, जिनकी बेटी फिल्म की हीरोइन है और उसकी सगाई पैदा होते ही उस बच्चे से हो गई थी जो देव आनंद बना, पर निरुपराय ने चूँकि बच्चे बदल दिये थे तो सब समझते हैं कि प्राण से हुई थी।। कप्तान साहब की लकड़ी की टाल है जहां देव आनंद भी नौकरी करता है मुनीम की। पर वो भेस बदल कर नौकरी कर रहा है, नौकरी पर चुटिया, मस्सा और मूंछ लगा कर जाता है ताकि कोई पहचाने ना। मस्सा ऐसी चीज़ है जिसके बारे में भगवान को भी पता नहीं था कि इसके लगाने से आदमी पहचान में नहीं आता है। हीरोइन शहर से आ रही है और मुनीम उसे लेने जाता है पर लड़की पढ़ी-लिखी है तो उसका तुनक मिजाज होना उस जमाने में अनिवार्य माना जाता था तो मुनीम को वो बेइज़्ज़त कर के चली जाती है, फिर मुनीम अपने असली हैंडसम रूप में आकर फ्लर्ट करता है। कालांतर में इन दोनों में इलू इलू हो जाता है और प्राण के दोनों मिलकर मजे लेते रहते हैं, एक बार तो उस बेचारे से गाना गवाते हैं जबकि उसके गले में कोई सुर नहीं है और नाच भी नचवाते हैं। इसी के बीच एक डाकू की कहानी भी चलती रहती है जिसका नाम है “काला घोड़ा”। ये काला घोड़ा प्राण ही है। समझ नहीं आया कि इतने अमीर बाप की इकलौती संतान है फिर भी डाके क्यों डालता है? फिल्म की सिंप्लीसिटी ये है कि हमको शुरू से ही पता होता है कि प्राण ही काला घोड़ा है। आज के वक़्त में ये सस्पेन्स बनाने का अच्छा मौका था। तो कहानी में प्रेम कहानी है, माँ-बेटे की कहानी है, एक डाकू है जो इन दोनों कहानियों का खलनायक है।
देव आनंद को देखना सुखद अनुभव है काली-सफ़ेद फिल्मों में, और दुखद अनुभव है 70 के बाद की रंगीन फिल्मों में। पहले तो कम हिलते थे पर धीरे-धीरे वे पूरी तरह से वाइब्रेशन मोड पर चले गए थे। नलिनी जयवंत ने बहुत लाउड एक्टिंग की है। निरुपराय पर बुरी तरह खीझ आने लगती है, इस कदर दुखियारी प्लस कमीनी बताया है। कमीनी हमें लगती है, उसके हिसाब से तो वो नेक औरत है।
उस जमाने के गीतों के बारे में तो कहना ही क्या। मुझे लगता है एस. डी. बर्मन से ज़्यादा मेलोडी की समझ वाला संगीतकार दूसरा नहीं है। उनका अंदाज़ अनूठा है। वैसे तो देव आनंद के गीत किशोर कुमार गाते थे लेकिन इस फिल्म में दो गीत हेमंत कुमार ने गाये हैं, उनमें भी एक गीत “शिव जी बिहाने चले” इतना प्यारा है कि कई बार देख चुका हूँ। कंपोज़ीशन तो है ही ग्रेट पर फिल्मांकन भी बेहतरीन है। एक गीत है “दिल की उमंगें हैं जवाँ”, हेमंत कुमार और गीता दत्त के गाने के बीच बीच में प्राण से बेसुरा गवाया गया है, ये अच्छा प्रयोग है।
यूँ ही आराम से देखने का मन हो कि बिना टेंशन के फिल्म देख लें तो देख सकते हैं। मुझे कभी-कभी पुरानी फिल्में देखना अच्छा लगता है, हालाँकि कहानी और execution के पैमाने पर अब बहुत ही बचकानी लगती हैं। पर देव आनद के लिए देखी जा सकती है।
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