वो समय बीत चुका जब हैदर जैसी फ़िल्म बन सकती थी, अब नहीं बन सकती। अब परदे पर हंसिया, गँड़ासे, कुल्हाड़ी चल रहे हैं। तो विशाल भारद्वाज जैसे फ़िल्मकार क्या करें? उसी को करेंगे लेकिन अपने ही स्टाइल में।
“ओ रोमियो” ख़ून से लथपथ कविता है विशाल भारद्वाज की।
ट्रेलर देखकर मेरा मन तो नहीं किया था इसे देखने का। मुझे लगा था विशाल भी बहाव में बह गए हैं और एनिमल जैसा कुछ बना डाला है, लेकिन संयोग ऐसा बना कि आज ही देख ली। फ़िल्म की शुरुआत अच्छी हुई और कुछ ही देर में आया वो दृश्य जिसने मुझे डरा दिया। मुझे लगा इस बार विशाल भारद्वाज वाकई डगमगा गए हैं, बाज़ार के आगे झुक गए हैं। शाहिद कपूर उर्फ़ उस्तरा अकेले, सिर्फ उस्तरे से 40-50 गुंडों की भीड़ को ख़त्म कर देता है। निश्चित रूप से अतिशयोक्ति है और इसीलिए मुझे डर लगा। लेकिन ये डर कुछ ही मिनटों में दूर हो गया जब शनैः-शनैः फ़िल्म ने पूरी तरह मुझे अपनी गिरफ़्त में ले लिया। मैं विशाल भारद्वाज के रचे उस संसार का हिस्सा हो गया। “निशानची” अनुराग कश्यप ने 80s की फ़िल्मों को tribute के तौर पर घोषित की थी पर मुझे वैसा कुछ लगा नहीं, उसमें सभी तत्व अनुराग कश्यप की फ़िल्मों के थे, पर इस फ़िल्म को ज़रूर कहा जा सकता है वो tribute, ऐसी फ़िल्म जिसमें एक खूँखार खलनायक है, जो अजेय लगता है, एक लार्जर देन लाइफ हीरो है जो किसी भी मुसीबत से भिड़ सकता है, नायिका के लिए अपनी जान पे खेल जाता है, और एक नायिका है जो प्रेम की देवी है, और हैं उस हीरो पर जान कुर्बान करने वाले दोस्त।
वैसे तो ये हुसैन जैदी की किताब पर आधारित है लेकिन इसमें बॉलीवुड का भरपूर तड़का लगा कर इसे ज़ायकेदार बना दिया गया है। ये फ़िल्म मूलतः एक प्रेम कहानी है जो underworld के खूनी संघर्ष के बीच जन्म लेती है। शाहिद कपूर बने हैं उस्तरा जो सुपारी किलर है। उसे चार लोगों की सुपारी देने आती है अफ़्शां (तृप्ति डिमरी) और यहीं से कुछ घटनाक्रम ऐसा बनता है कि उस्तरा इस लड़की के प्रेम में इस क़दर गहरे उतर जाता है कि अपने आप को बरबाद करने पर आमादा हो जाता है। प्रेम को बहुत थोड़े से ही निर्देशक परदे पर इतने दिलकश रूप से उतार पाते हैं, जिनमें विशाल एक हैं। दूसरे सुधीर मिश्रा हैं। ऐसा लगता है इन लोगों ने प्यार के उस जुनून को जिया है, उसके दर्द के रेशे-रेशे से वाक़िफ़ हैं। उस्तरा का दर्द स्क्रीन पर उभर कर आता है, ख़ून के लाल बैक्ग्राउण्ड में। इश्क़ का जो मीठा दर्द है वो कई खुशियों से ज़्यादा ज़ायक़ेदार है, और ये ज़ायक़ा जो परदे पर उतार कर आपके ज़हन में उतार दे वही मास्टर डाइरेक्टर है।
कहानी कई परतों में चलती है, ऐसा नहीं है कि हीरो ने हीरोइन को देखा और प्यार हो गया, प्यार होता है अपना समय लेकर, और जब होता है तब हमें भी महसूस होता है कि अब तो हो ही जाना चाहिए। और जो होता है तो आय हाय....।
