न्यूरेमबर्ग - हिटलर के बाद

 


जब भी किसी विषय पर लिखने की अंदर से उत्कंठा पैदा होती है, तो मुझे घबराहट होने लगती है। एक के बाद एक विचारों की इतनी लहरें आने लगती हैं कि मुझे लगता है मैं इन्हें तरतीब में नहीं जमा पाऊँगा, और किसी तरह बाँध भी दिया तो बहुत कुछ रह जाएगा जो कहा जाना था पर मैंने कहा ही नहीं। 

Nuremberg देखते समय इतनी हिलोरें उठ रही थीं कि अगर उसी समय लिखने बैठ जाता तो रात गुज़ार देता। आख़िर सोचा भागते भूत की लँगोटी भली, जितना लिखा जा सके वही लिख देता हूँ।

ऐसी इंटेलिजेंट फ़िल्में मेरी पसंद हैं। इन फ़िल्मों की गति ऐसी होती है कि जैसे धीरे-धीरे रस टपक रहा हो, और ये धीरे-धीरे आपके ज़हन में फैलती जाती हैं। 

Nuremberg 2013 में लिखी Jack El-Hai की किताब “The Nazi and the Psychiatrist” पर आधारित है, ये किताब ख़ुद Dr. Douglas M. Kelley की 1947 की किताब “22 Cells in Nuremberg” पर आधारित है। हिटलर की मौत के बाद नाजी सेना के 22 कमांडरों को पकड़ा जाता है, जिनमें एक है “हरमन गोरिंग” जो हिटलर के बाद सेकंड इन कमांड था, याने हिटलर के बाद सत्ता उसी के हाथ में आती। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी की हार के बाद सब ख़त्म हो गया। गोरिंग ने आत्मसमर्पण कर दिया। सेना एक मनोचिकित्सक को बुलाती है इन सबकी मानसिक स्थिति जाँचने और उनसे सारी बातें जानने के लिए। ये मनोचिकित्सक है कैली, जिसका अपना charming तरीका है लोगों का विश्वास जीतने का। गोरिंग से मिलकर उसे लगता है कि ये आदमी खास तो है, बहुत आत्ममुग्ध है। वो उससे रोज़ मिलता है, धीरे-धीरे दोनों के अच्छे संबंध बनते हैं। तय तो यही होना था कि इन सभी को मौत की सज़ा दे दी जाये पर जितने घिनौने इन लोगों के अपराध थे उन्हें देखकर जस्टिस रोबर्ट जैकसन को लगता है कि इनके ये घिनौने अपराध दुनिया के सामने आने चाहिए ताकि दुनिया इससे सबक ले। मानवता को शर्मसार करने वाले इन लोगों को यूं ही चुपचाप ख़त्म होने दिया तो दुनिया एक ऐसे सच से वंचित रह जाएगी जो उसे जानना बहुत ज़रूरी है, और ये भी कि आगे कोई इस तरह का काम न करे। लेकिन उन्हें हर तरफ़ से विरोध मिलता है, बाकी लोग इन्हें सीधे फाँसी देने के पक्ष में हैं जबकि जस्टिस इन पर युद्ध अपराध का मुकदमा चलाना चाहते हैं। आखिर मुकदमा शुरू होता है, और इस मुक़दमे में महत्वपूर्ण है डॉ कैली की गोरिंग के साथ बातचीत। 

ये बातचीत इतनी दिलचस्प है कि आप भूल जाते हैं कि फ़िल्म बहुत locations पर नहीं जा रही है, जेल की चारदीवारी के भीतर ही सब हो रहा है। फ़िल्म में अंत में हिटलर के camps की असली विडियो footage दिखाई गई है जिसे देखकर किसी भी मनुष्य का दिल आज भी दहल जाये, सिवाय उस एक प्रजाति के जो 2014 के बाद हमारे यहाँ फली-फूली है। ये वही प्रजाति है जिसने जर्मनी में क़त्ले-आम किया था, ये भी एक कौम को पूरी तरह मिटा डालना चाहते हैं, ये उसी तरह के बर्बर हैं। फ़िल्म के अंतिम दृश्य में कैली कहता है कि आज भी ऐसे कई लोग मौजूद हैं जो आधे लोगों को मारकर बाकी आधे लोगों पर शासन करना चाहते हैं। ये मनोवृत्ति हर जगह मौजूद है। 

