6 जनवरी उस्ताद ए आर रहमान साहब का जन्मदिन होता है, इस अवसर पर प्रस्तुत है मेरी आने वाली किताब से एक अंश -
"90 के दशक में रहमान ने जो काम किया था उसने न सिर्फ़ दक्षिण के, बल्कि पहले बॉलीवुड के, और फ़िर पूरी दुनिया के बड़े-बड़े फ़िल्मकारों का ध्यान आकर्षित किया। न सिर्फ़ मुख्य धारा के व्यावसायिक सिनेमा बल्कि समानान्तर फ़िल्मों का सबसे बड़ा नाम, श्याम बेनेगल ने भी अपनी फ़िल्म के लिए उन्हें चुना। पहले ज़ुबैदा और फ़िर 2005 में “बोस द फॉरगॉटन हीरो” के लिए एक बार फ़िर उन्होंने रहमान की तरफ़ ही देखा। जबकि इससे पहले उनकी हर फ़िल्म में “वनराज भाटिया” का संगीत हुआ करता था। केतन मेहता की “मंगल पाण्डे”, दीपा मेहता की “वॉटर”, जग मूंदड़ा की “प्रोवोक्ड” ये सब समानान्तर फ़िल्मों के बड़े नाम थे। इससे पहले गोविंद निहलानी उन्हें “तक्षक” में ले चुके थे। राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने जब अपनी अगली फ़िल्म “रंग दे बसंती” की योजना बनाई तो उन्हें रहमान के अलावा और कोई नहीं सूझा, इसके बाद अगली फ़िल्म “दिल्ली 6” में एक बार फ़िर उनके साथ काम किया। दरअसल “रंग दे बसंती” राकेश मेहरा की महत्वाकांक्षी फ़िल्म थी, जिसकी योजना वे कई बरसों से बना रहे थे। जब उनकी पहली फ़िल्म “अक्स” रिलीज़ हुई, जो रहमान को बहुत पसंद आई थी, तभी उनकी बात रहमान से हो गई थी और रंग दे बसंती का कान्सैप्ट उन्होंने रहमान को सुना दिया था। उसे सुनकर रहमान ने उसी समय क्लाइमैक्स के लिए एक धुन भी बनाकर उन्हें भेजी थी। इसके बाद पाँच-छह साल गुज़र गए और आख़िर जब “रंग दे बसंती” के संगीत का काम शुरू हुआ तो मेहरा को याद आया कि बरसों पहले रहमान ने एक बढ़िया धुन बनाई थी पर धुन क्या थी वे भूल चुके थे, बल्कि रहमान को भी याद नहीं था उन्होंने क्या बनाया था। राकेश मेहरा ने बहुत खोजा और एक पुरानी हार्ड डिस्क में कहीं उन्हें वो धुन मिल गई, बेसिक गिटार के साथ रहमान ने उसे बनाया था। उसका वही रूप रखते हुए रहमान ने पूरा गीत रचा, वो गीत बना “रु-ब-रु” और इसके गायक “नरेश अय्यर” को अपने पहले ही गीत के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ।
इस दशक की शुरुआत में ही रहमान देश की सरहदों को लांघ कर बाहर निकल गए थे। उनके संगीत में एक सार्वभौमिकता थी जो पूरी दुनिया के लोगों को अपने से जोड़ती थी। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। ये उनके भारतीय और पश्चिमी शास्त्रीय संगीत की गहरी समझ के चलते हुआ था। अक्सर ये होता है कि दक्षिण के कलाकारों में कर्नाटक संगीत की एक छाप होती है जो अलग ही साउंड करती है, जिससे वे क्षेत्रीयता में बंध जाते हैं। पर रहमान का संगीत ग्लोबल था। उनके एल्बम “बॉम्बे” की पूरी दुनिया में 15 मिलियन प्रतियाँ बिकी थीं। “वंदे मातरम” पूरी दुनिया में सबसे ज़्यादा बिकने वाला एल्बम बन गया था।
2002 में उन्हें पहला बड़ा प्रोजेक्ट मिला “बॉम्बे ड्रीम्स” जो एक ऑपेरा था। इसके बाद 2003 में उनका संगीत चीन पहुँचा जब उन्होंने “वारियर्स ऑफ हैवन अँड अर्थ” फिल्म के लिए संगीत तैयार किया। इसके बाद तो सिलसिला चल निकला और वे न सिर्फ़ तमिल बल्कि हिन्दी, और दुनिया के दूसरे देशों में भी डिमांड में रहने लगे और इन्हीं सब के बीच आया भारत का दूसरा ऑस्कर अवार्ड जो उन्हें मिला फ़िल्म “स्लमडॉग मिलियनेयर्स” फ़िल्म के गीत “जय हो” के लिए। इसी फ़िल्म में उन्होंने “चोली के पीछे” गीत से प्रेरित होकर बनाया था “रिंगा रिंगा” जो अपनी तरह का अद्वितीय गीत है। रहमान इस दशक में पूरी दुनिया में भारत का गर्व बने, और आज तक हैं। उनसा कोई संगीतकार इससे पहले कभी नहीं आया और शायद ही कोई होगा, ठीक वैसे ही जैसे दूसरा मोहम्मद रफ़ी या दूसरी लता मंगेशकर नहीं हो सकती। मुझे अफ़सोस बस यही होता है कि काश रहमान को रफ़ी और किशोर भी मिले होते, लताजी और आशाजी के साथ तो फ़िर भी उनके गीत हैं।"
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