“है सितारे कहाँ इतने आकाश में
हर किसी को अगर इक सितारा मिले
कश्तियों के लिए ये भँवर भी तो हैं
क्या ज़रूरी है सबको किनारा मिले
बस यही सोच के हम बड़े चैन से
डूब जाने लगे थे मगर रो पड़े”
ये पंक्तियाँ जब मैं लिख रहा हूँ तब भी मुझे सिहरन हो रही है। पता नहीं ये सिर्फ़ मेरे ही साथ है या और कोई भी इस गीत से इतना ही सिहर जाता है। शायद मेरी सिहरन की वजह है बहुत पुरानी एक घटना, जब इश्क़ में दिल टूटा था, और बड़े दर्दनाक तरीके से टूटा था। ऐसे में इंसान जल बिन मछली की तरह हो जाता है, वो इतना बेचैन होता है कि कहीं, किसी सहारे से टिक जाना चाहता है पर कोई सहारा नहीं होता। बेबसी के आलम में अक्सर सहारा बनता है कोई गीत। मेरा सहारा ये गीत बना था। ये बेहद उदास गीत है, आनंद बक्शी साहब ने सारे जहाँ का दर्द इसमें उंडेल दिया है। घोर निराशा के पलों में इंसान की जो मनोदशा होती है, ठीक वही इस गीत की मनोदशा है।
और मज़े की बात देखिये, जब इंसान इस अवस्था में होता है तो वो ख़ुशी के गीत नहीं सुन सकता, उसे राहत ऐसा ही कोई दिल को चीर देने वाला गीत पहुँचाता है। ये ऐसे है जैसे फिल्मों में अक्सर हमने देखा है कि हीरो को जब गोली लगती है तो वो गरम चाकू से अपना माँस भेद कर उसे बाहर निकालता है। ये गीत वही गरम चाकू होते हैं, जो मक्खन में छुरी की तरह दिल के आरपार चले जाते हैं, और आपको एक अजीब सी ठंडक मिलती है, आँसू गिरते हैं जैसे दर्द पिघल कर आँखों से बाहर निकल रहा हो। आप बार-बार वही-वही गीत सुनते हैं, बार-बार उस दर्द को महसूस करना चाहते हैं। उस दर्द में रस आने लगता है।
ये वही गीत है जिसे मैंने बार-बार सुना है, लगातार सुना है उस ज़माने में। लेकिन उस दौर के गुज़र जाने के बाद नहीं सुना, क्योंकि मेरा वो दर्द इस गीत के अंदर बंद है। अब अगर इसे बार-बार सुना तो वो इस गीत में से रिस कर ख़त्म हो जाएगा। आज भी गाहे-बगाहे इसे सुन लेता हूँ तो वो दौर ताज़ा हो जाता है।
आनंद बक्शी साहब ने लिखा तो मारक है, उस पर लक्ष्मी-प्यारे ने जो धुन बाँधी है और लता जी ने जो दर्द भरा है वो अद्भुत है।
“आज दिल पे कोई ज़ोर चलता नहीं
मुस्कुराने लगे थे मगर रो पड़े
रोज़ ही की तरहा आज भी दर्द को
हम छुपाने लगे थे मगर रो पड़े”
बेबसी को ऐसे लफ़्ज़ दे देना एक अच्छे कवि के ही बस की बात है, और आनंद बक्शी साहब ये साबित करते हैं कि वे इस तरह की कविता में भी सिद्ध हस्त हैं। ये उस दिल की हालत है जो अपना दर्द दुनिया को दिखाना नहीं चाहता, एक झूठी मुस्कुराहट से अपने आप को छुपाए रहता है, पर अब और दर्द बर्दाश्त नहीं कर पा रहा और यकायक छलक पड़ा है।
“और अब क्या कहें क्या हुआ है हमें
तुम तो हो बेख़बर हम भी अंजान हैं
बस यही जान लो तो बहुत हो गया
हम भी रखते हैं दिल हम भी इंसान हैं
मुसकुराते हुए हम बहाना कोई फिर बनाने लगे थे मगर रो पड़े”
ये उस दौर के प्रेम की दास्तान है जब प्रेम platonic हुआ करता था। उस प्रेम को सिर्फ़ दर्द से जोड़कर लोगों ने बदनाम किया लेकिन उस दर्द का भी कोई जोड़ नहीं। दुनिया का और कोई दुख मज़ा नहीं देता, यही इकलौता दुख है जो अजीब तरह का मज़ा देता है।
“उम्र भर काश हम यूँ ही रोते रहें
आज क्यूंके हमें ये हुई है ख़बर
मुस्कुराहट की तो कोई कीमत नहीं
आँसुओं से हुई है हमारी कदर
बादलों की तरहा हम तो बरसे बिना
लौट जाने लगे थे मगर रो पड़े”
लाखों दुआएं आनंद बक्शी, लक्ष्मी-प्यारे और लता जी को इस नायाब गीत के लिए। इसे पूरा लिखना मुझे एक बार फ़िर सिहरन दे गया। बेबसी और निराशा को जो लफ़्ज़ इस गीत में दिये गए हैं, उसकी बहुत कम मिसालें मिलेंगी, हालाँकि इसका ज़िक्र मैंने बहुत कम देखा है किसी भी चर्चा में, जाने क्यों?
ये फ़िल्म “मिलन (1967)” का गीत है जिसे नूतन पर फ़िल्माया गया था।
#मेरी_पसंद – 4
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