जस्टिस रोबर्ट ने ये सोचा था कि इस मुक़दमे से सबक लेकर फिर दुनिया में कोई हिटलर पैदा नहीं होगा, पर उसे क्या मालूम था कि 5-6 साल बाद ही एक और पैदा होने वाला है, जो एक प्राचीन, गौरवशाली सभ्यता को बर्बाद कर देगा। कैली सही था।

फ़िल्म में कुछ देर ही रसेल क्रो को देखने के बाद इतना अच्छा लगा कि मुझे Facebook पर पोस्ट करनी पड़ी। ये एक ऐसा अभिनेता है जो किसी भी किरदार में ऐसा जज़्ब होता है कि इसे पहचानने में भी देर लगती है। पहले सीन में तो मैं नहीं पहचाना था। गोरिंग को इतनी अच्छी तरह खुद गोरिंग भी नहीं निभा सकता था। डॉ कैली का किरदार रामी मालिक ने निभाया है जो इजीप्शियन मूल के अमेरीकन अभिनेता हैं। फ़िल्म बस इन दोनों ही की है। 

अम्रीका की यही खूबसूरती है कि फिल्मों में अम्रीका के लिए भी कुछ भी कहा जा सकता है, वहाँ कोई जाहिल गमछे वाला थिएटर में तोड़-फोड़ नहीं करता। इसमें जब डॉ और गोरिंग की बहस होती है तब गोरिंग उसे कहता है तुम जीत गए हो इसलिए तुम सही हो, वरना तुममे और मुझमें क्या अंतर है, तुमने भी तो एक बम से लाखों लोग एक झटके में मार दिये? और अंत में कैली गुस्से में अम्रीका के लिए यही बात कहता है।

कैली ने अपने इस अनुभव पर एक किताब लिखी जो असफल हो गई। इस घटना से जो trauma उसे मिला उससे लड़ते हुए उसने 1958 में आत्महत्या कर ली। 

ये एक बेहद ज़रूरी फ़िल्म है। सभी के देखने लायक। एक बार फिर विश्व नाजी शक्तियों के प्रभाव में है।

कैली ने अपनी जांच में जो निष्कर्ष निकाले थे वे विचारणीय हैं। उसके अनुसार ये लोग कोई अलग तरह के लोग नहीं थे, ये आम लोग ही थे, हमारे बीच के ही। उनमें कोई psychiatric समस्या नहीं थी। ये बस मौका परस्त लोग थे, पावर हंग्री। इन्हें मौका मिले तो ये आधे लोगों की लाशों पर चढ़कर बाकी आधों पर हुकूमत कर लें। इनका राष्ट्रवाद, पावर और पैसा बनाने का तरीका था बस। ऐसे लोग हर मुल्क में होते हैं। उनमें से कुछ मुल्कों ने ऐसे लोगों को फिर से चुन लिया है, जो विनाश की और ले जा रहे हैं। भारत में भी उस दौर के जर्मनी जैसी स्थिति अवश्य आएगी अगर सब कुछ ऐसे ही चलता रहा। बिलकुल वही-वही हो रहा है, जो वहाँ हुआ था। 

एक दृश्य में कैली गोरिंग से पूछता है कि हिटलर को फॉलो क्यों किया तो उसका जवाब था – “He made us feel German again”. क्या ये लाइन सुनी-सुनी सी नहीं लग रही है? जर्मनी जब प्रथम विश्व युद्ध के घोर अपमान के घाव लेकर सर नीचा किए जी रहा था तभी हिटलर का उदय हुआ, उसने इसी अपमान को हथियार बनाया, लोगों की सजह पाशविक प्रवृत्तियों को खाद-पानी देकर सींचा और उन्हें इस भयावह स्तर तक ले आया कि लोग शैतान बन गए। क्या आप जानते हैं कि उस समय जर्मन लोग अपने बच्चों को यहूदियों के बारे में कैसी-कैसी कहानियाँ सुनाते थे? उनके सींग होते हैं, वो राक्षस होते हैं वगैरह, वही सब जो आजकल व्हात्सप्प पर बुड्ढों को भी सुनाई जाती हैं। हिटलर का मुख्य हथियार प्रोपगंडा था, कई फ़िल्मकार उसके लिए फिल्में बनाते थे, मीडिया उसके ही गुणगान करती थी। बस एक बात अलग थी, कि वो टेलिप्रोंप्टर देखकर नहीं बोलता था, उसे वाकई बोलना आता था। 

ख़ैर, फ़िल्म प्राइम पर उपलब्ध है। ज़रूर ज़रूर देखी जानी चाहिए। 

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