मैंने अभी नई झक रिलीज़ हुई फ़िल्म देखी हॉलीवुड की जिसमें आपको अपने देसी टीन-टप्पर भरपूर देखने को मिलेंगे। फ़िल्म का नाम है “आइस रोड: वेंजिएन्स”। फिलहाल मैं अपनी एक कहानी के संदर्भ में बदले वाली फ़िल्में देख रहा हूँ, और इसके तो नाम में ही बदला है, तो बिना सोचे लगा ली। हालाँकि, बाद में पता चला कि बदला सिर्फ़ नाम में ही है, फ़िल्म में नहीं है।
आपने घायल, और संतोषी की ही एक और फ़िल्म फ़ैमिली देखी होगी, जिसमें खलनायक नायक और उसके साथियों का पीछा कर रहा है, और वे भागते हुए लड़ रहे हैं। हाल ही में आई जॉन अब्राहम की फ़िल्म “वेदा” भी ऐसी ही थी। और भी कई फ़िल्मों में ये कहानी देखी जा चुकी है, जाने क्यों हॉलीवुड में इस कहानी की खुजली मची? एक तो कहानी ही cliched है, उस पर कई सीक्वेंस भी बुरी तरह घिसे हुए हैं, जैसे खाई के मुहाने पर बस का झूलना। अरे हमने घटिया कॉमेडी फ़िल्मों में भी ये सीन देख रखा है। कोई सच ही कह रहा था, हॉलीवुड के भी कहानी के मामले में अब बुरे दिन चल रहे हैं। इतनी वाहियात कहानी है कि बॉलीवुड मसाला फ़िल्मों वाले ख़ुश हो सकते हैं। फ़िल्म देखते जाने के दो कारण रहे – एक लियम नीसन जो टेकन जैसी फ़िल्मों के हीरो रहे हैं, और दूसरा, वो नेपाल आते हैं, जो भारत जैसा ही लगता है। नीसन अब बहुत बुढ़ा गए हैं, और बुढ़ापा उनके ऊपर पूरा हावी दिखाई देता है। फ़िल्म देखने के बाद ही मुझे पता चला कि “आइस रोड” नाम से इसका प्रिकवल भी आ चुका है 2021 में।
खैर, कहानी ये है कि माइक और ऊक भाई पर्वतारोही हैं, भाई फौज में भी है। भाई की इराक़ में लड़ाई के दौरान मृत्यु हो जाती है। उसकी आख़री इच्छा है कि उसका अंतिम संस्कार कर, उसकी राख़ माउंट एवरेस्ट पर फैला दी जाये। उसकी इस इच्छा को पूरी करने इस बुढ़ौती में भी माइक नेपाल की तरफ़ कूच करता है। उधर नेपाल के अपने रोने चल रहे हैं। एक अदानी टाइप का व्यापारी है जो “उनके” टाइप के नेता का वरद हस्त पाकर, वहाँ के लोगों की ज़मीन लेकर वहाँ नदी पर बड़ा बाँध बनाना चाहता है। वहाँ का एक प्रतिष्ठित परिवार जो समाज सेवक है, इसके खिलाफ़ है। बस, व्यापारी को ये बात खटक जाती है और वो उन्हें मारने के लिए पीछे लग जाता है। दददु को निपटा कर वो पप्पा और पप्पा के बेटे विजय के पीछे लगता है। जिस दिन माइक नेपाल पहुँचकर अपनी गाइड धानी के साथ निकलता है, उसी बस में विजय और उसके पीछे-पीछे उसका अपहरण करने दो लोग आकर बैठ जाते हैं। बस में कुछ लोग और भी हैं। बस यहीं से इन दो अलग-अलग कहानियों के तार आपस में जुड़ जाते हैं। विजय को बचना हीरो अपना धर्म, और उसकी गाइड अपना कर्तव्य समझ लेते हैं। गाइड निंजा भी है। हीरो, पर्वतारोही है, गजब का लड़ाका है, ड्राईवर है, और इन सबसे बढ़कर जादू के लेवेल का मैकेनिक है। पूरी फ़िल्म यही चूहे-बिल्ली का खेल है, जिसमें कुछ लोग मरते हैं, और जिन्हें बचना है वे तो बच ही जाते हैं।
अगर हॉलीवुड को बॉलीवुड की तरह की ही फ़िल्में बनानी हैं तो मैं अब वहीं ट्राइ करूँगा।
बस मेरे ये जो दो घंटे बरबाद हुए, उसका हर्जाना कौन देगा, ये बता दें।
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