एक-एक करके वो सारे लोग जा रहे हैं जो हमारे बचपन के हीरो हुआ करते थे।
हालाँकि बचपन में मैं अमिताभ बच्चन का भक्त था लेकिन धर्मेंद्र की फ़िल्में इसलिए नहीं छोडता था कि उनमें मारधाड़ होने की गारंटी थी। अमिताभ के प्रभाव में उस वक़्त तो किसी और हीरो की श्रेष्ठता को स्वीकारना असंभव था लेकिन वक़्त के साथ जैसे-जैसे समझ बढ़ती गई मुझे ये हीरो बहुत अच्छा लगने लगा। अपनी आधी उम्र तक मैं शोले को अमिताभ की फ़िल्म ही मानता था लेकिन बाद में समझ आया कि वो धर्मेंद्र की फ़िल्म थी। इसी तरह “चुपके-चुपके” भी धर्मेंद्र की ही फ़िल्म थी।
ये एक ऐसा अभिनेता था जो हर तरह के किरदार में अपने आप को बहुत मजबूती से साबित कर चुका था लेकिन कभी राजेश खन्ना या अमिताभ बच्चन की तरह सुपर स्टार नहीं कहलाया। शायद यही वो वजह भी रही हो कि वे हमेशा चलते रहे, उनका वक़्त कभी ख़त्म नहीं हुआ। 1960 से लेकर 2000 के बाद तक प्रासंगिक रहना कोई छोटी बात नहीं है। एक स्कूल हैड मास्टर के बेटे को फिल्मों का जबर्दस्त शौक लगा, इतना कि अपनी पसंदीदा अभिनेत्री सुरैया की फ़िल्म “दिल्लगी” चालीस बार देखी, और हर बार मीलों पैदल चलकर इसे देखने गया। अब फिल्मों के लिए ये जुनून बीती बातें हैं। जब उन्हें हीरो बनने की धुन सवार हुई तो पिता के खौफ़ से इसे ज़ाहिर नहीं कर सकते थे, तब तक शादी भी हो चुकी थी। माँ की सलाह पर उन्होने फ़िल्मफेयर टैलंट हंट में प्रविष्टि भेज दी और नसीब, कि वहाँ वे विजेता हुए, और उसके निर्णायक भी थे बिमल रॉय। मुंबई पहुंचे और एक गैरेज में नौकरी कर ली। मनोज कुमार उनके रूम मेट थे उस दौर में। साथ-साथ एक ड्रिलिंग फ़र्म में भी नौकरी कर ली, नौकरी से उन्हें 200 रुपये महीना पगार मिलती थी, और जब पहली फ़िल्म “दिल भी तेरा हम भी तेरे” मिली तो फीस 51 रुपये मिली थी। इस फ़िल्म के तीन निर्माता थे, तीनों ने अपनी-अपनी जेब से 17-17 रुपये निकाले और धर्मेंद्र को अदा किए। इसके बाद बिमल रॉय की फ़िल्म “बंदिनी” ने उन्हें गंभीर अभिनेताओं की श्रेणी में खड़ा कर दिया। उस दौर में वही ऐसे हीरो थे जो नायिका प्रधान फिल्मों को करने के लिए आसानी से तैयार हो जाते थे। और इसी सरलता ने उन्हें कुछ बहुत अच्छी फ़िल्मों का हिस्सा बनाया।
60 के दशक में बंदिनी से लेकर सत्यकाम तक उन्होंने बेहतरीन गंभीर फ़िल्मों में काम किया। इसी दौरान उनकी नज़दीकियाँ मीना कुमारी से बढ़ीं। मीना कुमारी उनसे बहुत प्रभावित थीं और उन्हें अभिनय के गुर सिखाया करती थीं। वे ख़ुद उन्हें उनके दृश्यों का अभ्यास करवाती थीं, और उनकी कमियों को दूर करने करने में मदद करती थीं। शायद ये भी एक वजह रही कि धर्मेंद्र एक संतुलित अभिनेता रहे, चाहे जो भी किरदार उन्होंने निभाए हों। मीना कुमारी ने उनके करियर को आगे बढ़ाने में भी उनकी बहुत मदद की लेकिन जब दोनों के रोमैन्स के चर्चे फ़ैलने लगे तो धर्मेंद्र ने उनसे दूरी बना ली। नर्गिस ने एक बार लिखा था कि मीना कुमारी अगर किसी को जुनून की हद तक चाहती थीं तो वो धर्मेंद्र थे। और उन्होंने ही ये लिखा था कि जब धर्मेंद्र उनके जीवन से चले गए तो वे धीरे-धीरे मौत की तरफ़ बढ्ने लगीं। कहते हैं कि कमाल अमरोही ने धर्मेंद्र से नाराजगी ताउम्र पाली, इतनी कि रज़िया सुल्तान में उन्होंने धर्मेंद्र को ग़ुलाम के रोल में लेकर उनसे रेगिस्तान में बहुत मेहनत करवाई।
