आजकल बॉलीवुड में बूढ़े-जवान-बच्चे हर तरह के हीरो को ख़ब्त सवार है कि 15-20 बिना नहाये-धोये, काले, मोटे गुंडे एक घूँसे में आसमान में उड़ाए। इतनी सी ख़ब्त के पीछे करोड़ों रुपये किसी के खर्च करवा दे रहा है। चीकट पुष्पा ने पूरे सिस्टम की ऐसी-तैसी कर दी है। अब किसी को असली, कायदे की कहानी चाहिए ही नहीं। बस ये चाहिए कि एक लगभग पागलल खलनायक हो, उसके आसपास गंदे-चीकट गुंडे हों, गाडियाँ हों, और हीरो हो जो इन सबकी ऐसी=तैसी करता फिर रहा है पूरी फिलिम में।
जवानों में राजकुमार राव ने मालिक फिल्म में अपनी भद पिटवा ली है, पर बुड्ढों में सनी देओल की जाट चल गई। क्या कहानी थी जाट की? कि इस पागल की थाली टक्कर लगने से गिर गई और उस गुंडे ने इसे sorry नहीं बोला तो इसने गाँव के गाँव उजाड़ दिये। इसे नहीं रोका जाता तो पूरा दक्षिण भारत खतम कर आता। खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। सनी पाजी को देखकर अनिल कपूर को भी जोश आया और उन्होंने भी बनवा डाली “सूबेदार”। नाम catchy है इसमें कोई शक़ नहीं। ये सूबेदार हैं अनिल कपूर। बतर्ज़ “मैं तेजा हूँ क्योंकि मेरा नाम भी तेजा है”, ये सूबेदार कहलाते हैं क्योंकि ये सेना में सूबेदार के पद पर थे।
मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड में घट रही घटनाओं का केंद्र हमारे प्रिय मामजी का रेत खनन माफिया है। सूबेदार जी की बीवी को एक डंपर ने टक्कर मार दी जिससे उसकी मौत हो गई। वो अपना आचार का व्यवसाय चलाती थी। सूबेदार उसके मरने के बाद घर पहुँच पाते हैं। उनकी एक बेटी है जो कॉलेज में पढ़ती है और उन्हीं की तरह अक्खड़ है। सेना से रेटायर हो गए हैं और अब एक बॉडी गौर्ड की नौकरी के लिए इनका पुराना मित्र सौरभ शुक्ला इन्हें रेत माफिया सोफ़्टी भैया के पास ले जाता है, जो बबली दीदी के लिए काम करता है। बबली दीदी जैल में है और उसका नाजायज भाई प्रिंस बाहर उत्पात मचाये हैं। सूबेदार जी बहुत कंट्रोल करते हैं पर आखिर प्रिंस से उनकी भिड़ंत हो ही जाती है। कैसे? उनकी बीवी ने उनके लिए एक मारुति जिप्सी खरीदी थी, जिसे वे जान से ज़्यादा चाहते हैं। प्रिंस उसे डैमेज तो करता है, साथ ही उसकी सीट पर मूत भी देता है। बस, सूबेदार साहब पूरी गैंंग को कूट देते हैं, और यहीं से शुरू होता है खून खराबा। और अंत में वही होता है जो होना चाहिए।
फिल्म की शुरुआत विलन से होती है जिसे निभाया है आदित्य रावल ने जो परेश रावल के बेटे हैं। उनकी ओवर एक्टिंग देख कर मैं बंद करने वाला था, पर मैंने अनिल कपूर का इंतज़ार किया और सच कहूँ तो अनिल कपूर को देखते हुए ही पूरी फिल्म देख ली। उनका स्क्रीन presence और अभिनय बांध लेता है, बाकी कहानी में कुछ भी नया नहीं है। सब वही है जो सब फिल्मों में दिखाया जा रहा है। टेंशन अच्छा बिल्ड किया है। मोना सिंह ने बबली दीदी का किरदार निभाया है जिसे जैल में बंद खूंखार माफिया बताया है जो वो नहीं लगती। सोफ़्टी के किरदार में फैसल खान हैं जो किसी भी किरदार को बहुत बढ़िया निभा सकते हैं ये हमें भरोसा हो गया है। पंचायत के बाद उनकी तक़दीर खुल गई है। राधिका मदान ने अनिल कपूर की बेटी का किरदार किया है, उन्हें “मर्द को दर्द नहीं होता” के बाद से सब वैसे ही रोल मिलते आए हैं। सौरभ शुक्ल के पास ज़्यादा कुछ था नहीं। बस इन थोड़े से किरदारों में ही फिल्म समेट दी। क्योंकि सबसे महत्वपूर आजकल होते हैं वो 15-20 गुंडे जो हर 10 मिनट में पिटते हैं फिल्म में।
अगर और कुछ न हो तो देखी जा सकती है। औसत फिल्म है। प्राइम विडियो पर उपलब्ध है।
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