आवारा अंगारा - अरसे बाद लूप में सुनने वाला गीत



 

संगीत के इस घोर सूखे के युग में जब ठंडी फुहारों की तरह कोई गीत आए तो मेरा फर्ज़ बनता है कि आपको सूचित करूँ, ताकि उसकी ठंडक को महसूस करके आप कुछ पल सुकून के बिता पाएँ। 

और इस सूखे युग में पानी बस एक ही व्यक्ति के पास बचा है – ए आर रहमान।

निर्देशक आनंद एल राय की आगामी फ़िल्म “तेरे इश्क़ में” का एल्बम रिलीज़ हो गया है। रहमान साहब एक बार फ़िर अपने फॉर्म में हैं। बाकी गीत, जैसी कि रहमान के संगीत की फ़ितरत है, धीरे-धीरे आप पर तारी होंगे पर एक गीत है जो पहली ही बार सुनने पर ज़हन में अटक जाएगा। ये फ़क़ीराना तबीयत का गीत इतना सादा, और उसके साथ ही इतना विशिष्ट है कि क्या बताऊँ। और इसकी सबसे अच्छी बात है इसे गाने वाली आवाज़ का चुनाव। 

फ़हीम अब्दुल्ला की आवाज़ आपको कश्मीर की घाटियों तक खींच ले जाने में सक्षम है। “सय्यारा” गाकर लोकप्रिय हुए फ़हीम के लिए ये गीत सबसे उपयुक्त है। सययारा एक औसत गीत था जिसे कुछ समय सुनने के बाद भुला दिया जाएगा पर ये गीत अमर है। सय्यारा में उन्हें अरिजित की तरह साउंड करवाया गया था जैसा कि चलन है, हर आवाज़ को अरिजित की आवाज़ बना दिया जाता है, पर ये गीत उनकी आवाज़ की उस क्वालिटी को हाइलाइट करता है जो उनकी अपनी है। आज तो आलम ये है कि आदित्य नारायण, जो अपने पिता की तरह गा सकते हैं, और उन्हें उसी अंदाज़ में संजय लीला भंसाली गवा भी चुके हैं, को भी अरिजित की तरह गवाया जा रहा है। 

बहुत कम ऑर्केस्ट्रा के साथ ये गीत आपके दिल में ऐसे उतरता चला जाता है जैसे मक्खन में गरम छुरी। इरशाद क़ामिल के लफ़्ज़ों पर गौर फरमाइए –

“तेरी कायनात, मेरे खाली हाथ

और तार-तार सपने

गए ज़ख्म जाग मेरे सीने आग

लगे साँस-साँस तपने”

उफ़्फ़, काम लेने वाला हो तो काम करने वाले कमाल कर जाते हैं। इरशाद क़ामिल ने ही सय्यारा में हल्का गीत लिखा है और उन्हीं ने यहाँ दर्द को अनूठी अभिव्यक्ति दी है। 

“तेरी कायनात, मेरे खाली हाथ

और तार-तार सपने

दर्दों से चूर ग़म का गुरूर

कहूँ क्या मैं हाल अपने

आवारा आवारा, आवारा अंगारा

रातों में डूबा, अंबर का बंजारा

जाने टूटा क्यों 

मैं शीशा ना तारा”

एक डफ़ के साथ शुरू हुआ ये गीत उसी डफ़ की संगत में अपना सफ़र पूरा करता है। इसे सुनकर आपको फ़िल्म “साथिया” का गीत “मेंड़ा यार मिला दे साइयाँ” याद आएगा, पर रिदम के अलावा और कोई साम्यता नहीं है दोनों गीतों में। एक ज़माना था जब अलग आवाज़ों को खोजा जाता था, हर गायक की अपनी विशिष्टता को पहचान कर उसके लिए गीत दिये जाते थे, अब न किसी को वो पहचान रही, न जुनून। फ़हीम की आवाज़ में जो लरज़ है वो तलत महमूद की याद दिलाती है। बरसों बाद इस तरह की कोई आवाज़ सुनाई दी है, और इस आवाज़ में दर्द की माकूल अभिव्यक्ति हो सकती है, शायद इसलिए भी ये गीत ख़ास हो जाता है कि इसमें दुख है, एक प्रेमी का दर्द है। एक ही लय में चलते हुए ये गीत जब ख़त्म होता है तो अंतिम पंक्ति बहुत धीमे से गाई गई है जो आप पर स्थायी असर छोड़ जाती हैं।

हो सकता है आपमें से कुछ को गीत पसंद न भी आए, वे कृपया इगनोर करें बाकी लोग अपनी राय ज़रूर लिखें। 

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