शमिताभ - ना अमिताभ


 

भक्त ही भगवान की लुटिया डुबोता है। 

आर बाल्की अमिताभ बच्चन के परम भक्त हैं और अमिताभ बच्चन भक्तों को पसंद करते हैं, यही वजह रही कि इन भक्तों की कई बेसिरपैर की फ़िल्में कर ली, चाहे वो मनमोहन देसाई की मर्द, गंगा जमुना सरस्वती हो, मेहुल कुमार की मृत्युदता और कोहराम हों, या फिर बालकी की फिल्में हों। 

आर बाल्की अपने आपमें निर्देशन का पूरा स्कूल हैं। निर्देशन के विद्यार्थी उनकी फ़िल्में देख कर वो सब सीख जाएंगे जो उन्हें नहीं करना है, फिर जो बचा वही उन्हें करना है। 

आज जाने किस मनहूस घड़ी में "शमिताभ" लगा ली। इतनी घटिया राइटिंग और इतना घटिया निर्देशन मैंने पहले नहीं देखा। इससे अच्छी फ़िल्में तो गुड्डू धनोआ बना लेता था। सबसे पहले तो धनुष पर अमिताभ की आवाज़ सबसे वाहियात आइडिया था। भले आप तर्क दे लें कि वो तो हमने हमेशा अमिताभ का चेहरा देखा है उस आवाज़ के साथ इसलिए, नहीं भाई, धनुष का चेहरा उस आवाज़ के लिए बना ही नहीं है। 

एक गूंगा लड़का है जिसे हीरो बनना है, मतलब सिर्फ एक्टर नहीं, हीरो!

चलिये इसमें भी कोई बुराई नहीं। फिर वो मुंबई भाग जाता है इसके लिए और उसे हीरो नहीं बनाया जाता तो ऐसे रोता है जैसे उसका हक़ छीन लिया हो किसी ने। उसे एक वेल्लि लड़की मिल जाती है जो दुर्भाग्य से कमल हासन की लड़की है। ये लड़की कमल हासन के जीवन भर की मेहनत पर पानी फेरने ही पैदा हुई है। इसको एक्टिंग का A भी नहीं पता है। ख़ैर, इस लड़की का बाप डॉक्टर है, और वो अपने दोस्त के साथ इस गूंगे गरीब को अम्रीका भेज देता है जहां उसे एक मशीन मिल जाती है जिसके जरिये किसी और की आवाज़ इसके गले से निकल सकती है। मुझे इतने साल हो गए मुंबई में घिसते हुए, आज तक ऐसा आदमी नहीं मिला जो अमरीका क्या मुंबई के किसी ठेले पर ही पार्टी दे दे। कुछ भी हो रहा है फिलम में। आपका हीरो गूंगा है और उसे हीरो बनना है, जिस लेवल की मुश्किलें हैं उसी लेवल का संघर्ष दिखाया जाना था पर बाल्की साहब को अपने भगवान को दिखाने की जल्दी थी तो फटाफट धनुष की कहानी निपटा दी और फिर सड़क पर इसे अमिताभ बच्चन मिल जाता है, वो इसे आवाज़ देने को राज़ी हो जाता है और ये तुरंत सुपर स्टार भी बन जाता है। फिर इस गूंगे को बेस्ट एक्टर का अवार्ड भी चाहिए। मतलब हलवा है क्या? गाँव से आया, एक लड़की मिली फिर आवाज़ मिली और फिर फिल्म मिल गई और स्टार भी बन गया?

फिल्म में डबिंग भी सही नहीं है और डाइलॉग सब ऐसे बोल रहे हैं जैसे अहसान कर रहे हों। और बॅक ग्राउंड म्यूजिक इतना घटिया है कि आश्चर्य होता है ये इलैया राजा का म्यूजिक है। ऐसा लगता है जैसे गाँव के कुछ लौंडों ने मिलकर फिल्म बना दी है। अमिताभ और धनुष जैसे पावर हाउस performers को लेकर ऐसा कुछ रचना गुनाह है। 

मैंने आर बाल्की की "चीनी कम" देखी थी और उसके बाद कसम खा ली थी कि इस नाम से ही दूर रहना है और रहा भी पर कोई और फिल्म देखते-देखते चैनल ने इसे अपने आप शुरू कर दिया तो देखने लगा। 

What a waste!

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