हालाँकि मैंने फिल्म “जान हथेली पे” को ख़ूब रोस्ट किया है, पर एक बात माननी होगी, कि उस फिल्म की मेकिंग उतनी वाहियात नहीं थी जितनी उस दौर में फ़िल्मों की हुआ करती थी। हर चीज़ को जहां तक हो लॉजिकल बनाया गया था। निर्देशन में भी कुछ अलगपन था जो उस भयंकर दौर से अलग था। मैंने निर्देशक आर झालानी की कुण्डली खंगाली और देखा कि उनके नाम अच्छी फ़िल्में दर्ज हैं। बिमल रॉय के सहायक रह चुके हैं, और पहली फिल्म “आया सावन झूम के” बनाई थी। याने 60 के दशक के निर्देशक थे, ज़ाहिर है उनका नज़रिया अलग ही होगा। जान हथेली पे उनकी आखिरी फिल्म थी जो 1987 में रिलीज़ हुई थी पर शुरू 1980 में ही हो गई थी।
उसके पहले उनकी फ़िल्म आई थी “उलझन” जिसकी कहानी पढ़कर मुझे उसे देखने की जिज्ञासा हुई। साथ ही संजीव कुमार और अशोक कुमार थे तो देखी जा
सकती थी। और मैं निराश नहीं हुआ।
आज के दौर के लिहाज से तो बहुत सरल सी फ़िल्म है –
फ़िल्म शुरू ही रंजीत से होती है, जिसका मतलब है कोई न कोई लड़की खतरे में है। ये लड़की है फ़िल्म के हीरो की बहिन। वैसे उस जमाने में हीरो की बहिन होना अपने आप में खतरे की बात ही हुआ करता था। पर इधर चक्कर दूसरा है। बहिन रंजीत से प्यार करती थी पर उसके चाल चलन को जानकर उसे छोड़ एक शरीफ इंसान से शादी कर चुकी थी। आज उसके भाई आनंद की शादी है, उसकी पक्की सहेली करुणा के साथ। रंजीत वहाँ पहुँच कर उसे पुराना लव लेटर दिखाता है और रात को होटल में आने को कहता है। ये बात वो अपनी सहेली को बताती है। सहेली मूर्ख है या दिलेर है, पता नहीं। वो कहती है कि मैं जाकर तेरे लेटर ले आऊँगी, वो मुझे कुछ नहीं कहेगा। कितनी भोली है, ये रंजीत को जानती नहीं अभी। बारात आने में एक घंटा बाकी है और वो घर से निकलती है। वहाँ रणजीत इंतज़ार में दारू पी रहा है, कमरे में इत्र छिड़क रहा है। इंतज़ार था कमला का और आ गई करुणा, पर रंजीत संत आदमी है, सबको साक्षी भाव से देखता है। कमला हो कि करुणा, की फ़रक पेंदा है? वो उस पर अटैक कर देता है। झूमा-झटकी में करुणा के हाथ कैंडल स्टैंड आ जाता है और वो उसके सर पर दे मारती है। रंजीत गिर पड़ता है और करुणा ड्रॉअर में से लेटर निकाल कर भग लेती है। जाकर आराम से शादी कर लेती है।
अब जो इसका ससुराल है वो बड़ा खतरनाक है, ससुर जज हैं, चाचा ससुर कमिश्नर है, पति इंस्पेक्टर है और तो और पति का खास दोस्त असरानी भी पुलिस वाला ही है। सुबह खबर मिलती है कि रंजीत मर गया। रंजीत को ऐसी मौत शायद पहली ही बार मिली हो कि शुरू में ही लड़की के हाथ से निपट जाये। ये केस करुणा के पति आनंद को ही मिलता है और फिर शुरू होती है छान बीन।
आज के दौर में अगर ये बनती तो मुख्य मुद्दा कत्ल होता लेकिन इस फ़िल्म में मुख्य मुद्दा उस कत्ल से उत्पन्न हुई परिस्थितियाँ और परिवार में आया भूचाल है। यही फ़र्क़ है। अब मानवीय भावनाओं पर कोई कहानी नहीं लिखी जाती, और यही एक वजह हो सकती है आम जन में संवेदनाओं के धीरे-धीरे विलुप्त होते जाने की। किसी भी चीज़ को जब उचित ख़ुराक नहीं मिलेगी तो वो कमजोर हो ही जाएगी। अब लोग ज़हनी तौर पर कमज़ोर हो गए हैं। वे दुख, चिंता, प्यार, वगैरह से बचने के लिए इतने डेस्परेट हो गए हैं कि कुछ भी कर गुजरते हैं। फ़िल्म दिलचस्प बनी रहती है और उसका एक बड़ा कारण संजीव कुमार और अशोक कुमार हैं। जहां रंजीत के पर्दे पर आते ही कमीनगी छा जाती है, वहीं अशोक कुमार किसी भी फ़िल्म में जब भी पर्दे पर आते हैं तो अच्छा-अच्छा फील होता है। उनकी वाइब्स बहुत सकारात्मक थीं। परत दर परत केस खुलता है और अंत में एक बढ़िया ट्विस्ट सामने आता है।
संजीव कुमार निर्विवाद रूप से देश के सर्वोत्तम अभिनेताओं में से एक हैं। उनके नैसर्गिक अभिनय का कोई मुक़ाबला नहीं। अपने किरदार में जिस तरह वे घुल जाते थे, और किसी अभिनेता के लिए वो संभव नहीं हुआ। उनका कोई अलग मैनरिज़म भी नहीं था, वे बस किरदार हो जाते थे। इस फ़िल्म में पुलिस इंस्पेक्टर और एक प्रेमी, पति का किरदार हो या फ़िर अंगूर का हास्य किरदार। सुलक्षणा पंडित की ये पहली फ़िल्म थी और इसी फ़िल्म के दौरान उन्हें संजीव कुमार से प्यार हो गया था। संजीव कुमार के उस प्यार को ठुकराने का ग़म उन्होंने ज़िंदगी भर पाला और कभी शादी नहीं की। संजीव कुमार इस वक़्त हेमा मालिनी के प्रेम में पड़े हुए थे। असरानी ने इस बार कमेडियन की बजाय हीरो के दोस्त का किरदार अच्छी तरह निभाया है।
फ़िल्म में कुछ बड़े लॉजिकल झोल हैं जैसे जिस होटल में संजीव कुमार की शादी के बाद की पार्टी रखी गई है, उसका मैनेजर संजीव कुमार की बीवी को नहीं पहचानता जबकि पार्टी में वो खुद मौजूद है। लेकिन उस दौर के हिसाब से माफ़ कर दिये जाने लायक हैं।
संगीत कल्याणजी-आनंदजी का है तो कुछ अच्छे गीत होना लाज़मी है। एक गीत जो किशोर कुमार के कलेक्शन में हमेशा रहता है – “अपने जीवन की उलझन को कैसे मैं सुलझाऊँ”।
फ़िल्म यूट्यूब पर है, और आपको आज के दौर की वीभत्सा कहानियों से थोड़ा ब्रेक लेना हो तो ज़रूर देखिये।
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