इश्क़ में इंसान ऐसे-ऐसे काम कर जाता है कि उसे ख़ुद पता नहीं होता कि उसने किया तो इश्क के लिए था पर बदल ज़माना गया है। उसकी आँखों में बस माशूक़ होती है, पर उसके पहाड़ तोड़ डालने से नदियों का बहाव बदल जाता है।
ऐसी ही एक कहानी है हिमांशु रॉय और देविका रानी की।
हिमांशु ने अपनी पहली फ़िल्म “द लाइट ऑफ एशिया” 1925 में बनाई थी जिसे इंग्लैंड में बहुत तारीफ़ें मिलीं थीं। उसने जुगाड़ करके इंग्लैंड के प्रिंस के लिए शो रखवा लिया जिसने उसे रातों-रात प्रसिद्धि दे दी। इसी फ़िल्म के दौरान उसकी मुलाकात अपने से लगभग आधी उम्र की लड़की देविका रानी से हुई, और देविका ने उसके दिल में जगह बना ली। हालाँकि हिमांशु की अलग-अलग देशों में गर्लफ़्रेंड्स थीं पर देविका में कुछ अलग बात थी। देविका भी हिमांशु से प्रभावित हुई थी। बात आई-गई हो गई। हिमांशु के मन में ख़याल तो आया था कि काश देविका उसकी फ़िल्म में काम करे, पर ये सिर्फ़ ख़याल था। इस फ़िल्म के बाद फ़िल्म “शिराज़” की योजना बनी, जिसे इंग्लैंड की ही कंपनी प्रोड्यूस कर रही थी। इस बार हिमांशु की ख़्वाहिश बहुत बलवती थी कि किसी भी रूप में देविका इस फ़िल्म से जुड़ जाये। अब तक दोनों के संबंध भी घनिष्ठ हो गए थे, ना ना, मोहब्बत वाले नहीं। दोनों मुसलसल मुलाक़ातें करते रहते थे। देविका का भी मन अब फ़िल्मों की तरफ मुड़ रहा था, पर समस्या उसकी पृष्ठभूमि थी। वो एक उच्च शिक्षित, और ऊँचे ख़ानदान की लड़की थी। रवीन्द्रनाथ टैगोर से सीधा रिश्ता जुड़ता था उसका। और भारत में फ़िल्मों में काम करना बहुत निकृष्ट माना जाता था। निचले तबक़े की, अनपढ़ या गरीब लड़कियां ही इस काम को करती थीं। ऐसे में उसके लिए फ़िल्मों में जाना एक बहुत बड़ा निर्णय था। उसने ये भी सोचा कि पर्दे पर न सही, पर्दे के पीछे के कामों से जुड़ जाऊँ। हिमांशु की भी यही इच्छा थी। काफ़ी ऊहापोह के बाद देविका ने इंकार कर दिया।
हिमांशु को ख़ब्त सवार हुई कि अब अच्छे घरों की लड़कियों को फ़िल्मों में लाना है। और उसे सफलता मिल भी गई। शिराज़ में मुख्य भूमिका के लिए उसे “एनाक्षी रामा राव” के रूप में एक उच्च शिक्षित संभ्रांत घराने की लड़की मिल गई। फ़िल्म रिलीज़ हुई और इस बार पिछली फ़िल्म से ज़्यादा तारीफ़ें ले गई, और ज़िक्र होने लगा भारतीय फ़िल्मों की पहली उच्च शिक्षित लड़की एनाक्षी रामा राव का। ये देखकर देविका रानी जल-भुन कर रह गई। ये सेहरा इतिहास में उसके सर हो सकता था अगर वो सही समय पर निर्णय लेती। एनाक्षी का अभिनय भी कोई खास नहीं था, वो उससे कहीं बेहतर प्रदर्शन कर सकती थी। हिमांशु ने जो मेहनत देविका का मन बनाने के लिए की उसने भारत में फ़िल्मों की दुनिया ही बदल दी। अब जो लड़कियाँ डरती थीं इस दुनिया में कदम रखने से पर मन ही मन चाहती थी अभिनय करना, उनके लिए रास्ता तैयार हो गया। एक बार दरवाजा खुल गया तो फ़िर सब उससे अंदर आने लगे, और इसी के साथ देविका ने भी अपना मन बना ही लिया।
बड़ी दिलचस्प कहानी है, जिसे आगे की पोस्ट्स में जारी रखेंगे, फिलहाल ये पोस्ट एनाक्षी के नाम जो भारत की पहली संभ्रांत महिला थी फ़िल्मों की दुनिया में पदार्पण करने वाली।
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