ऋषिकेश मुखर्जी से भी उनके आत्मीय रिश्ते हुए फिल्म “अनुपमा”, “मझली दीदी”, और “सत्यकाम” के दौरान। इस दौर में धर्मेंद्र की इमेज रोमांटिक और गंभीर थी। फ़िल्म “आनंद” की कहानी ऋषिकेश मुखर्जी ने धर्मेंद्र को सुनाई थी और कहा था कि इस पर काम करेंगे। इसके बहुत समय बाद धर्मेंद्र ने जब सुना कि आनंद में राजेश खन्ना को लिया गया है तो उन्होंने एक रात नशे में ऋषिकेश मुखर्जी को फोन किया और पूछा कि आपने राजेश खन्ना को क्यों लिया? ऋषिकेश मुखर्जी ने कहा अभी फोन रखो सुबह बात करेंगे। लेकिन धर्मेंद्र उन्हें रात भर फोन करके बस यही एक सवाला पूछते रहे। उन्हें इस फ़िल्म के न मिलने का बहुत अफ़सोस रहा।
70 के दशक में उनकी वो छवि बनी जो आज तक चल रही है – ही मैन की छवि। हालाँकि फ़िल्म “फूल और पत्थर” में उन्होंने शर्टलेस दृश्य दिया था, और उनकी बॉडी देखकर दर्शक हैरान हुए थे। माचो मैन की छवि तो उनकी बनने लगी थी पर 70 के बाद वे पूरी तरह एक्शन हीरो हो गए। 60 के दशक में जहाँ उनकी पहचान बंदिनी, सत्यकाम, अनुपमा, अनपढ़, आई मिलन की बेला जैसी फ़िल्मों से थी तो 70 के दशक में मेरा गाँव मेरा देश, ललकार, शोले, सीता और गीता, जुगनू जैसी फ़िल्मों से। इसी दशक की शुरुआत में उनकी कई फ़िल्में एक के बाद एक हेमा मालिनी के साथ आईं और यही शायद वजह रही उनकी नज़दीकियों की। इस बीच ऋषिकेश मुखर्जी की चुपके-चुपके में एक बार फ़िर उन्होंने साबित किया कि किरदार कोई भी हो, वे उसे 100% निभा सकते हैं। मैं हैरान होता हूँ उनकी यही एक फ़िल्म देखकर जिसमें उन्होंने जो कॉमिक टाइमिंग दिखाई है वो बेजोड़ है।
ये तो ज़ाहिर तथ्य है कि फ़िल्म जंजीर की कहानी धर्मेंद्र के पास थी, और वे ही उसे करने वाले थे पर ये तथ्य कम लोग जानते हैं कि फिर उन्होंने वो फ़िल्म छोड़ी क्यों? असल में उनकी बहन का प्रकाश मेहरा के साथ कुछ विवाद था और बहन ने उन्हें कसम दी थी कि वे प्रकाश मेहरा के साथ काम नहीं करेंगे। बस उसी कसम के लिए उन्होंने ज़ंजीर छोड़ दी।
80 के दशक में जिस तरह की फ़िल्में बन रही थीं उनमें वे अपने आप ही फ़िट हो जाते थे। 1987 में उनकी कुल 12 फ़िल्में रिलीज़ हुई थीं और उनमें से 8 सुपर हिट थीं जबकि उस समय उनकी उम्र 40 पार थी। ये रिकॉर्ड तो खान तिकड़ी के नाम भी नहीं है। नायिकाओं की कितनी पीढ़ियों के साथ उन्होंने बतौर नायक काम किया ये भी एक मिसाल है, मीना कुमारी, माला सिन्हा, आशा पारेख से शुरू करके सोनम, किमी काटकर तक के हीरो वे रहे।
आपके इस दुनिया से चले जाने पर सुदूर कहीं अजनबी लोग दुखी हो रहे हों तो समझो आपने एक कामयाब ज़िंदगी जी है। आज वाकई बहुत दुख हो रहा है। आज फ़िल्म उद्योग के सबसे खूबसूरत नायकों में से एक चला गया। 60 के दशक में देव आनंद के अलावा अगर को सबसे ज़्यादा खूबसूरत नौजवान था तो वे धर्मेंद्र ही थे। और 60 ही क्यों 70 के दशक में भी वे सबसे हसीन आदमी थे।
आधी सदी तक लोगों के दिलों पर राज करने वाले धरम पाजी को हार्दिक हार्दिक श्रद्धांजलि!
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