बैड न्यूज़ - रिएलि बैड | Bad Newz Movie Review

 

विकी कौशल और तृप्ति डिमरी की शादी हो जाती है। विकी की मम्मी के बार-बार डिस्टर्ब करने के बाद फाइनल्ली सुहागरात शुरू होती है और सीन ख़त्म होता है पलंग टूटने पर। जैसे ही पलंग टूटा मेरे पीछे से एक बच्चे की आवाज़ आई, “ओ पलंग ही तोड़ दिया”। मैंने हैरानी से पीछे देखा, एक 8-10 साल का बच्चा था, उसके पिताश्री और माताश्री उसे ये ज्ञानवर्धक फ़िल्म दिखाने लाये थे। मेरा ये बहुत strong belief है कि इस देश में पालक बनने की ट्रेनिंग की सख़्त ज़रूरत है। लोग बस खेल-खेल में ही माँ-बाप बन जाते हैं और फिर बच्चों को खिलौना समझते हैं। मैंने कई बाप ऐसे देखे हैं जो छोटे से बच्चे से गालियाँ बुलवाकर खूब हँसते हैं। उस सुहागरात के सीन के बाद तो पिटारा ही खुल गया था उस तरह के सींस का और वे माँ-बाप बच्चे से क्या उम्मीद कर रहे थे, I’m clueless. 

ख़ैर, तो कई मित्रों ने पूछा था कि इस कचरे के डब्बे को देखने मैं गया ही क्यों था? तो दर्द भरी दास्ताँ ये है दोस्तों कि मैं पीवीआर के पासपोर्ट घोटाले के कारण इसमें फँसा। गया मैं था “Deadpool vs Wolverine” देखने। मैंने पीवीआर का पासपोर्ट ले रखा था जिसमें एक महीने में चार फ़िल्में 349 रुपये में दिखाते हैं। इस महीने मैंने सिर्फ़ एक ही फिल्म देखी और चार तारीख को महीना पूरा भी हो जाएगा। कोई फ़िल्म देखने लायक लगी ही नहीं “kill” के बाद। वहाँ जाकर टिकिट बुक करने लगा तो पता चला कि ये वाली फ़िल्म पासपोर्ट से बुक नहीं हो सकती। हद है भाई, चोट्टई इस देश की रग-रग में बसती है। तो सोचा चलो “bad newz” ही देख लें, हालाँकि कोई बहुत इच्छा नहीं थी पर पासपोर्ट का उपयोग करना ही था। और फिर एक उम्मीद थी “आनंद तिवारी” का नाम देखकर। 

लेकिन जब फ़िल्म देखी तो एक भी सीन देखकर ये नहीं लगा कि ये वही निर्देशक है जिसने “बंदिश बैंडिट्ज़” बनाई थी। एक अच्छा निर्देशक व्यावसायिक सिनेमा भी अच्छा बना सकता है और इस फ़िल्म के विषय में तो बहुत दम था। सच में, कान्सैप्ट unique था और इसे इस फूहड़ता के साथ हैंडल नहीं किया जाता तो एक यादगार फ़िल्म बन सकती थी। हो सकता है निर्माताओं ने लेखकों से पहले ही लिखवा लिया हो और फिर आनंद तिवारी आए हों, और फ़िल्म की हर एक लाइन में इतने झोल हैं कि उन्हें भी लगा हो कि क्या-क्या बदलवाएँ? पर एक मिनट, एक निर्माता तो वो खुद ही हैं...damn!

फ़िल्म की शुरुआत वही घिसी-पिटी सिचुएशन है जहाँ मिडिल क्लास पंजाबी माँ एक हाइ क्लास पार्टी में अपनी बेटी के लिए लड़का तलाश रही है और लड़की शादी नहीं करना चाहती इस बात पर दृढ़ है। एक मिनट, दृढ़ का मतलब जानते हैं आप? मतलब 5 ही मिनट बाद एक लड़के से आधा मिनट बात करके ही फिसल भी जाती है। तो घुइयाँ का सपना है फिर बेस्ट शेफ बनने का। ऐसी ही गलतफहमियाँ पाल कर बहुत लोग फिल्मों में काम करने भी आते हैं, जुनून दिखाते हैं पर वो होता नहीं कहीं। तो पहले सीन में जिस लड़की के बारे में आपको convince किया गया था कि वो अपने काम को लेकर बहुत गंभीर है और उसे मेराकी अवार्ड जीतना है, वो 3 मिनट में ही धराशायी हो जाता है। और ये लड़की गाना वाना गाकर, दारू-शारु पीकर शादी कर भी लेती है। 

बंटी तो.....!

