एक दिन अचानक ऐसा हुआ कि एक घटक वाइरस का आक्रमण हुआ और अचानक सबकी बुद्धि खत्म हो गई, सब अंध भक्त हो गए। वाइरस के हमले से कुछ लोग बच गए जिनको आसपास सब एक ही जैसे लोग दिख रहे हैं, सब एक ही तरह की बातें कर रहे हैं, सब एक ही तरह से जी रहे हैं, क्या डॉक्टर, क्या इंजीनियर, क्या मजदूर।
बचे हुए लोग कोशिश करते हैं, लड़ते हैं मानवता को फिर से ज़िंदा करने की, इन लोगों को फिर से सामान्य बना देने की, पर नहीं हो पा रहा। ये लोग, जो बच गए हैं उन्हें भी अपने में मिला लेने की तकनीक खोज लिए हैं और उन्हें अपने में मिला रहे हैं। जल्द ही मनुष्यता समाप्त हो जाएगी।
यही कहानी है सिरीज़ “Pluribus” की। आप क्या समझे, मैं भारत की कहानी कह रहा हूँ? अरे वो तो बर्बाद हो ही चुका। वैसे मैंने दोनों को मिक्स कर दिया था। असल में कहानी कुछ यूं है –
अन्तरिक्ष विज्ञानियों को अन्तरिक्ष से कुछ संदेश मिल रहे हैं। उन्हें ये समझ आता है कि कोई प्रजाति है जो धरती पर आ रही है लेकिन अभी उनके आने का समय बहुत दूर है। पर एक दिन अचानक यूं होता है कि पूरी पृथ्वी के लोग कुछ देर के लिए कांपने लगते हैं, अपने होश खो देते हैं। और जब वे वापस सामान्य होते हैं, तो वे नहीं रहते जो पहले थे। सारे लोग एक दूसरे से जुड़ चुके हैं, जैसे एक सर्वर होता है और बाकी क्लाईंट। अब सबका ज्ञान, सबकी स्किल्स सबमें आ जाती है। आप किसी से जब बात कर रहे हैं तो आप सबसे बात कर रहे हैं, कोई individuality नहीं बची है। साथ ही कोई भावनाएं भी नहीं बची, ये लोग हमेशा एक ही स्थिति में रहते हैं, सदा मुसकुराते हुए। इनके अंदर बाकी कोई भाव नहीं आता, न गुस्सा, न खीझ, न बोरियत, न ईर्ष्या। आए भी तो कैसे, अब सब एक ही हो चुके हैं। पूरी पृथ्वी पर सिर्फ 13 लोग ऐसे हैं जिन पर इस आक्रमण ने असर नहीं किया। उन्हीं में से एक है केरोल। वो एक मशहूर लेखिका है, पर खडूस है। हमेशा चिढ़ी हुई रहती है। उसे ये सब ठीक नहीं लगता। जब इस वाइरस का आक्रमण हुआ तब कुछ लोग इसे झेल नहीं पाये, और मर गए। उन्हीं में से एक केरोल की लिव इन पार्टनर हेलेन थी। केरोल चाहती है कि ये सब लोग वापस इंसान बन जाएँ, पर कैसे?
वैसे देखा जाये तो बहुत अच्छी स्थिति हो जाती है। गोरे-काले, गरीब-अमीर, नस्ल, जाति, किसी का भी भेद नहीं रह जाता। साम्यवाद आ जाता है। सब एक ही जगह एक बड़े स्टेडियम में सोते हैं, किसी की कोई अपनी प्रॉपर्टि नहीं होती। एक बारगी तो मुझे लगा ये तो जैन हो गए जब उन्होंने बताया कि वे मच्छर भी नहीं मारते, यहाँ तक कि फल को पेड़ से तोड़ते भी नहीं, जब वो अपने आप गिर जाता है तब खाते हैं। हमारे यहाँ के जैनियों को तो ये अवश्य देखनी चाहिए, सच्चा जैनिज़्म मिल जाएगा, शायद वे फिर दूसरे धर्म वालों के खून की प्यास खत्म कर सकें। विडम्बना है कि जो धर्म बैक्टीरिया भी नहीं मारने में विश्वास रखता है, उसके अनुयायी आजकल सबसे ज़्यादा हिंसा चाहते हैं।
वो इनसे बातें करके इनके बारे में सब कुछ समझने की कोशिश करती है। वो पाँच और लोगों से भी मिलती है जो उसकी ही तरह बच गए हैं, पर वे लोग इस परिवर्तन से खुश हैं। उन्हें सब ओर शांति लगती है। सिर्फ एक और आदमी है जो इस सबसे खुश नहीं है।
आगे का घटनाक्रम आप सिरीज़ में ही देखें तो ठीक होगा। मैंने पूरी देखी इसके अद्भुत कान्सैप्ट की वजह से। कहाँ तक सोचते हैं ये लोग? हमारे यहाँ मिर्ज़ापुर से आगे न बढ़े हैं, न कभी बढ़ेंगे क्योंकि ऊपर जो लोग बैठे हैं उनके अंदर कोई vision ही नहीं है। ये सच है कि जो पैसा लगाता है, वो लाभ के लिए लगाता है। लाभ तब होगा जब लोग देखेंगे, और लोग तब देखेंगे जब उनकी पसंद वैसी होगी। हमारे यहाँ आम तौर पर ये सब लोगों की छोटी सी बुद्धि के ऊपर से जाता है। कुछ ही लोग हैं जो इसे समझते हैं। ख़ैर, सिरीज़ कान्सैप्ट लेवेल पर बेहतरीन है, पर execution बहुत बहुत धीमा है। अगर आप धीमी चीज़ें नहीं देख सकते तो हो सकता है आप आधे में बंद कर दें। मुझे लगता है अगले सीज़न तक ले जाने के लिए ज़्यादातर टाइम पास किया है बनाने वालों ने। इतना भी रिपिटिटिव नहीं होना था। ये सीज़न जहाँ खत्म होता है, वहाँ से असल काम शुरू होना है इस समस्या से निबटने का, जिसके लिए अब अगले सीज़न का इंतज़ार करना है।
केरोल इतनी खडूस है कि कई बार आपको उसे चमाट मारने की इच्छा होती है। पर यही उस अभिनेत्री की सफलता है। picturization बहुत सुंदर है, कोई दो राय नहीं। जैसे हमारे यहाँ आजकल गे एंगल डाल देना फ़ैशन हो गया है, वहाँ लेसबियन का फ़ैशन है। हालाँकि इन चीजों के बिना भी कहानी वही रहती। उस एंगल ने बस दो एपिसोड खींच दिया सिरीज़ को।
कुल मिलाकर अच्छी सिरीज़ है अगर आप स्लो pace के साथ ओके हैं। इसे ब्रेकिंग बैड वालों ने ही बनाया है। सिरीज़ एपल पर उपलब्ध है, पर मैंने डाउनलोड करके देखी है। पहला एपिसोड प्राइम पर फ्री है, उसे देखकर तय कर लीजिये आगे देखनी है या नहीं।
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