दूरदर्शन पर जब "फौजी" प्रसारित हुआ तब लगभग 10 साल की उम्र होगी मेरी। मैं शाहरुख खान का दीवाना हो गया था। "buddy" और "champ" favorite शब्द हो गए थे। उसके बाद "सर्कस" में शाहरुख की एंट्री का इंतज़ार रहता था। जब शाहरुख सर्कस बेचने की बातें कर रहे थे तो एक तरफ़ तो मैं दुखी था, उसे बिकने नहीं देना चाहता था और दूसरी तरफ़ शाहरुख प्रेम उनके पक्ष में झुका रहा था। फिर एक और धारावाहिक आया "दूसरा केवल" जो देर रात आता था इसलिए कभी देख नहीं पाया और इस बात का भयंकर दुख रहा मुझे।
फिर जब पहली बार "चित्रहार" में फ़िल्म "दीवाना" का गीत "कोई न कोई चाहिए" आया तो मैं पागल ही हो गया, मेरी खुशी छलकी पड़ रही थी, इतनी कि आसपास बैठे लोगों के भी मुंह से निकल गया "इसको तो देखो कितना खुश हो रहा है"। मेरा दावा है अपनी पहली फ़िल्म की इतनी खुशी ख़ुद शाहरुख को भी नहीं हुई होगी। उसके बाद जिस फ़िल्म में शाहरुख हो वो सिर्फ इसी वजह से अच्छी हो जाती थी। लोग उन्हें ओवर एक्टर कहते थे तो बिलकुल वैसे ही react करता था जैसे आजकल भगत लोग करते हैं। उनमें बहुत ऊर्जा थी ये बात सही है और शुरुआती दौर में उनके काम में वो ऊर्जा झलकती भी थी। मुझे चमत्कार भी बहुत अच्छी लगी थी, यहाँ तक कि "राम जाने" के लिए भी लोगों से लड़ गया था। "कभी हां कभी ना" आज भी मेरी फेवरेट है। "डीडीएलजे" इंदौर के सपना-संगीता टॉकीज में 6 बार देखी थी मैंने। फ़िर शाहरुख के इश्क़ में ही "दिल तो पागल है", "कुछ कुछ होता है" सबको समान भाव से ग्रहण किया।
पर अब उम्र और फिल्मों की समझ दोनों बढ़ रही थी। अब अंदर कहीं वो ओवर एक्टिंग, हर किरदार में वही एक "राहुल" थोड़ा सा खटकने तो लगा था। सुनील से राहुल का ये ट्रांसफॉर्मेशन एक कलाकार की मौत साबित हुई। शाहरुख ने "यस बॉस" और "फ़िर भी दिल है हिंदुस्तानी" जैसी फिल्मों में कुछ अलग करने की भी कोशिश की लेकिन फ़िर वे ख़ुद अपनी इमेज में क़ैद हो गए। अब उन्हें स्क्रीन पर देखना मोनोटोनस हो गया था। उनके हर किरदार का अति आत्मविश्वास कोफ़्त पैदा करने लगा। उनके लिए सीन ही ऐसे लिखे जाने लगे कि वो लड़का सब कुछ कर सकता है, बच्ची, बूढ़ी, जवान सब महिलाएं उस पर फिदा हैं। याने उनकी फ़िल्म में कैरक्टर नहीं होता था, सिर्फ राहुल होता था। जब मैंने "कल हो न हो" देखी तो ये जबरन का घर घुस्सू आदमी चिढ़ ही पैदा करने लगा। शाहरुख के अंदर अपार संभावनाएं थीं, उनकी ऊर्जा उनसे क्या नहीं करवा सकती थी लेकिन सिर्फ चोपड़ा और जौहर तक सिमट कर उन्होने अपने, और अपने चाहने वालों के साथ छल किया।
इन फ़िल्मों के एंटि डॉट की तरह कुछ लोग तुरंत "स्वदेस" और "चक दे इंडिया" का उदाहरण परोस देते हैं जो मात्र दो ऐसी फ़िल्में हैं जो शाहरुख ने अपनी इमेज से अलग की हैं और एक बार उन्होंने ख़ुद कहा था कि ये फ़िल्में मजबूरी में की थीं, उनकी पसंद ये नहीं थीं।
मैंने "कल हो न हो" के बाद से शाहरुख की फिल्में देखना बंद कर दिया। और सच कहें तो उसके बाद उनकी कोई भी फ़िल्म देखने लायक आई भी नहीं। एक "पहेली" मुझे ठीक लगी थी। "अशोका" मैं अपने कॉलेज के दोस्तों को दिखाने जबर्दस्ती ले गया था और टॉकीज से निकल कर सभी ने मुझे ऊपर उठा कर लातों से धन्यवाद ज्ञापित किया था। अगर सम्राट अशोक की आत्मा वो फ़िल्म देख लेती तो एक और कलिंग हो जाता।
फ़ैन तो फ़ैन हैं, वे मानेंगे नहीं लेकिन सच ये है कि सफलता मिलने के बाद शाहरुख विधुद्ध रूप से व्यवसायी हो गए, उन्हें आपके सिनेमा के भले-बुरे से कोई लेना-देना नहीं है, उन्हें जहां मुनाफ़ा दिखता है वे वही करते हैं। 2010 से 20 तक का उनका समय बहुत ही खराब रहा और जब लग रहा था कि अब उनकी पारी ख़त्म है तभी मूर्ख boycott gang ने पठान जैसी बिलकुल रद्दी फ़िल्म ब्लॉक बस्टर करवा दी। उनके डूबते सितारे और कचरा फिल्मों को एक बार फ़िर संजीवनी मिल गई। एक बार फ़िर अच्छी फिल्मों के पैरोकार get out हो गए । ये वो दौर था जिसमें बड़ी फिल्मों के पिट जाने से लोग सोचने पर मजबूर हो रहे थे कि अच्छा कंटैंट लाया जाये पर पठान, गदर, जवान ने एक बार फ़िर इन संभावनाओं पर पानी फेर दिया।
शाहरुख बोलते बहुत अच्छा हैं। एक बार उनहोने नए फ़िल्म लेखकों पर तंज़ कसा था कि आप लोग अच्छा लिखते ही नहीं हैं। आप लोग अच्छा लिख कर आइये तो हम बनाएँगे। पर समय गवाह है, उनकी फिल्में लेखन के पैमाने पर हमेशा वाहियात ही रही हैं। जबकि मुंबई में अच्छे लेखक दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं और फरहाद सामी उन्हीं के साथ बैठ कर पार्टियां करते हैं।
खैर, ये पोस्ट आ बैल मुझे मार वाली है। तो आओ मेरे प्यारे बैलों...
by the way Many happy returns of the day SRK. hope to see the same energy level I witnessed in my childhood.
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