अब इसका irritating शौहर है, और उसकी और ज़्यादा irritating माँ है। इन दोनों से irritate होकर ये तलाक़ ले लेती है, बहुत ही फालतू से झगड़े के बाद। जिस तरह का मूर्ख ये आदम्मी है इसके साथ रहा भी नहीं जा सकता था। और अपनी heroin अपना सपना पूरा करने मसूरी निकल लेती है, एक फुददु से आदमी के बड़े से होटल में। 

मुद्दे पर आते हैं यार। तो मामला ये है कि इनको फ़िलम बनानी थी इस बात पर कि लड़की जब pregnant होती है तो पता चलता है बच्चे के दो बाप हैं। ऐसा संभव है और करोड़ों में कोई एक केस ऐसा होता है। तो इस पॉइंट पर आने के लिए इतना सारा राता फैलाया लेखक ने और डेढ़ घंटे खा गया। और इस पॉइंट पर पहुँचने के लिए ही बाकी सारे पॉइंट्स बनाए गए हैं, ये भी साफ़ ज़ाहिर होता है तो आप उबासियाँ लेने के अलावा कुछ भी नहीं कर सकते। न कोई ह्यूमर है, न कोई गंभीर बात। कॉमेडी की तरह प्रचारित किया गया लेकिन जबरन गुदगुदी करके हँसा रहे हैं, लिख कुछ भी ऐसा नहीं पाये जिससे अपने आप हँसी छूट जाये। उल्टे कोफ़्त पैदा होती है। जब मसखरा, compounder सा दिखने वाला डॉक्टर ये घोषित करता है कि दोनों ही बाप हैं तब इनटर्वल हुआ और मैंने फौरन वापस घर की ओर दौड़ लगा दी। ये टॉर्चर इससे ज़्यादा मैं सह नहीं सकता था।

मैंने “good newz” भी देखी थी और वो भी कुछ खास नहीं थी, पर इससे बेहतर थी ये मैं अब कह सकता हूँ। विकी कौशल बढ़िया अभिनेता हैं पर कैरक्टर ही ऐसा वाहियात लिखा गया हो तो वो भी क्या ही कर लेंगे। एमी विर्क तो मुझे नहीं ही जमे, डिमरी जबर्दस्ती गले पड़ रही है ये साफ़ नज़र आ रहा था। बंदे में ऐसी कोई बात नहीं थी जो इतनी इम्प्रैसिव हो। तृप्ति डिमरी मुझे कहीं से भी खूबसूरत नहीं दिखती और अभिनय भी औसत ही है। ऊपर से अनन्या पांडे को ऐसे लाया गया है जैसे कोई बहुत बड़ी स्टार हो। अपनी चंकी पांडे जैसी आँखें बड़ी-बड़ी करके बोलती रहती है बस। 

ख़ैर, गलती न करण जौहर की है, न आनंद तिवारी की है और न विकी कौशल की है, अच्छी फ़िल्में नहीं बनती रटने वाले दर्शक ही जब अच्छी फ़िल्म पिटवा कर इसे हिट करवा रहे हैं तो फिर यही बनाएँगे। आख़िर करोड़ों खर्च होते हैं फ़िल्म बनाने में और अपना घर भी देखना होता है, आपके confusion पर बर्बाद थोड़ी हो जाएँगे। आप देखो अच्छी फ़िल्में तो अच्छी बनेंगी, और आप हिट करवाओ बैड न्यूज़ तो बैड न्यूज़ ही मिलेगी। 

As simple as that!

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