साजिद नादियादवाला की बतौर निर्माता पहली फ़िल्म थी "ज़ुल्म की हुकूमत" जिसमें हीरो गोविंदा थे। किसी की सिफ़ारिश से इसका संगीत तैयार करने का काम मिल गया "दिलीप सेन-समीर सेन" को, जिनकी ये तीसरी फ़िल्म थी। इसके पहले दो पिट चुकी थीं। साजिद ने सोचा पहली ही फ़िल्म है, किसी बड़ी हस्ती से महूरत करवाना चाहिए, तो उन्होंने यश चोपड़ा को बुलाया। वहीं यश जी की दिलीप सेन-समीर सेन से मुलाक़ात हुई। उनका काम यश जी को ठीक लगा तो बोले मैं एक विडियो फ़िल्म बना रहा हूँ – आईना। उसके लिए मिलो। विडियो फ़िल्मों का एक छोटा सा दौर आया था। ऐसी ही एक विडियो फ़िल्म के लिए यश चोपड़ा ने उत्तम सिंह को भी बुलाया था। बहरहाल, आईना को नरेश मल्होत्रा निर्देशित करने वाले थे।
मीटिंग हुई जिसमें दिलीप सेन-समीर सेन ने 3-4 धुनें सुनाईं। यश चोपड़ा बोले कि कुछ दिनों बाद एक और सिटिंग रखते हैं। अगली सिटिंग में भी उन दोनों ने वही 3-4 गाने सुना दिये। यश चोपड़ा साहब बोले ठीक है, आगे देखते हैं। दिलीप सेन समझ गए कि फ़िल्म निकल गई है हाथ से, आज उन्हें कुछ नया सुनाना था पर उनके पास कोई नई धुन नहीं थी। उधर यश चोपड़ा जाने लगे तो डिलीप्प सेन उनके पास गए और बोले मुझे एक मौका और दीजिये। यश जी बोले नहीं, ये विडियो फ़िल्म है, इसमें जल्दी से खत्म करना है, हमारे पास ज़्यादा समय नहीं है। आपके साथ अगली फ़िल्म करेंगे। पर दिलीप सेन को मालूम था, मौका गया मतलब सदा के लिए गया। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि एक बार सुन लीजिये फिर आपको पसंद न आए तो मत करिएगा। यश जी ने पूछा कितना समय चाहिए, दिलीप सेन बोले 2 दिन।
अब इन्हें दो दिन में ऐसा कुछ बनाना था जो उन्हें पसंद आ जाए। तो दिलीप सेन ने यश जी के पिछले काम पर एक नज़र डाली – देखा एक ख़्वाब तो ये सिलसिले हुए, तेरे मेरे होठों पे...मतलब यश जी को पहाड़ी राग बहुत प्रिय है। तो इन्हीं दोनों के नोट्स से मिलता जुलता उन्होंने गाना बनाया “दिल ने दिल से क्या कहा सुन ज़रा सुन ज़रा”। हालांकि ये इन दोनों गीतों के टेम्पलेट पर ही बना हुआ है, उन्हीं सुरों पर खेलता है पर इसे नकल नहीं कहा जा सकता। अब जब मैंने आपको बता दिया है तो आपको इन गीतों में समानता नज़र आने लगेगी वरना कभी आपको खयाल नहीं आया होगा कि ये आईना का गाना किस गाने से मिलता है।
इसी के साथ उन्होंने एक और गाना बनाया “गोरिया रे गोरिया रे”। अगली सिटिंग में जब ये दो गीत उन्होंने सुनाये तो यश चोपड़ा ने वे गीत भी अप्रूव कर दिये जिन्हें पहले रिजैक्ट कर दिया था। बाद में आईना विडियो फ़िल्म की बजाय फीचर फ़िल्म बनी।
तो खेल सामने वाले को समझने का भी होता है। “भी” इसलिए कहा कि इसके बावजूद दिलीप सेन-समीर सेन आगे चलकर बी ग्रेड फ़िल्मों के ही संगीतकार बनकर रह गए। हालाँकि 90 के दशक में संख्या के लिहाज से सबसे ज़्यादा गाने उन्होंने ही बनाए थे।
ऐसा ही एक और उदाहरण देता चलता हूँ। निर्देशक के रविशंकर फ़िल्म बना रहे थे “मेहरबान” जिसमें मिथुन और आएशा जुल्का थे। उन्हें इन दोनों की शादी के बाद का एक गाना चाहिए था। दिलीप सेन-समीर सेन से उन्होने गाना बनाने को कहा। दिलीप सेन ने कोई उदाहरण देने को कहा कि किस तरह का चाहिए आपको गाना तो के रविशंकर बोले “झिलमिल सितारों का आँगन होगा” जिसे लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने बनाया था। अब इसी गीत के सुरों को लेकर दिलीप सेन ने बनाया “अगर आसमाँ तक मेरे हाथ जाते”। और तुरंत अप्रूव हो गया। दोनों में स्केल, सुरों की बनावट एक जैसी है, और ताल भी वही है तो के रविशंकर के दिमाग में जो खाका था उसमें वो गाना बिलकुल फिट बैठ गया। उल्लेखनीय है कि इस गीत को शबबीर कुमार गाने वाले थे, सोनू निगम उस समय संघर्ष कर रहे थे और डमी गाते थे। उन्होंने शब्बीर कुमार के लिए इसे डमी रिकॉर्ड किया हुआ था। शब्बीर कुमार ने जब इसे सुना तो बोले इसी की आवाज़ में रख लो, बहुत अच्छा गाया है इसने। और ऐसे सोनू को ये गाना मिल गया।
दिलीप सेन-समीर सेन चाचा भतीजा की जोड़ी है।
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