जेम्स केमरून हॉलीवुड के संजय लीला भंसाली हैं।
जिस तरह भंसाली अपनी फ़िल्म के visuals के साथ ओब्सेस्ड रहते हैं वैसे ही केमरून भी हैं। और बेशक दोनों को ही अपने-अपने विज़न के अनुसार दृश्य को खूबसूरत बनाने में महारत हासिल है। एक-एक फ्रेम दर्शनीय होती है, लेकिन कहानी? विजुअल्स के साथ ये जुनून ख़ब्त तक चला जाता है और इस चक्कर में कहानी को कम प्यार मिलता है, अंततः वो कुपोषित रह जाती है। दोनों को ही भव्य और लंबी फ़िल्में बनाने का ख़ब्त है।
अवतार – 3 मैंने देखी, देखी क्या, बच्चों को दिखाने ले गया था। मुझसे अवतार -2 तो देखी नहीं गई थी। अवतार का पहला भाग जब आया था तब मैं पुणे में था, पहली बार परदे पर वो भव्यता देखी थी, और उसी में मुग्ध हो गया था। दो बार देखी थी तब मैंने वो फ़िल्म। उस वक़्त ऐसा कुछ रचा भी नहीं जाता था, हॉलीवुड में भी। कान्सैप्ट के लेवल पर भी वो फ़िल्म बहुत आगे थी। लेकिन अब जब हम लोग बहुत कुछ देख चुके हैं, उम्र भी काफी आगे बढ़ गई है, बाल पकने लगे हैं तो उतने पर संतुष्टि नहीं होती। परदे पर लाख उछल-कूद दिखा लो पर जब तक कहानी चमड़ी को भेद कर दिल तक नहीं पहुँचती मज़ा नहीं आता। अवतार -3 visually एक मास्टर पीस है इसमें कोई दो राय नहीं। केमरून जिस तरह डूबकर एक नया संसार रचते हैं वो काबिले-तारीफ़ है। इस जुनून में वे ईश्वर ही बन जाने पर उतारू हो जाते हैं। सोचिए एक नई भाषा बना देना, नए जीव-जन्तु, पेड़-पौधे, इंसान, पूरी नई दुनिया जिसके नियम यहाँ से अलग हैं, बहुत ही ऊँचे स्तर की रचनात्मकता की दरकार रखता है, और केमरून एक अद्भुत, अद्वितीय दुनिया रचने में क़ामयाब भी हैं। पर उस दुनिया के आसपास जो कहानी उन्होंने बुनी है उसमें वो नयापन नहीं है। बहुत से cliches हैं। किरदार मुसीबतों में फँसते हैं, और वहाँ से निकलते हैं, बहुत कुछ predictable है। उस पर उन्हें साढ़े तीन घंटे की फ़िल्म बनानी होती है, जिसके लिए कई फ़िलर्स लिखने पड़ते हैं जो गति को इतना धीमा कर देते हैं कि नींद आने लगती है। फ़िल्म का पहला आधा हिस्सा इतना रेंग-रेंग कर आगे बढ़ता है कि आप सोचने लगते हैं कि इनटर्वल क्यों नहीं हो रहा है? बहुत से दृश्य ऐसे हैं जो न भी होते तो कोई फर्क नहीं पड़ता, बस उन्हें झेलना ही था। दिल को छू लेने के लिए दो दृश्य भी पर्याप्त हैं अगर वो उस तरह से लिखे गए हैं, वरना आप 15 भावुक दृश्य भी डाल दें तो उबासी के अलावा कुछ पैदा नहीं कर पाएंगे।
फ़िल्म दूसरे हाफ़ में गति पकड़ती है पर जिस तरह हमारी फ़िल्मों के लंबे-लंबे कार चेज़ दृश्य होते हैं, वैसे कई दृश्य हैं। 3-डी में परदे पर रंगों की जादूगरी देखना हालाँकि अच्छा लगता है। दूसरे हाफ़ में फिर भी मन लगा रहा पर पहले हाफ़ में मैं बोर हो गया था। बच्चों को तो मज़ा ही आया क्योंकि उनके लिए वो सचमुच एक अलग दुनिया है, और कहानियाँ अभी उन्होंने उतनी नहीं देखी हैं कि cliché बोर करने लगे।
पृथ्वी से जो व्यापारी आया है वो अब तक इनके पीछे पड़ा हुआ है, उसके पास जाने कितना पैसा है कि 3 फ़िल्मों में सब बर्बाद होने के बाद भी वो लगा हुआ है। इस बार उसे उसी ग्रह के एक लुटेरे कबीले का साथ भी मिल जाता है। ऐसे कबीले हर जगह होते हैं जो अपने ही ग्रह को बरबाद कर देते हैं, किसी अच्छे और महान इंसान से जलन के चक्कर में।
मैंने हिन्दी वर्शन देखा और डबिंग में जाने क्यों जैक को सब जेक बुलाते हैं, ऐसा लगता हैं जैसे सब गुजराती हों। बाकी फिल्म के अद्भुत संसार के लिए तो देखना बनता है लेकिन सिर्फ़ जेब इजाज़त दे तो वरना न देखने में भी कोई नुकसान नहीं है।
और हाँ, इस बार तो गोविंदा को जेम्स की प्रार्थना सुन लेनी चाहिए थी। अगर वे जेक बन जाते तो कुछ कॉमेडी ही हो जाती, दूसरे ग्रह का प्राणी कितना अच्छा लगता बोलते हुए - "खा खुजा बत्ती बुझा"। पर अफ़सोस, अब भी केमरून गोविंदा के लेवल को नहीं छू पाये हैं।
फ़िल्म के बीच में साहबज़ादे को भूख लग आई और मुझे पॉप्कॉर्न खरीदने पड़े। आम तौर पर theaters में पीने के पानी की व्यवस्था होती है लेकिन उस थिएटर के मालिक को ग्राहक को हर एंगल से लूटना था लिहाजा पानी भी खरीदना ही पड़ेगा। 20 रु की बॉटल 45 रु में लेकर मैंने भारत माता की जय का तीन बार उच्चारण किया। टिकिट की कीमत थी 330 रु, वो भी दोपहर 12.35 के शो में। रात के शो का अब आप अंदाज़ा लगा सकते हैं। मुझे बच्चों को फ़िल्म दिखाना कुल 1350 रु का पड़ा। अब बॉलीवुड वाले रोते हैं कि लोग फ़िल्म देखने नहीं आते। अबे, तुम उनकी जायदाद लूटने बैठे हो एक फ़िल्म दिखाकर तो कोई क्यूँ आएगा? मैं ख़ुद फ़िल्मकार होकर ये कहता हूँ कि टेलीग्राम से download करो या ओटीटी का इंतज़ार करो। इन लुटेरों की जेब भरने का कोई मतलब नहीं है। वैसे भी सिनेमा रोटी, कपड़ा, और मकान के बाद आता है, पहले तीन के ही वान्दे हो तो किसी फ़िल्मकार की विचित्र फैंटासी को पूरा करने का ठेका इस गरीब देश के गरीबों का नहीं है। ले जाओ सिनेमा भी सेठों के घरों में।
एक और समस्या पर मैं ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूँ, 3डी चश्में में चश्मिश लोगों को बड़ी दिक्कत आती है, अपना चश्मा निकाल कर देखो तो आँखें दुखने लगती हैं, और चश्मे के ऊपर चश्मा चढ़ाकर देखना बड़ा असुविधा जनक लगता है, विशेष तौर पर जब दूर-पास दोनों का चश्मा हो तो।
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