लंदन में रहने वाले एक अमीर आदमी ने बोरियत से बोर होकर एक शाम पहले गाँजा पिया, फिर अफीम चाट ली, टाइम कट ही नहीं रहा था तो शराब भी पी ली और उसके साथ एक पैकेट सिगरैट भी।
अचानक उसके अंदर अकीरों कुरुसावा की आत्मा घुस गई, उसने लैपटाप उठाया और लिख मारी एक फ़िल्म की स्क्रिप्ट। अब फ़िल्म के लिए दर-दर भटकना तो हम जैसे चिंदी-चोरों का काम है, वो तो रहता ही लंदन में है, पैसा खूब है तो बंदे ने पिनक में ठान लिया तो ठान लिया कि अब भारतीय सिनेमा को उसकी जहालत से बाहर निकालना है मतलब निकालना है।
इन्हीं गाँजा, अफीम, दारू, सिगरैट, भांग के औरा में उसने कलाकार भी साइन कर लिए और फ़िल्म बना भी डाली।
और हम इसे देखकर अब तक सन्न बैठे हैं, कि साला था क्या ये? और क्यों था?
एक बात तो भूल ही गया, इस बंदे ने जो भी बनाया उसे बनाने के बाद डिसाइड किया कि ये कॉमेडी है। और कई दर्शकों ने उसके genre की जगह कॉमेडी लिखा देखकर मान लिया कि कॉमेडी है।
एक तो राधिका आप्टे मुझे वैसे ही नापसंद है, वो इतने मुँह बनाती है और गले की मांसपेशियों को इतना खींचती है कि मेरी मांसपेशियाँ दुख जाती हैं उसे देखकर। इस फ़िल्म में उसे जितना गंदा दिखाया जा सकता था दिखा दिया गया है। अगर राधिका आप्टे इस विचार को दिमाग से बाहर फेंक कर फ़िल्म देखे, कि उन लोगों ने कोई महान सिनेमा रच दिया है, तो उसे अपने आप से नफरत होने के पूरे चान्स हैं। फ़िल्म की कहानी (अगर इसे कहानी कह सकते हैं तो), ये है कि गोपाल और उमा की अरेंज मैरेज होती है जिसमें उमा संतुष्ट नहीं है, किसी भी तरह से और फिर...अरे क्या फिर, फिर आप अपने बाल नोचते हैं और क्या। गांजे की पिनक में निर्देशक के जो मन में आया वो करता गया। किसी चीज़ का कोई सिर-पैर नहीं। जो भी हो रहा है वो क्यों हो रहा है, उसे खुद पता नहीं होगा, बस अफीम ने उसके दिमाग में एक दुनिया रच दी, और उसने वही दुनिया हमें दिखा दी। जैसे आप सपना देखते हैं ना, कि चलते चलते बकरी बन गए, फिर बकरी का आपने खून भी पी लिया, मतलब तमाम तरह की नॉनसैन्स जिन पर सुबह उठकर आप हँसते भी हैं। इस आदमी ने वो सब इकट्ठा करके फ़िल्म बना दी।
और कमाल की बात ये है कि इसे विदेशियों ने भी पुरस्कार दे दिये, जबकि इसमें इतने सारे लूप होल्स हैं कि अवार्ड तो क्या ये सोचने लायक भी नहीं है। कुछ उदाहरण देता हूँ –
सबसे बड़ा उदाहरण ये कि उमा एक छोटी सी चाय की दुकान पर बैठी चाय पी रही है। दुकान का मालिक, एक बेहद आम आदमी जिसे हिन्दी भी ठीक से न आती हो, दुकान में रखी छोटी सी टीवी में क्या देख रहा है? अकीरा कुरुसावा की जापानी फ़िल्म। कोई सेंस है इस बात का?
और इसे देखकर विदेशी लोगों में गलत संदेश जाएगा कि नहीं? कि यहाँ चाय की टपरी वाला भी कुरुसावा की फ़िल्में देखता है, जबकि वो बेचारा तो मिथुन के रिटायरमेंट के सदमे से अब तक नहीं उबर पाया है, और उसी ग़म को गलत करने साउथ की मैली-कुचैली फ़िल्में देख कर आहें भरता रहता है।
फ़िल्म के पात्र जिस तरह की भाषा बोल रहे हैं वो बिलकुल मेल नहीं खाता उस सोसाइटी से जिसका वो हिस्सा हैं। न भाषा पर काम किया, न authenticity पर, तो क्या विदेशियों ने गरीब-गुरबे देखकर ही इनाम दे दिये?
राधिका आप्टे ने एक न्यूड सीन भी दिया है इसमें (मुझे मालूम है इतनी बुराई करने के बाद भी अब तुम लोग एक बार ज़रूर देखोगे :D, पर वैसा कुछ नहीं मिलेगा)। अशोक पाठक की किस्मत अब जाग चुकी है। इस फ़िल्म का नाम सिस्टर मिडनाइट क्यों रखा, ये भी आप अगर गाँजा, भांग के असर में सोचें तो शायद आपको कुछ समझ आए।
मैं तो सिर्फ इस चक्कर में पूरी देख गया कि कहीं से तो कोई सेंस बनना शुरू होगा, पर उस इंतज़ार में पिक्चर ही खतम हो गई और मैं वैसा ही रह गया। कुछ देर तक मेरे कानों में सन्नाटे बजते रहे, और राधिका आप्टे से पहले से ज़्यादा चिढ़ हो गई।
नए साल का पहला ही दिन ख़राब कर लिया, जाने आगे क्या होगा।
आप को देखना है तो अपनी रिस्क पर देखो।
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