शाहिद कपूर अपनी पीढ़ी के शानदार हीरो हैं। अपने किरदार में जान डाल देते हैं। अगर असल ज़िंदगी में अक्खड़ नहीं होते तो बहुत फ़िल्में करते। उस्तरा का किरदार उस्तरा ही लगता है, और शहीद का अपना एक चार्म है जो इसे दर्शनीय बनाता है। शाहिद बढ़िया अभिनेता लगते रहते हैं तब तक जब तक कि उनके सामने अविनाश तिवारी नहीं आ खड़े होते। ये नया अभिनेता जबर्दस्त है। लैला मजनू, ख़ाकी, मेहता बॉय्ज़, और अब ये। इतने अलग-अलग किरदार और इतनी शिद्दत से निभाए हुए कि आप वाह कहने से अपने आप को रोक नहीं सकते। एक खूँखार खलनायक जिसे भाँति-भाँति के उत्सवों और पहनावों का शौक है। ऐसे लोग होते हैं असल में भी, आपको भी याद आता ही होगा एकाध नाम तो? जो आतंक कभी अमरीश पूरी पर्दे पर फैला देते थे, वही अविनाश ने सफालतापूर्वक किया है। क्लाइमैक्स में शाहिद और उनमें अंतर साफ़ नज़र आता है जब शाहिद अपने चेहरे के भावों को प्रदर्शित करने में अविनाश से मीलों पीछे रह जाते हैं। नाना पाटेकर अपने चित-परिचित अंदाज़ में हैं। विक्रांत मेसी की अतिथि भूमिका है, ऐसी जैसे 80 की फ़िल्मों में शेखर सुमन की हुआ करती थी। तृप्ति डिमरी मुझे बिलकुल भी खूबसूरत नहीं लगी कभी लेकिन इस फ़िल्म में बढ़िया परफॉर्मेंस दिया है। तमन्ना भाटिया का भी छोटा सा ही किरदार है, अभिनय तो उनका भी कमजोर ही रहता है, लोग उन्हें जिस वजह से देखने जाते हैं, वो इस फ़िल्म में नहीं है। उस्तरा के दोस्त के किरदार में हुसैन दलाल हैं, जिन्हें मैं तब से खोज रहा था जब से ब्रह्मास्त्र देखी थी। ये आदमी लेखक कहलाता है और इसी ने ब्रह्मास्त्र के संवाद लिखे थे, मैं तब इसकी सुपारी देना चाहता था।
90s का nostalgia इस पीढ़ी के निर्देशकों में बहुत गहरे तक है। ऐसे में कहानी का कालखंड अगर वही है तो निर्देशक के पौ बारह हो जाते हैं। एक एकल सिनेमा घर में किलिंग का सीन है, और पीछे फ़िल्म बेटा का गाना “धक धक करने लगा” चल रहा है। ये प्रयोग अच्छा लगता है, पहले भी हुआ है। श्रीराम राघवन तो बहुत करते हैं। और हाँ, शाहिद कपूर का डांस तो वाकई आज भी बढ़िया लगता है। दिशा पटनी को पूरी तरह वेस्ट किया है।
एक एक्टर जिसे देखकर पूरे समय देखा देखा सा लगता रहा उनका नाम बाद में कास्ट लिस्ट देखने पर पता चला, जाने माने शास्त्रीय गायक "राहुल देशपांडे" जो इस फिल्म में भी शास्त्रीय बंदिशें गाते रहते हैं।
बैकग्राउंड म्यूजिक बहुत बढ़िया है।
कुल मिलाकर बहुत बढ़िया एक्शन फ़िल्म है। दक्षिण के लगातार परोसे जाने वाले कचरे की बजाय इसे देखेंगे तो इंसानी शरीर में जो भावनाएं भगवान ने दे रखी हैं उन्हें भी कुछ ख़ुराक मिलेगी।
कुछ लोग इसे शाहिद कपूर की बेस्ट फ़िल्म बता रहे हैं लेकिन शाहिद और विशाल की बेस्ट अब भी “हैदर” है।
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