“खलनायक वही जो दर्शकों के मन को बरसों-बरस डराए!”
आज जबकि फ़िल्म का हीरो भी गंदा, चीकट हो गया है, एक ज़माना था जब खलनायक भी नफ़ासत से भरपूर था। उसका रहन-सहन देख कर रश्क़ हो, और उसी रहन-सहन से निकली भाव-भंगिमा खौफ़ पैदा करे।
ऐसे ही अभिनेता "कृष्ण निरंजन सिंह" उर्फ "के एन सिंह" हिन्दी फिल्मों के सबसे खतरनाक और सबसे पहले खलनायकों में से एक हैं।
उनका व्यक्तित्व पर्दे पर भी, और असल ज़िंदगी में भी बेहद प्रभावशाली था, इतना कि अगर वो फ़िल्म में हैं तो कोई भी एक्टर सेट पर देरी से नहीं आता था। उनके करियर के अंतिम वर्षों में तो सिर्फ इसी एक चीज़ के लिए उन्हें फ़िल्म में लिया जाता था।
के एन सिंह एक राजपरिवार से आते हैं। उनके पिता एक नामी वकील थे, और वे ख़ुद भी वकील बनना चाहते थे पर एक बार उनके पिता ने एक ऐसे व्यक्ति को बरी करवा दिया जो वाकई मुजरिम था। ये देखकर के एन सिंह को इस पेशे से वितृष्णा हो गई और उन्होने वकील बनने का विचार त्याग दिया। वे एक खिलाड़ी थे और जेवेलीन थ्रो के चैम्पियन थे। उन्हें 1936 के बर्लिन ओलिम्पिक के लिए चुन लिया गया था पर उनकी बहन की बीमारी की वजह से उन्हें ओलिम्पिक छोड़ कलकत्ता जाना पड़ा। वहाँ उनकी मुलाक़ात पृथ्वीराज कपूर से हुई जो उनके पारिवारिक मित्र थे। पृथ्वीराज कपूर ने उन्हें निर्देशक देवकी बोस से मिलवाया जिन्होंने उन्हें अपनी फ़िल्म “सुनहरा संसार (1936)” में एक किरदार ऑफर कर दिया। इसके बाद दो साल तक धीमे-धीमे काम चलता रहा, 1938 में आई फ़िल्म “बागबान” की सफलता ने उन्हें स्थापित कर दिया। इस फ़िल्म में उन्होंने मुख्य खलनायक का किरदार निभाया था। बागबान गोल्डेन जुबिली हुई और सिंह बड़े खलनायक हो गए। एक वक़्त था जब वे इंडस्ट्री के सबसे महँगे खलनायक थे।
इसके बाद वे 1950 के दशक के बीच तक शीर्ष पर रहे, फिर उनसे उनका ताज "प्राण" ने ले लिया। वे एक कुलीन खलनायक थे जिनकी पहचान थी उच्च स्तरीय वेषभूषा – सूट, ओवेरकोट, हैट और सिगरेट या सिगार। उन्होने फिल्मों में खलनायक की पारंपरिक धारणा को ध्वस्त किया। देखने में एक सभ्य, सुसंस्कृत आदमी पर आँखों और मुस्कान में कुटिलता लिए, वे कभी लाउड नहीं होते थे। उनका स्क्रीन प्रेजेंस इतना दमदार था कि उन्हें अपने आपको बुरा दिखाने के लिए गालियों या ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने या अजीब कपड़े पहनने की ज़रूरत नहीं थी। उनकी एक नज़र काफी थी सबको जमा देने के लिए।
उनका ये रौबदार व्यक्तित्व सिर्फ पर्दे तक ही सीमित नहीं था बल्कि असल ज़िंदगी में भी वे अपनी शर्तों पर ही काम करते थे। अपने किरदार के shades वे खुद तय करते थे, वे ही तय करते थे कि ये किरदार कितना कमीना होगा, कैसे हाव-भाव होंगे वगैरह। उनसे कभी कोई बदतमीजी से बात नहीं कर सकता था।
उन्होंने ख़ुद एक घटना का ज़िक्र किया था कि एक बार उन्हें किसी के घर कोई लिफ़ाफ़ा पहुंचाना था। वे वहाँ पहुंचे और उन्होंने घंटी बजाई। एक औरत ने दरवाज़ा खोला और जैसे ही उन्हें देखा वो बहुत ज़ोर से चीख़ी और दरवाज़ा खुला ही छोड़ कर अंदर भाग गई।
मज़े की बात ये है कि सिंह ने कभी अभिनय की कोई ट्रेनिंग नहीं ली। उनके बाद प्राण भी बेशक़ उनसे प्रभावित रहे होंगे, क्योंकि प्राण के किरदार भी अक्सर सफेदपोश, नफ़ीस हुआ करते थे।
के एन सिंह जीवन के अंतिम दिनों में अंधे हो गए थे और अपने ही घर में गिर जाने की वजह से बिस्तर पर ही रहे। 31 जनवरी 2000 को उनका निधन हुआ।
उनकी कुछ यादगार फिल्में – आवारा, बाज़ी, बरसात, जाल, तीसरी मंज़िल और हावड़ा ब्रिज हैं।
हमारी पीढ़ी शायद आखिरी होगी जिसने अपने बचपन में दूरदर्शन पर उन फिल्मों को देखा है और के एन सिंह को अच्छी तरह से पहचानते हैं। उनकी आखिरी फिल्में कालिया और अजूबा थी।
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