शोले री रिलीज़ - मसाला फ़िल्मों की गाइड

 


मेरी याददाश्त समय में पीछे जहाँ तक जाती है - लगभग चार साल की उम्र तक; मैं तब से ही फ़िल्मों का दीवाना रहा हूँ, और तभी से अमिताभ बच्चन का मुरीद। 

बात “शोले” की हो रही है, और अगर मुझसे पूछा जाये कि मैंने पहली बार इसे कहाँ और कब देखा था तो शायद मैं न बता पाऊँ, क्योंकि इतनी बार मैंने ये फ़िल्म देखी है कि सब गड्ड-मड्ड हो गया है। जब मैं बहुत छोटा था तब हमारे गाँव में एक टूरिंग टॉकीज हुआ करता था, हो सकता है वहाँ देखी हो, या हो सकता है अपने ननिहाल में वीसीआर पर देखी हो। जी हाँ, वीसीआर के उस युग में मेरे लिए मामा के घर का सबसे बड़ा आकर्षण वहाँ का वीसीआर और एक अलमारी में पूरी भरी हुई विडियो कैसेट्स थीं। वहाँ पर मैंने एक से अधिक बार शोले देखी। कुल मिलाकर कितनी बार देखी होगी अब तो ये गिनती भी मुश्किल है। 

ऐसी कितनी फ़िल्में बनी हैं जिन्हें जितनी बार भी देखें कभी ऊब महसूस नहीं होती? मैंने हर बार इसे अपलक देखा है। वीसीआर पर कई मर्तबा देख लेने के बाद मुझे याद है 1996 में पंद्रह अगस्त के दिन ये फ़िल्म दूरदर्शन पर दिखाई गई थी। उस वक़्त मैं पढ़ाई के लिए शहर में एक कमरा लेकर रहा करता था। जब से पता चला था मन में गज़ब का उत्साह और इंतज़ार था, एक बार फ़िर अपनी पसंदीदा फ़िल्म देखने का। मुझे याद है वो रविवार का दिन था और वो इतना बड़ा इवैंट हो गया था कि दूरदर्शन को बहुत से प्रायोजक मिले, और तीन घंटे की फ़िल्म लगभग सात घंटे में ख़त्म हुई। हम भी पूरे ढीठ थे, पूरी देखकर ही माने। फ़िर जब सीडी का दौर आया, तब हमारे पास एक अदद कंप्यूटर हुआ करता था जिसका पूरा उपयोग फ़िल्में देखने और संगीत सुनने में ही होता था। इंदौर में सिंधी कॉलोनी पायरेटेड सीडी का गढ़ था, वहाँ कईं दुकानें थीं जो सीडी किराये पर देती थी। हमने वहाँ से भी सीडी किराए पर लाकर फ़िर शोले देखी है। बदलते दौर के हर बदलते माध्यम में हमने शोले ज़रूर देखी है। इंटरनेट और यूट्यूब के आने के बाद तो किसी फ़िल्म को देखना उतना मुश्किल नहीं रह गया, लिहाज़ा जब कुछ न हो तो कई बार थोड़ी-थोड़ी करके देखते ही रहे हैं। 

शोले जैसी फ़िल्में बस बन जाती हैं, इन्हें बनाया नहीं जा सकता। इसके निर्देशक रमेश सिप्पी ने भी कोशिश की थी फ़िर एक बार वैसा ही कुछ बनाने की, और उसे नाम दिया था “शान”। फ़िल्म चली नहीं ये तो अलहदा एक मामला है, पर वैसी बनी भी नहीं कि उसे कईं-कईं बार देखा जा सके। ऐसी कोई चीज़ बनाने के लिए बनाने वाले के अंदर एक आग चाहिए, जो उस वक़्त रमेश सिप्पी के अंदर थी, अमिताभ बच्चन के अंदर भी थी क्योंकि उन्हें अपने आप को साबित करना था।

शोले को सिर्फ़ मसाला फ़िल्म कहकर ख़ारिज़ कर देना संभव नहीं, ये मसाला फ़िल्मों का वो उदाहरण है जिससे ये सीखा जा सकता है कि किस अनुपात में, और कितना मसाला फ़िल्मों में उपयोग किया जाना चाहिए। क्या नहीं है इस फ़िल्म में? आतंक है, हास्य है, प्रेम है, वो भी दो अलग तरह का प्रेम। एक तरफ़ धर्मेंद्र और हेमा का वाचाल प्रेम है, तो दूसरी तरफ़ अमिताभ-जया का खामोश, गहरा प्रेम जो सिर्फ़ आँखों से, और दृश्यों से अभिव्यक्त होता है। हास्य के भी विभिन्न अंग हैं, जो कहीं भी फ़िल्म का केंद्र जो आतंक है, उसे हल्का नहीं होने देता बल्कि उससे थोड़ी सी राहत दिला जाता है। 

लब्बोलुआब ये है कि शोले वाकई एक महान फ़िल्म है, और हिन्दी सिनेमा की अनमोल धरोहर है। 

एक बार फिर "शोले" बड़े परदे पर आ रही है, और असली अंत के साथ जिसे उस वक़्त बदल दिया गया था हिंसक होने की वजह से। अब तो हिंसा रोज़मर्रा की बात हो गई है और इतनी कि शोले की वो हिंसा बच्चों का खेल ही लगेगी। मैं तो जाऊँगा फिर से देखने।

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