1947 Earth Theme Music Analysis: A R Rahman's True Genius


 दीपा मेहता की फ़िल्म "1947 अर्थ" ए आर रहमान का एक उपेक्षित एल्बम है, लेकिन ये रहमान की जीनियस का एक और मजबूत सबूत है। उपेक्षित शायद इसलिए कि इसमें कोई तेज़, कमर्शियल अपील वाला गीत नहीं था, नहीं रखा जा सकता था, फ़िल्म के विषय और प्रस्तुतीकरण को देखते हुए।

वैसे तो इसका एक-एक गीत हीरा है, पर आज मैं बात करना चाहता हूँ इसके "थीम म्यूजिक" पर। थीम म्यूजिक रचने में रहमान का कोई सानी नहीं है। "बॉम्बे" की थीम को तो पूरी दुनिया सराहती है, और उसके बाद ही सब उनसे हर फ़िल्म में एक थीम की उम्मीद करने लगे। अगर रहमान की थीम्स को ही इकट्ठा किया जाये तो एक लाजवाब संग्रह बनता है। बहरहाल, 1947 अर्थ विभाजन की त्रासदी पर बनी फ़िल्म थी, तो ज़ाहिर है थीम संगीत में इस त्रासदी और इसके असर को समाहित करना था। बहुत मुश्किल काम है, एक 2 मिनट के संगीत के टुकड़े में उस विशाल कोलाहल को महसूस करवा देना। और रहमान का जीनियस है कि इतनी ख़ूबी से उस समय को क़ैद किया है कि आप बेचैन हो जाते हैं।

शुरुआत संतूर के एक नोट से होती है। बहुत धीमा कोरस शुरू होता है और उसके बाद सरोद का एक टुकड़ा है, इस शांत संगीत के बाद अचानक जैसे कोलाहल होने लगा और वेस्टर्न सिम्फ़नि आ जाती है। cello, ड्रम्स और स्ट्रिंग्स के इस छोटे से कोलाहल के बाद फिर सरोद और संतूर अपनी जगह लेते हैं। जैसे सरोद आर्त्र पुकार है इंसानियत की और सिम्फ़नि की अराजकता उसे बार-बार दबा रही है। ये शांति और कोलाहल बारी-बारी से मुखर होते हैं और चुप होते हैं। ये संवाद है एक दौर की भयावहता के बीच भावनाओं का।

जब दो-तीन बार सरोद और सिम्फ़नि का संवाद हो चुका होता है तो कोरस देर तक हमिंग करती रहती है और पीछे स्ट्रिंग्स इस तरह चलती है जैसे आवाज़ें डूब रही हों, भयावन शोर, और त्रासदी के बाद की शांति पसर रही हो।

हमिंग और स्ट्रिंग्स साथ चलते-चलते डूबने लगती हैं, आवाज़ें फेड आउट होने लगती हैं और सन्नाटे में तब्दील हो जाती हैं, आप उन आवाज़ों के बाद के सन्नाटे को गूँजते हुए देर तक महसूस करते हैं।

अबकी जब आप सुनें तो सिर्फ इस थीम को खत्म होने तक सुनें और खत्म होने के बाद शांत बैठे रहें, आपको और ज़्यादा महसूस होगा।

यूँ ही नहीं रहमान जीनियस हैं।

क्या आपने इसे सुना है?

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